बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी। टिन की जर्जर छत पर गिरती बारिश की बूंदें ऐसा शोर मचा रही थीं, मानो आसमान से पानी नहीं, पत्थर बरस रहे हों। शहर के उस किनारे बसी इस छोटी सी बस्ती में आज रात जैसे कोई खौफनाक साया मंडरा रहा था। शंभू अपनी खोली के छोटे से दरवाजे के पास खड़ा बाहर के घुप अंधेरे को घूर रहा था। उसकी आँखों में नींद का नामोनिशान नहीं था, बल्कि एक ऐसी खौफनाक बेबसी तैर रही थी जो किसी भी इंसान को अंदर से तोड़कर रख दे। पीछे, सीलन भरे कमरे के एक कोने में बिछी पुरानी खटिया से लगातार खांसने और कराहने की आवाजें आ रही थीं। यह शंभू की पत्नी, सुभागी थी। सुभागी को पिछले कई महीनों से सीने में दर्द और सांस उखड़ने की बीमारी थी। शंभू दिन भर ठेला चलाकर जो कुछ कमाता, वह सुभागी की सस्ती और बेअसर दवाइयों में उड़ जाता। सरकारी अस्पताल की लंबी कतारों में वह कई बार खड़ा हुआ, लेकिन हर बार कोई न कोई पर्ची थमा दी जाती जो उसे शहर के बड़े और महंगे अस्पतालों का रास्ता दिखाती थी। आज सुभागी की हालत अचानक बहुत बिगड़ गई थी। उसकी सांसें किसी टूटे हुए वाद्ययंत्र की तरह बज रही थीं, और हर सांस के साथ उसका पूरा शरीर...