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Showing posts from March, 2026

**सांसों की डोर और बेबस प्रेम**

  बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी। टिन की जर्जर छत पर गिरती बारिश की बूंदें ऐसा शोर मचा रही थीं, मानो आसमान से पानी नहीं, पत्थर बरस रहे हों। शहर के उस किनारे बसी इस छोटी सी बस्ती में आज रात जैसे कोई खौफनाक साया मंडरा रहा था। शंभू अपनी खोली के छोटे से दरवाजे के पास खड़ा बाहर के घुप अंधेरे को घूर रहा था। उसकी आँखों में नींद का नामोनिशान नहीं था, बल्कि एक ऐसी खौफनाक बेबसी तैर रही थी जो किसी भी इंसान को अंदर से तोड़कर रख दे। पीछे, सीलन भरे कमरे के एक कोने में बिछी पुरानी खटिया से लगातार खांसने और कराहने की आवाजें आ रही थीं। यह शंभू की पत्नी, सुभागी थी। सुभागी को पिछले कई महीनों से सीने में दर्द और सांस उखड़ने की बीमारी थी। शंभू दिन भर ठेला चलाकर जो कुछ कमाता, वह सुभागी की सस्ती और बेअसर दवाइयों में उड़ जाता। सरकारी अस्पताल की लंबी कतारों में वह कई बार खड़ा हुआ, लेकिन हर बार कोई न कोई पर्ची थमा दी जाती जो उसे शहर के बड़े और महंगे अस्पतालों का रास्ता दिखाती थी। आज सुभागी की हालत अचानक बहुत बिगड़ गई थी। उसकी सांसें किसी टूटे हुए वाद्ययंत्र की तरह बज रही थीं, और हर सांस के साथ उसका पूरा शरीर...

**खामोश लिफाफा और रेशम की डोर**

  डाकिये ने जैसे ही खाकी रंग का वह छोटा सा लिफाफा राघव के हाथों में थमाया, उसके दिल की धड़कनें कुछ पल के लिए मानो ठहर सी गईं। प्रेषक की जगह पर जो नाम लिखा था, वह उसकी छोटी बहन 'काव्या' का था। राघव ने कांपते हाथों से उस लिफाफे को खोला। अंदर से लाल और पीले रेशमी धागों से बुनी एक बेहद खूबसूरत राखी निकली, लेकिन उस राखी के साथ न तो रोली-चावल की कोई पुड़िया थी और न ही कोई खत। एक कोरा कागज भी नहीं। लिफाफे का वह खालीपन राघव के कानों में किसी चीख की तरह गूंज रहा था। वह राखी सिर्फ एक धागा नहीं थी, बल्कि महीनों से चली आ रही उस खामोशी की गवाह थी, जिसने दो सगे भाई-बहनों को एक-दूसरे से मीलों दूर कर दिया था। राघव उस राखी को अपनी हथेली पर रखकर अपने घर के बरामदे में रखी आरामकुर्सी पर बैठ गया। उसकी आँखें उस रेशम के धागे पर टिकी थीं, लेकिन उसका मन अतीत की उन पगडंडियों पर दौड़ने लगा था जहाँ वो और काव्या एक साथ बड़े हुए थे। बचपन के वो दिन कितने अलग थे। बात-बात पर लड़ना, एक-दूसरे के बाल खींचना, टीवी के रिमोट के लिए पूरे घर को सिर पर उठा लेना। काव्या जब रूठ जाती थी, तो घर के एक कोने में मुँह फुलाकर ब...

वह अधूरी ममता और एक अजनबी जीवनदान

  दोपहर के करीब दो बज रहे थे। अक्टूबर की हल्की-हल्की धूप खिड़की से छनकर मेरे ऑफिस की डेस्क पर पड़ रही थी। मैं अपनी कंप्यूटर स्क्रीन पर कुछ फाइलों में उलझी हुई थी, तभी मेरे मोबाइल की रिंगटोन बजी। स्क्रीन पर एक अनजान नंबर चमक रहा था। आमतौर पर मैं ऑफिस के समय अनजान नंबर उठाने से कतराती हूँ, लेकिन उस दिन न जाने क्यों मेरे हाथ खुद-ब-खुद फोन की तरफ बढ़ गए। मैंने कॉल रिसीव किया और दूसरी तरफ से आई आवाज़ ने मेरी पूरी दुनिया को एक पल के लिए सुन्न कर दिया।  "हेलो, क्या आप आरोही की माँ बोल रही हैं? मैं सिटी अस्पताल से बोल रहा हूँ। आपकी बेटी का स्कूल के बाहर एक्सीडेंट हो गया है, उसे यहाँ इमरजेंसी में लाया गया है। आप तुरंत पहुँचिए।" फोन मेरे हाथ से छूटकर डेस्क पर गिर पड़ा। मेरे कानों में एक अजीब सी सीटी बजने लगी और आँखों के सामने अंधेरा छा गया। मेरा पूरा शरीर काँपने लगा। आरोही, मेरी सात साल की जान, मेरी इकलौती बेटी। सुबह तो मैंने खुद उसे स्कूल बस में बिठाया था। उसने मुझे मुस्कुराते हुए 'बाय मम्मा' कहा था और मैंने उसके माथे को चूमा था। क्या हुआ होगा? उसे कितनी चोट आई होगी? क्या मेरी...

प्रेम की बंदगी या दिखावे का बाज़ार

  नव्या और उसके पति सुमित ने अभी पिछले ही महीने शहर की सबसे पॉश 'गोल्डन विलोस' सोसाइटी में अपना नया फ्लैट लिया था। नव्या के लिए यह एक बिल्कुल नई दुनिया थी। मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाली नव्या जब इस हाई-प्रोफाइल सोसाइटी में आई, तो उसकी आँखें यहाँ की चकाचौंध देखकर चुंधिया गईं। अभी उन्हें शिफ्ट हुए कुछ ही दिन बीते थे कि करवा चौथ का त्योहार नज़दीक आ गया। सोसाइटी के क्लब हाउस और शाम की सैर के दौरान महिलाओं का मुख्य विषय अब सिर्फ करवा चौथ की तैयारियाँ ही रह गया था। नव्या शाम को जब सोसाइटी के पार्क में टहलने जाती, तो हर तरफ बस यही बातें सुनाई देतीं।  "अरे शालिनी, मैंने तो इस बार डिज़ाइनर बुटीक से सत्तर हज़ार का लहंगा कस्टमाइज़ करवाया है।" "मैंने तो अपने पति को साफ बोल दिया है कि इस बार मुझे उस मशहूर ज्वैलर का डायमंड नेकलेस ही चाहिए, आखिर मैं उनके लिए भूखी-प्यासी जो रहूँगी!" "यार, मेरा तो दिमाग खराब है। मेरे मेकअप आर्टिस्ट ने एंड टाइम पर बुकिंग कैंसिल कर दी। अब मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं क्लब हाउस के 'करवा चौथ क्वीन' कॉन्टेस्ट में क्या करूंगी।...

आज़ादी की कीमत और वो भरा-पूरा आँगन

  "बस बहुत हो गया विकास! मैं अब इस धर्मशाला में और नहीं रह सकती!" नेहा ने अपने पति के सामने हाथ जोड़ते हुए कहा। उसकी आँखों में गुस्सा और थकान साफ झलक रही थी।  विकास ने दरवाज़े की तरफ देखते हुए फुसफुसा कर कहा, "धीरे बोल नेहा, बाहर मम्मी-पापा या भाभी सुन लेंगे तो क्या सोचेंगे?" "सोचने दो! मुझे क्या? मैं यहाँ शादी करके आई थी या पूरे गाँव का खाना बनाने और कपड़े धोने? सुबह उठो तो नाश्ते की फरमाइशें, दोपहर में दस लोगों का खाना, शाम को फिर वही बर्तन और चाय। मेरे घर में हम सिर्फ़ तीन लोग थे। मैंने तो हमेशा यही सोचा था कि शादी के बाद मेरा अपना एक छोटा सा आशियाना होगा—तुम, मैं और हमारी छोटी सी दुनिया। लेकिन यहाँ तो हर वक़्त किसी न किसी की आवाज़ गूँजती रहती है।"  तभी दरवाज़े पर विकास की माँ, सावित्री देवी आ खड़ी हुईं। उन्होंने सब सुन लिया था। उन्होंने एक ठंडी सांस ली और शांत स्वर में बोलीं, "बेटा विकास, अगर बहू का दम घुट रहा है, तो उसे आज़ादी दे दो। तुम दोनों कल ही अलग फ्लैट में शिफ्ट हो जाओ। मैं तुम्हारा सामान पैक करवा देती हूँ।" दो दिन के अंदर ही विकास और नेहा अप...

**कर्मों का चक्रव्यूह**

  "आँसुओं की कीमत जब रुपयों में आंकी जाती है, तो नियति अपना ऐसा बहीखाता खोलती है जहाँ दौलत नहीं, सिर्फ दर्द का हिसाब होता है।" यह कहानी किसी किताब का पन्ना नहीं, बल्कि इंसान के लालच और कुदरत के न्याय का वह जीता-जागता सच है, जो हर उस व्यक्ति को झकझोर सकता है जिसे अपनी दौलत और चालाकी पर गुरूर है।  कानपुर शहर के सबसे व्यस्त सर्राफा बाजार में सेठ केदारनाथ की सोने-चांदी की बहुत बड़ी दुकान थी। केदारनाथ सिर्फ जेवर ही नहीं बेचते थे, बल्कि गिरवी रखने का भी बहुत बड़ा व्यापार करते थे। बाजार में उनकी हैसियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता था कि उनके पास शहर की सबसे महंगी गाड़ियां और सबसे आलीशान कोठी थी। लेकिन उनकी इस कामयाबी के पीछे मेहनत से ज्यादा उनकी बेईमानी और क्रूरता का हाथ था। केदारनाथ किसी भी जेवर की कीमत सोने की शुद्धता देखकर नहीं, बल्कि उसे बेचने वाले की मजबूरी देखकर तय करते थे। ग्राहक जितना लाचार होता, केदारनाथ का मुनाफा उतना ही ज्यादा होता। उन्हें किसी के दुख या आंसुओं से कोई फर्क नहीं पड़ता था; उनकी आँखों में सिर्फ अपनी तिजोरी की चमक बसती थी। साल 2011 की बात है। सावन का मह...