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हकीकत

 सुमन के हाथों से शादी की मेहंदी भी नहीं उतरी थी कि उसके साथ सुधा जी ने उसे पूरी तरह से काम में झोंक दिया। सुबह से शाम हो जाती, लेकिन सुधा जी के काम तो मानो पूरे ही नहीं होते थे। जैसे ही सुमन आराम करने के लिए अपने कमरे में जाती, वैसे ही सुधा जी कहतीं, "बहू, जरा मेरे सिर में तेल की मालिश कर दो" या "कपड़े प्रेस कर दो"। कोई न कोई बहाना बनाकर पहले से ही तैयार रखतीं। सुमन कुछ भी नहीं बोल पाती और झट से काम पर लग जाती—आखिर नई-नई बहू जो ठहरी!

सुमन के पति रोहित दूसरे शहर में नौकरी करते थे। शादी के लिए भी कम ही छुट्टियाँ मिली थीं, इसलिए शादी के आठ दिन बाद ही अपने काम पर लौट गए। तभी एक दिन…

"अरे बहू, कब तक सोती रहेगी? कितना समय हो गया है, आज तुम्हारे ससुर जी ऑफिस के लिए भी निकल गए और तूने चाय तक नहीं बनाई। आगे से ध्यान रखना, समझ गई? ठीक चार बजे उठ जाना, क्योंकि तेरे ससुर जी सुबह छह बजे ही निकल जाते हैं। बहुएं तो काम के लिए ही तो लाई जाती हैं, एक लौटी बहू हो, नहीं बताएंगे तो कैसे सीखोगी? बड़े-बूढ़ों की कदर करना सीखो," सुधा जी नसीहत देतीं।

"मुझसे गलती हो गई मांजी, आगे से चार बजे ही उठ जाऊंगी," इतना कहकर उदास मन से सुमन अपने काम में लग गई।

तभी एक दिन सुमन का बड़ा भाई किसी त्योहार के उपलक्ष्य में अपनी बहन के ससुराल आया। सुमन ने अच्छे से अपने भाई का सत्कार किया और मन ही मन सोचने लगी कि सासू मां उसकी तारीफ करेंगी बड़े भैया के सामने, क्योंकि वह पूरे दिन घर के काम और सास-ससुर की सेवा करती है। "देखना, बड़े भैया खुश हो जाएंगे मेरी तारीफ सुनकर।" लेकिन सुधा जी तो सुमन के भाई को देखते ही रसोई में रखे दो-चार बर्तन साफ करने लगीं।

"अरे मां, आप अचानक से बर्तन क्यों साफ कर रही हैं? मैं कर दूंगी।"
"थोड़े ही थे, इसलिए सोचा नाश्ते के बर्तनों के साथ ये भी साफ कर दूंगी," सुमन ने आश्चर्यचकित होकर कहा।

सुमन को अब समझ में आ गया था कि मां जी के मन में कुछ और ही चल रहा है। वह भैया के सामने यह दिखाना चाह रही थीं कि वह खुद ही बर्तन साफ करती हैं और तुम्हारी बहन कुछ नहीं करती। लेकिन सुमन चुप रही, क्योंकि अपने भाई के सामने वह कोई बवाल नहीं खड़ा करना चाहती थी।

शाम होते-होते सुमन का भाई वहां से चला गया।
सुमन ने सासू मां की सारी बात अपने पति रोहित को फोन पर बताई। तब रोहित ने कहा, "क्यों ज्यादा चिंता कर रही हो सुमन? माने दो बर्तन धो दिए तो क्या हुआ, उन्होंने जानबूझकर तुम्हारे भाई को दिखाने के लिए ऐसा नहीं किया होगा, तुम्हें कोई गलतफहमी हो गई है।"
पति के मुख से इतना सुनते ही सुमन ने आगे ना बोलना ही ठीक समझा।

सुधा जी ने फिर से वही रवैया जारी रखा—किसी भी काम में जरा भी हाथ न हटातीं और पुराने-पुराने कपड़े भी जान-बूझकर प्रेस के लिए रख देतीं, ताकि सुमन को बिल्कुल भी आराम न मिले। तभी करीब महीने भर बाद रोहित हफ्ते भर की छुट्टी लेकर घर आया और सुमन से कहने लगा,
"अरे सुमन, क्या पूरे दिन घर के कामों में लगी रहती हो? दो घड़ी हमारे पास भी तो बैठो।"
रोहित ने प्यार से कहा। तभी सुमन के बोलने से पहले ही सुधा जी बोलीं,
"लल्ला, अभी घर का सारा काम बाकी है, बैठने के लिए तो सारी उम्र पड़ी है, समझ गए?"
सुधा जी ने गुस्से में कहा।

सुमन बेचारी चुपचाप फिर से अपने काम में लग गई।
तभी एक दिन दामाद से मिलने सुमन के पापा आ गए, क्योंकि शादी के बाद उनकी दामाद से कोई बात नहीं हुई थी।
पापा को आया देख सुमन दौड़कर उनके गले लग गई और खूब अच्छे से अपने पापा की खातिरदारी की। लेकिन सुमन के पापा के आते ही सासू मां फिर से किचन में जाकर सब्जी काटने लगीं और रसोई में रखे चाय के कप धोने लगीं। अपनी समधिन को यह सब करता देख सुमन के पापा हैरान हो गए और सुमन से कहने लगे,
"बेटा, देखो समधन जी बर्तन साफ कर रही हैं, तुम क्यों नहीं करती बर्तन साफ? ऐसे अच्छा नहीं लगता। तुम तो बोलती थी कि मैं घर का सारा काम करती हूं, लेकिन मैं तो कुछ और ही देख रहा हूं। बेटा, यह सब ठीक नहीं है…"

"क्या करें समधी जी, सब करना पड़ता है। आजकल के बच्चों से कहां घर के काम होते हैं, आज की बहुएं तो वैसे ही कामचोर हैं, कि कब मौका मिले और कब आराम करें," सुधा जी ने भोला सा मुंह बनाते हुए कहा।

तभी रोहित बोला—
"मां, आज तो आपने हद ही कर दी। उस दिन सुमन ठीक ही कह रही थी कि मेरे भाई के आते ही आप रसोई में बर्तन धोने लगीं, जबकि मैं खुद ही सब काम करती हूं, मेरे मना करने पर भी नहीं मानीं। शायद भैया को दिखाना चाहती थीं कि आप ही सब काम करती हैं। लेकिन मैंने सुमन की बात सुनकर अनसुनी कर दी थी, मगर आपने आज फिर से वही वाक्य दोहराया। पता नहीं मां, आप सुमन के घर वालों को क्या दिखाना चाहती हैं—यही न कि उनकी बेटी घर के काम नहीं करती, जबकि मैं जब से आया हूं, देख रहा हूं कि आप एक मिनट भी चैन की सांस नहीं लेने देतीं सुमन को। अपनी बहू के द्वारा किए गए काम और सेवा का अब आपको एहसास हो जाना चाहिए। मैंने तो कभी सोचा भी नहीं था, मां, कि आप कल की आई बहू का साथ नहीं देंगी।"

रोहित के मुख से इतना सुनते ही सुमन की आंखों में खुशी के आँसू आ गए। अब उसे कुछ भी कहने की जरूरत नहीं थी—सही समय पर रोहित ने अपनी पत्नी का साथ दिया, जो कि वह हकदार भी थी। सुमन के पापा के सामने ही रोहित ने अपनी मां की हकीकत बयान कर दी, और अब सुमन के पापा को भी यकीन हो चुका था कि उनकी बेटी में कोई कमी नहीं है—वह अपनी जिम्मेदारी अच्छे से निभा रही है।

अपने बेटे के मुंह से ये सब सुनकर सुधा जी को तो जैसे सांप सूंघ गया, क्योंकि उन्होंने यह कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि रोहित कल की बहू का साथ देगा। सुधा जी को बोलने के लिए शब्द ही नहीं मिले और वह चुपचाप वहां से बाहर निकल गईं। सुधा जी की चाल आज उन्हीं पर भारी पड़ गई थी, और बहू के पापा के सामने ही अपने बेटे को बोलने पर मजबूर कर दिया।

उस दिन के बाद सुधा जी में काफी सुधार भी आया और सुमन के रिश्तेदारों के सामने कभी दोबारा ये सब नाटक नहीं किया।
आज एक पति ने सच का साथ दिया, जोकि सही भी था।

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