Skip to main content

Posts

"भेदभाव "

घर परिवार में चार बहूएँ हों या चार बहनें हों , वहाँ उन चारों में सबसे ज्यादा खटपट या भेदभाव छोटी बहन या छोटी बहू के साथ होता है । बहनें तो शादी-ब्याह के पश्चात् अपने अपने कार्यक्षेत्र में व्यस्त हो जाती हैं , घरेलू - गृहस्थिन बन गृह को सँभालती हैं लेकिन ससुराल पक्ष में जितना भेदभाव बड़ी बहू झेलती आ रही थी वही मंझली के आते ही बहू के पहनावे में से साड़ी ने सलवार- सूट को बदला है , तीसरी के आते ही सलवार सूट से जींस टाॅप बदला , चौथी / छोटी के आते ही सीधे  कैफ़री ( हाफ पैंट) और स्लीवलेस टी- शर्ट।   बड़ी बहू बिचारी सुबह सुबह नहा धोकर साड़ी पहन चेहरे को घूँघट से झापते (ढकना) हुए पुजा- पाठ करती है , फिर सबका नाश्ता खाना तैयार करती है , सारा काम साड़ी में ही लदफदा कर बखूबी सँभालती है लेकिन क्या मजाल कि उसके चेहरे पर तनिक भी शिकन आए या थकान को जाहिर करे । यह वाकया 30- 40 बरस पहले , अब समय बदल गया है , मँझली बहू आ गई है साड़ी से सलवार सूट पर और बड़की से कहती है दीदी तुम भी सूट पहना करो। ससुराल है कोई स्कूल नहीं कि ड्रेस कोड हो बस सास ससुर के सामने दुपट्टा सिर पर रख लेना । इस तरह दोनों दि...
Recent posts

अनदेखे धागे: एक बहन की जासूसी और मंडप का सच

  क्या रिश्तेदारों की मीठी-कड़वी बातें किसी नई नवेली दुल्हन के मन में अपने होने वाले जीवनसाथी को लेकर खौफ पैदा कर सकती हैं? जब एक छोटी बहन ने अपनी दीदी के लिए 'जासूस' का पर्दा ओढ़ा, तो जो सच सामने आया उसने न सिर्फ खौफ को मिटाया, बल्कि सभी की आँखें भी नम कर दीं... शहनाई की गूंज, गेंदे के फूलों की महक और देसी घी में छनती पूड़ियों की खुशबू से पूरा घर महक रहा था। शादी वाले घर में वैसे तो सैंकड़ों काम होते हैं, लेकिन नंदिनी की शादी में हर काम के लिए बस एक ही नाम गूंज रहा था—"अरे कोई काव्या को बुलाओ!" काव्या, नंदिनी की छोटी बहन थी। गुलाबी रंग के लहंगे में, माथे पर छोटी सी बिंदी लगाए काव्या जब पूरे घर में फिरकी की तरह घूमकर काम संभाल रही थी, तो हर रिश्तेदार उसकी खूबसूरती और कोमल व्यवहार की तारीफ करते नहीं थक रहा था। कोई मेहमान पानी मांगता, तो काव्या हाज़िर। किसी को रस्मों का सामान चाहिए होता, तो काव्या सबसे आगे। लेकिन काव्या के इस फुर्तीलेपन और मीठी मुस्कान के पीछे एक बहुत बड़ा राज़ छिपा था। वह सिर्फ घर का काम ही नहीं कर रही थी, बल्कि वह अपनी प्यारी दीदी नंदिनी की 'सीक्रेट जा...

**काजल का वो कतरा: एक माँ का अदृश्य कवच**

  रौशनी से नहाए हुए उस विशाल बैंक्वेट हॉल में आज एक अलग ही रौनक थी। निहारिका के चचेरे भाई की सगाई का समारोह पूरे शबाब पर था। ढोलक की थाप और फिल्मी गीतों की धुनों के बीच जब निहारिका ने हॉल में कदम रखा, तो जैसे पल भर के लिए सबकी निगाहें उसी पर आकर ठहर गईं। उसने गहरे पन्ना-हरे रंग का एक भारी डिज़ाइनर लहँगा पहना था। उसके खुले लहरियेदार बाल, हल्की सी मुस्कान और चेहरे का वो निखार किसी भी देखने वाले को मंत्रमुग्ध करने के लिए काफी था। रिश्तेदारों से लेकर मेहमानों तक, हर कोई बस उसी की खूबसूरती के कसीदे पढ़ रहा था। कोई उसकी तुलना किसी अभिनेत्री से कर रहा था, तो कोई आपस में कानाफूसी कर रहा था कि 'लड़की तो बिल्कुल चाँद का टुकड़ा लग रही है'। निहारिका इन सब तारीफों का पूरा आनंद ले रही थी। आखिर इस रूप को निखारने के लिए उसने घंटों पार्लर में बिताए थे। लेकिन उस भीड़ में एक नज़र ऐसी भी थी, जो उसकी सुंदरता पर गर्व तो कर रही थी, लेकिन साथ ही एक अनजाने डर से कांप भी रही थी। वो नज़र किसी और की नहीं, बल्कि उसकी माँ, सुमित्रा जी की थी। सुमित्रा जी पिछले आधे घंटे से मेहमानों के बीच घूम-घूम कर यह महसूस ...

ममता की वसीयत: खून के रिश्तों से बड़ा समर्पण

  देहरादून की एक शांत और पुरानी कॉलोनी में सावित्री देवी का पुश्तैनी मकान था। मकान क्या था, वह उनकी पूरी ज़िंदगी की यादों का एक जीता-जागता दस्तावेज़ था। इस घर के आँगन में उन्होंने अपने बेटे मयंक और बेटी विशाखा को खेलते और बड़े होते देखा था। लेकिन समय का पहिया ऐसा घूमा कि आज वह घर एक अजीब से सन्नाटे में डूबा रहता था। चार साल पहले एक सड़क हादसे में उनके इकलौते बेटे मयंक की मौत हो गई थी। मयंक के जाने के बाद सावित्री देवी पूरी तरह टूट चुकी थीं। लेकिन उस घने अंधेरे में उनका सहारा बनी उनकी विधवा बहू, प्रेरणा। प्रेरणा की उम्र ही क्या थी, मुश्किल से अट्ठाईस साल। लोगों ने ताने मारे, रिश्तेदारों ने सलाह दी कि वह दूसरी शादी कर ले और अपनी ज़िंदगी बसा ले। लेकिन प्रेरणा ने सावित्री देवी का हाथ नहीं छोड़ा। उसने स्पष्ट कह दिया कि मयंक के जाने के बाद यह घर और उसकी माँ ही उसकी दुनिया हैं। सुबह उठकर सावित्री देवी को चाय देने से लेकर, उनके घुटनों की मालिश करने और रात को उनके सोने तक, प्रेरणा एक साये की तरह उनके साथ रहती। वह एक स्कूल में पढ़ाने जाती और लौटकर घर की सारी ज़िम्मेदारी संभालती। सावित्री देवी के ...

स्वाभिमान की गूंज

  रसोई की खिड़की से आती सुबह की धूप नीता के थके हुए चेहरे पर पड़ रही थी। चूल्हे की आँच और लगातार काम की वजह से उसके माथे से पसीने की बूंदें छलक रही थीं। शादी को छह साल बीत चुके थे, और इन छह सालों में नीता ने इस घर को अपने खून-पसीने से सींचा था। शादी के अगले ही दिन से उसकी सासू माँ, सुशीला देवी ने घर की चाबियों के साथ-साथ ज़िम्मेदारियों का पूरा बोझ नीता के कंधों पर डाल दिया था और खुद को पूजा-पाठ व आराम तक सीमित कर लिया था।  नीता का पति, अभिनव, एक बड़े ऑफिस में मैनेजर था। वह नीता को सिर्फ एक ऐसी 'सुविधा' मानता था जो उसकी हर जरूरत को बिना मांगे पूरा कर दे। कभी प्यार के दो मीठे बोल या उसकी थकान पूछने का समय अभिनव के पास नहीं था। ज़रूरत पड़ने पर थोड़ा लाड़-प्यार दिखा देना, वरना पूरे दिन नीता की कोई अहमियत नहीं थी। आज सुबह से ही घर का माहौल गरम था। नाश्ते में नमक थोड़ा कम क्या हो गया, सुशीला देवी ने आसमान सिर पर उठा लिया। "पता नहीं मायके से क्या सीख कर आई है! छह साल हो गए, आज तक ढंग से दाल में नमक डालना नहीं आया। बस दिन भर महारानी की तरह घूमती रहती है।" नीता, जो सुबह पाँच ब...

ममता की वसीयत: खून के रिश्तों से बड़ा समर्पण

  देहरादून की एक शांत और पुरानी कॉलोनी में सावित्री देवी का पुश्तैनी मकान था। मकान क्या था, वह उनकी पूरी ज़िंदगी की यादों का एक जीता-जागता दस्तावेज़ था। इस घर के आँगन में उन्होंने अपने बेटे मयंक और बेटी विशाखा को खेलते और बड़े होते देखा था। लेकिन समय का पहिया ऐसा घूमा कि आज वह घर एक अजीब से सन्नाटे में डूबा रहता था। चार साल पहले एक सड़क हादसे में उनके इकलौते बेटे मयंक की मौत हो गई थी। मयंक के जाने के बाद सावित्री देवी पूरी तरह टूट चुकी थीं। लेकिन उस घने अंधेरे में उनका सहारा बनी उनकी विधवा बहू, प्रेरणा।  प्रेरणा की उम्र ही क्या थी, मुश्किल से अट्ठाईस साल। लोगों ने ताने मारे, रिश्तेदारों ने सलाह दी कि वह दूसरी शादी कर ले और अपनी ज़िंदगी बसा ले। लेकिन प्रेरणा ने सावित्री देवी का हाथ नहीं छोड़ा। उसने स्पष्ट कह दिया कि मयंक के जाने के बाद यह घर और उसकी माँ ही उसकी दुनिया हैं। सुबह उठकर सावित्री देवी को चाय देने से लेकर, उनके घुटनों की मालिश करने और रात को उनके सोने तक, प्रेरणा एक साये की तरह उनके साथ रहती। वह एक स्कूल में पढ़ाने जाती और लौटकर घर की सारी ज़िम्मेदारी संभालती। सावित्री दे...

स्वाभिमान की गूंज

  रसोई की खिड़की से आती सुबह की धूप नीता के थके हुए चेहरे पर पड़ रही थी। चूल्हे की आँच और लगातार काम की वजह से उसके माथे से पसीने की बूंदें छलक रही थीं। शादी को छह साल बीत चुके थे, और इन छह सालों में नीता ने इस घर को अपने खून-पसीने से सींचा था। शादी के अगले ही दिन से उसकी सासू माँ, सुशीला देवी ने घर की चाबियों के साथ-साथ ज़िम्मेदारियों का पूरा बोझ नीता के कंधों पर डाल दिया था और खुद को पूजा-पाठ व आराम तक सीमित कर लिया था।  नीता का पति, अभिनव, एक बड़े ऑफिस में मैनेजर था। वह नीता को सिर्फ एक ऐसी 'सुविधा' मानता था जो उसकी हर जरूरत को बिना मांगे पूरा कर दे। कभी प्यार के दो मीठे बोल या उसकी थकान पूछने का समय अभिनव के पास नहीं था। ज़रूरत पड़ने पर थोड़ा लाड़-प्यार दिखा देना, वरना पूरे दिन नीता की कोई अहमियत नहीं थी। आज सुबह से ही घर का माहौल गरम था। नाश्ते में नमक थोड़ा कम क्या हो गया, सुशीला देवी ने आसमान सिर पर उठा लिया। "पता नहीं मायके से क्या सीख कर आई है! छह साल हो गए, आज तक ढंग से दाल में नमक डालना नहीं आया। बस दिन भर महारानी की तरह घूमती रहती है।" नीता, जो सुबह पाँच ब...