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दामाज बेटा बन जाता है पर बहू पराये घर की रहती है

 "अरे भाईसाहब (ननदोई) इतनी सुबह सुबह ?"

"मम्मी पापा ने बुलाया था.कुछ जरूरी काम है." प्रमोद ने रश्मि को रूखा सा उत्तर दिया.

"आ गये बेटे. बहू खड़े खड़े क्या बातें कर रही हो जाओ चाय बना लाओ."

"जी मम्मी जी"

रश्मि चाय बनाते हुए सोच रही थी ऐसी क्या बात हो सकती है जो भाईसाहब को सुबह बुलाया.कल रात उसे सास ससुर के कमरे से खुसुरफुसुर की आवाजें आ रही थी.मन में उठी किसी अनहोनी की आशंका को झटक कर वह चाय ले कर ड्रॉइंग रूम में गई.

"बहू नाश्ता जल्दी बना देना.हमें काम से जाना है."

"मम्मी जी कहाँ जाना है ?"

"आकर बताते है तुम नाश्ते की तैयारी करो."

रश्मि ने सास ससुर और प्रमोद को नाश्ता दिया.कुछ देर में तीनो तैयार हो कर चले गये और रश्मि घर के काम निपटाने लगी.

ये थी रश्मि. शर्मा परिवार की इकलौती बहू.रश्मि की शादी रूपेश से हुए एक साल हो गया था.रूपेश की एक बड़ी शादीशुदा बहन कंचन और एक छोटी बहन काजल  जो कॉलेज में पढ़ती है.रूपेश दूसरे शहर में नौकरी करता था.उसकी इच्छा थी कि रश्मि  मम्मी पापा की देखभाल के लिए उनके साथ रहे.रश्मि ने भी रूपेश की इच्छा का मान रखा.रूपेश हफ्ते या पंद्रह दिन में घर आता रहता था.रश्मि को ससुराल में कोई कमी नही थी .बस उसे एक ही बात खटकती थी कि घर का सदस्य होने के बावजूद भी उससे घर की बातें छिपाई जाती और दामाद को घर की एक एक बात बताई जाती. रश्मि रूपेश को घर की उलझनों से दूर ही रखने की कोशिश करती इसलिए उसने रूपेश को आज तक ये बात नही बताई थी.

फोन की घंटी बजी.रूपेश का फोन था.

"हैलो"

"क्या कर रही हो ? मैंनें सोचा घर पर अकेली हो तो तुम्हारा मन बहलाया जाये."

"आपको कैसे पता ?"

"इसमें हैरानी की क्या बात है.कल पापा का फोन आया था कि वह,मम्मी और जीजा जी काजल के लिए लड़का देखने जा रहे है."

"लड़का !!! पर मुझे तो किसी ने बताया ही नही."

"ऐसा कैसे हो सकता है ? इतनी जरूरी बात तुम्हें नही बताई."

"छोड़ो जाने दो.तुम कब आ रहे हो ?"

"एक दो दिन में आता हूँ."  कुछ देर बातें करने के बाद दोनों ने फोन रख दिया.

करीब तीन चार घंटे बाद तीनों घर आ गये.

"मम्मी जी आपने बताया नही कि आप लोग काजल के लिए लड़का देखने जा रहे हो."

"क्या बताना था अभी बात ही चल रही है और फिर बात फैलने से नजर लग जाती है."

"मम्मी जी घरवालों की नजर लगती है क्या ?"

"बहू बात न बढ़ाओ.बहुत भूख लगी है खाना लगाओ."

"बेटा इतवार को तुम और कंचन आ जाना. बात बन गई तो सगाई और शादी की तैयारियों के बारे में भी बात कर लेगें. तुम्हें दुनियादारी की समझ है.नया जमाना है. क्या बात करनी है.तुम ज्यादा पता होगा. तब तक रूपेश भी आ जायेगा." जाते हुए सास कृष्णा जी प्रमोद से बोली.

इतवार को लड़के वाले आ गये.रश्मि ने पानी देते हुए ही लड़का देखा था.उसके बाद वह रसोई में लगी रही.सारी शादी की बातें प्रमोद ही कर रहा था. थोड़ी देर में रूपेश भी आ गया.सभी मिल कर बातें कर रहे थे और रश्मि की ड्यूटी सबको पानी, चाय और स्नैक्स परोसने की थी.न उसकी राय की जरूर समझी न उसे अपने साथ बैठाया.

"लड़का अच्छा है न ?" रूपेश ने रात को अपने कमरे में रश्मि से पूछा.

"मुझे क्या पता.न मैंने उससे बात की न उनके बारे में कुछ जानती हूँ."

"देखा तो है."

"देखने से ही हमें किसी के बारे में जान लेते है क्या."

"तुम इतनी उड़खी क्यों हो ?"

"इतनी बड़ी बात और मम्मी पापा ने मुझे बताना भी जरूरी नही समझा."

"जानता हूँ उनकी गलती है.लेकिन वो हमसे बड़े है इसलिए उन्हें कुछ कहना ठीक नही."

अगले दिन रूपेश नौकरी पर वापस जाने से पहले बैंक से पैसे निकाल कर लाया.

"मम्मी पापा कुछ पैसे आप रख लीजिए और कुछ रश्मि को दे देता हूँ. शादी वाला घर है पैसों की जरूर पड़ती रहेगी.रश्मि को काजल के लिए कोई चीज पसंद आयेगी तो ले लेगी. बार बार हमसे पैसे नही मांगने पड़ेगे."

"अरे उसने कौन सी खरीदारी करनी है ये पैसे जीजा जी को दे दे.वह अपने हिसाब से सामान लाते रहेगें.मोलभाव करके पैसे भी कम करवा देगें.बहू तो पैसे ऐसे ही लुटा देगी." कृष्णा जी बोली.

बहुत दिनों से रश्मि के मन में दबी पीड़ा ने शब्दों का रूप ले लिया.

"क्यों मम्मी जी मैं अपने पति की मेहनत का पैसा ऐसे ही क्यों लुटाऊंगी.ये काम तो बाहर वालों का होता है.जिन पर आपको भरोसा है.

"प्रमोद बाहर वाला नही है.वो बेटा है इस घर का. हमारा बुरा थोड़ी चाहेगा." कृष्णा जी गुस्से में जोर से बोली.

"तो क्या मै बुरा चाहूंगी. जिसने पूरी जिन्दगी इस घर के लोगों के साथ बितानी है वो घर का बुरा चाहेगी.आपको अपने दामाद पर बहुत भरोसा है पर वो भी तो मेरी तरह बाहर वाले है.

एक लड़की अपने मां बाप ,अपना घर छोड़ कर एक अंजान घर को अपना लेती है उस घर के सदस्यों को अपना मानती है पर वह कितना भी कर ले ससुराल में बाहर वाली ही कहलाती है.उससे घर की बातों को छुपाया जाता है कि कहीं नजर न लग जाये तो ये नियम दामाद पर भी लागू होता है वह भी तो बाहरी है.लेकिन आप दोनों को उन पर पूरा भरोसा है.दामाद बेटा बन जाता है पर बहू पराये घर की ही रहती है.ऐसा क्यों होता है ?

मैं आप दोनों की देखभाल के लिए रूपेश से दूर यहाँ रही.आपको और इस घर को अपना समझा.लेकिन मैं पराई हूँ तो मेरा यहाँ रहने का हक भी नही इसलिए मै रूपेश के साथ जा रही हूँ और आप चाहेगें तो शादी के दिन मेहमान बन कर शरीक हो जाऊंगी."

"रूपेश ये तेरे सामने इतना सब बोल रही है और तू खड़ा हो कर चुपचाप सुन रहा है."

"मम्मी रश्मि सही बोल रही है वो इस घर की बहू है इसलिए उसे घर की छोटी से छोटी बात पता होनी चाहिए और ये तो बहुत बड़ी बात है.मैं आप दोनों का सम्मान करता हूँ लेकिन अपनी पत्नी का सम्मान बनाये रखना भी मेरा फर्ज है."

"बेटा तू सही बोल रहा है.हम बहू को बेटी बना कर घर लाते है पर बेटी नही मानते. तूने हमारी आंखें खोल दी. अब हम ये गलती नही करेगें.बहू हमें माफ कर दे." देर से ही सही कृष्णा जी को अपनी गलती का अहसास हो गया.

"नही मम्मी जी.माफी मत मांगिए. मैं बस इतना चाहती हूँ कि आप मुझे परिवार का सदस्य समझिये.अपने सुख दुख में शामिल कीजिए.बहू कभी पराये घर की नही होती. वो जिस दिन ससुराल में पहला कदम रखती है उसी दिन से  ससुराल को अपना घर मान लेती है."

कृष्णा जी की आंखें नम हो गई. उन्होंने रश्मि को गले लगा लिया.


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