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Showing posts from October, 2025

सबक

  दीनदयाल के बेटे रतनपाल की तीसरी सगाई की बात चल रही थी। पहिले दो बार सगाई टूट जाने के कारण वह इस बार बहुत चौकस था। पहिले जो कुछ हुआ उससे सबक ले पाँव फूँक-फूँक कर रख रहा था। “लड़का पढ़ा-लिखा है और सरकारी नौकरी में भी है। अपने परिवार और लड़के की नौकरी के स्टेट्स के अनुसार दहेज ज़रूर लेना है। हमारे घर टीवी, फ्रिज़, एसी, कार वगैरा सब है, इसलिए दहेज में नकद रकम ही चाहिए।” दीनदयाल ने अपने जीवन-स्तर को बयान करते हुए दहेज की माँग रख दी। “ठीक है, जैसी आपकी इच्छा। हम सामान न देंगे, नकद पैसे दे देंगे, बात तो एक ही है।” लड़की वालों ने सोचा, लड़का सुंदर है, पढ़ा लिखा है और अच्छी नौकरी पर भी लगा है। घर भी देखने योग्य है। क्या हुआ अगर लड़के का बाप जरा लालची है। एक बार खर्च कर अगर लड़की सुखी रहती है तो नकदी देने में भी कोई हरज नहीं है। बातचीत के बाद फैसला हुआ कि लड़की वाले दहेज के रूप में पाँच लाख रुपये नकद देंगे। निश्चित दिन पर दीनदयाल लड़के की बारात लेकर लड़की वालों के घर पहुँच गया। “जल्दी करो। लड़के को फेरों पर बिठाओ, लग्न का समय निकलता जा रहा है।” पंडित जल्दी कर रहा था। “पहले दहेज की रकम, फिर...

पापा, क्या मैंने आपको कभी रुलाया

  बिटिया  थोड़ी बड़ी हो गयी, एक रोज उसने बड़े सहज भाव में अपने पिता से पूछा - "पापा, क्या मैंने आपको कभी रुलाया" ? पिता ने कहा -"हाँ " उसने बड़े आश्चर्य से पूछा - "कब" ? पिता ने बताया - 'उस समय तुम करीब एक साल की थीं, घुटनों पर सरकती थीं। मैंने तुम्हारे सामने पैसे, पेन और खिलौना रख दिया क्योंकि मैं ये देखना चाहता था कि, तुम तीनों में से किसे उठाती हो तुम्हारा चुनाव मुझे बताता कि, बड़ी होकर तुम किसे अधिक महत्व देतीं। जैसे पैसे मतलब संपत्ति, पेन मतलब बुद्धि और खिलौना मतलब आनंद। मैंने ये सब बहुत सहजता से लेकिन उत्सुकतावश किया था क्योंकि मुझे सिर्फ तुम्हारा चुनाव देखना था। तुम एक जगह स्थिर बैठीं टुकुर टुकुर उन तीनों वस्तुओं को देख रहीं थीं। मैं तुम्हारे सामने उन वस्तुओं की दूसरी ओर खामोश बैठा बस तुम्हें ही देख रहा था। तुम घुटनों और हाथों के बल सरकती आगे बढ़ीं, मैं अपनी श्वांस रोके तुम्हें ही देख रहा था और क्षण भर में ही तुमने तीनों वस्तुओं को आजू बाजू सरका दिया और उन्हें पार करती हुई आकर सीधे मेरी गोद में बैठ गयीं। मुझे ध्यान ही नहीं रहा कि, उन तीनों वस्तुओ...

सिया की समझदारी

      बहुत पुरानी बात है।सिया की शादी बहुत ही अमीर घर में होती है ।वहाँ बहुत  सारे नौकर चाकर रहते हैं ।घर में धन-संपत्ति की कोई कमी नहीं रहती है ।घर में  गाय भी रहती है ।सिया रोज सुबह गाय के गोबर से कंठे बनाती थी ।उसके सास-ससुर और पति उसे हमेशा मना करते थे कि इतने सारे नौकर चाकर हैं वह कंठे बना देंगे ।लेकिन फिर भी सिया रोज कंठे बनाती थी और सूखने पर एक कमरे में रखती थी। उस कमरे में कोई आते जाते नहीं थे।    समय बीतता जाता है, लेकिन सिया  नियमित कंठे बनाती ही थी। एक दिन उनके घर में बहुत बड़ी चोरी हो जाती है ।चोर  तिजोरी से सारा धन संपत्ति चुरा कर ले जाते हैं । सिया के ससुर और पति बहुत चिंतित रहते हैं कि आगे व्यापार कैसे चलेगा। उन्हें कोई उधार देने को भी तैयार नहीं होता है। तब सिया उनके पास जाकर कहती है कि आप लोग चिंता मत कीजिए हमारे पास कुछ धन सुरक्षित है ।उसके पति और ससुर को बहुत आश्चर्य होता है की तिजोरी से सारे गहने और अशर्फियाँ तो चोर चुरा कर ले गए हैं। फिर धन कहाँ है । तब सिया उनको लेकर कंठे वाले कमरे में जाती है और एक कंडा तोड़कर दिखात...

परमात्मा की कृपा

  सन्तों की एक सभा चल रही थी। किसी ने एक दिन एक घड़े में गंगाजल भरकर वहाँ रखवा दिया ताकि सन्त जनों को जब प्यास लगे तो गंगाजल पी सकें।           सन्तों की उस सभा के बाहर एक व्यक्ति खड़ा था। उसने गंगाजल से भरे घड़े को देखा तो उसे तरह-तरह के विचार आने लगे। वह सोचने लगा- अहा ! यह घड़ा कितना भाग्यशाली है। एक तो इसमें किसी तालाब पोखर का नहीं बल्कि गंगाजल भरा गया और दूसरे यह अब सन्तों के काम आयेगा। सन्तों का स्पर्श मिलेगा, उनकी सेवा का अवसर मिलेगा। ऐसी किस्मत किसी किसी की ही होती है।           घड़े ने उसके मन के भाव पढ़ लिए और घड़ा बोल पड़ा- बन्धु मैं तो मिट्टी के रूप में शून्य पड़ा सिर्फ मिट्टी का ढेर था। किसी काम का नहीं था। कभी ऐसा नहीं लगता था कि भगवान् ने हमारे साथ न्याय किया है। फिर एक दिन एक कुम्हार आया।उसने फावड़ा मार-मारकर हमको खोदा और मुझे बोरी में भर कर गधे पर लादकर अपने घर ले गया।           वहाँ ले जाकर हमको उसने रौंदा, फिर पानी डालकर गूंथा, चाकपर च...

परख

  किसी जंगल में एक संत महात्मा रहते थे। सन्यासियों वाली वेश भूषा थी और बातों में सदाचार का भाव। चेहरे पर इतना तेज था कि कोई भी इन्सान उनसे प्रभावित हुए नहीं रह सकता था।          एक बार जंगल में शहर का एक व्यक्ति आया, और वो जब महात्मा जी की झोपड़ी से होकर गुजरा तो देखा- बहुत से लोग महात्मा जी के दर्शन करने आये हुए थे। वो महात्मा जी के पास गया और बोला कि, "आप अमीर भी नहीं हैं, आपने महंगे कपडे भी नहीं पहने हैं। आपको देखकर मैं बिल्कुल प्रभावित नहीं हुआ। फिर ये इतने सारे लोग आपके दर्शन करने क्यों आते हैं ?"          महात्मा जी ने उस व्यक्ति को अपनी एक अंगूठी उतार के दी और कहा- कि "आप इसे बाजार में बेच कर आयें और इसके बदले एक सोने माला लेकर आना।" अब वो व्यक्ति बाजार गया और सब की दुकान पर जाकर उस अंगूठी के बदले सोने की माला माँगने लगा, लेकिन सोने की माला तो क्या उस अंगूठी के बदले कोई पीतल का एक टुकड़ा भी देने को तैयार नहीं था। थकहार के व्यक्ति वापस महात्मा जी के पास पहुँचा और बोला कि- "इस अंगूठी की तो ...

सत्कर्म करें, अहंकार नहीं

  एक बार की बात है कि श्री कृष्ण और अर्जुन कहीं जा रहे थे। रास्ते में अर्जुन ने श्री कृष्ण से पूछा कि प्रभु: एक जिज्ञासा है मेरे मन में, अगर आज्ञा हो तो पूछूँ? श्री कृष्ण ने कहा: अर्जुन, तुम मुझसे बिना किसी हिचक, कुछ भी पूछ सकते हो। तब अर्जुन ने कहा: कि मुझे आज तक यह बात समझ नहीं आई है कि दान तो मै भी बहुत करता हूँ, परंतु सभी लोग कर्ण को ही सबसे बड़ा दानी क्यों कहते हैं? यह प्रश्न सुन श्री कृष्ण मुस्कुराये और बोले: कि आज मैं तुम्हारी यह जिज्ञासा अवश्य शांत करूंगा। श्री कृष्ण ने पास में ही स्थित दो पहाड़ियों को सोने का बना दिया। इसके बाद वह अर्जुन से बोले कि हे अर्जुन इन दोनों सोने की पहाड़ियों को तुम आस पास के गाँव वालों में बांट दो। अर्जुन प्रभु से आज्ञा ले कर तुरंत ही यह काम करने के लिए चल दिया। उसने सभी गाँव वालों को बुलाया। उनसे कहा कि वह लोग पंक्ति बना लें अब मैं आपको सोना बाटूंगा और सोना बांटना शुरू कर दिया। गाँव वालों ने अर्जुन की खूब जय जयकार करनी शुरू कर दी। अर्जुन सोना पहाड़ी में से तोड़ते गए और गाँव वालों को देते गए। लगातार दो दिन और दो रातों तक अर्जुन सोना बांटते रहे। उनमे अ...

ससुराल

  साँझ होने ही वाली थी सारे रस्म-रिवाज निपट चुके थे उन रिवाजों को निभाते-निभाते वो थक कर चूर हो चुकी थी ऊपर से उपवास रात को सिर्फ़ फलाहार के लिए सासु माँ बोल कर गयी थी जैसे ही कमरे से सब निकले उसने सबसे पहले दो किलो वज़न वाली चुनरी को उतार पलंग पर रखा और आइने के सामने खड़ी हो ख़ुद को निहारने लगी नाक का सिंदूर लीपा कर गाल तक फैल चुका था ज़्यादा कुछ नहीं पसीने की वजह से काजल और सिंदूर का आपस में अलग मिलन हो रहा था, जिसकी बदौलत वो काली माई लग रही थी मगर सासु माँ का सख़्त आदेश था कि टटका सिंदूर धुलना नहीं चाहिए तो मुँह भी नहीं धो सकती थी बालों को ऊपर की तरफ़ करते हुए अब खिड़की के पास आ खड़ी हो गयी सामने गागर निम्बू का पेड़ था जिसके फूलों की ख़ुशबू छन कर अब उसके नाक तक पहुँचने लगी जी में आया कि बाहर जा कर उस पेड़ के नीचे आराम से लेट जाए और वो फूल धीरे-धीरे उसके ऊपर चुए मगर फिर ख़्याल आया, “बेटा ससुराल में हो ये दिमाग़ी घोड़े न दौड़ाओ” क़दम वापिस पलंग की तरफ़ जा मुड़े दूल्हे राजा का अलग से कोई पता ठिकाना नहीं था मामी जी को पहुँचाने निकले थे अभी तक लौटे भी नहीं थे मोबाइल भी घर पर छोड़ कर...

डर

  आधी रात में मां की नींद खुल गई थी और बेटे को बहू के कमरे की बजाय अपने बिस्तर पर बच्चों की तरह आड़ा-तिरछा लेटा हुआ पाकर आज फिर उसका दिल आशंकाओं से भर उठा था बेटे के सर के नीचे एक तकिया लगा उसके माथे को सहलाते हुए वह धीरे से बुदबुदाई -अब तू कुछ परेशान सा रहता है नहीं मां शायद मां के स्पर्श से बेटे की कच्ची नींद भी खुल गई थी और वह करवट ले मां के करीब आ गया था पिछले महीने पति के गुजर जाने के बाद अब उसे भी गहरी नींद कहां आती थी रातें तो यूंही आंखें मूंद हल्की झपकियों में ही कट रही थी ऊपर से बेटे की यह बेचैनी आजकल जाने कब तू मेरे बिस्तर पर आकर सो जाता है। बहू से नाराज है क्या नहीं मां  किसी अबोध की तरह मां से लिपटने की कोशिश करता इस सवाल को भी वह टाल गया मां ने वही बिस्तर से सटे मेज पर रखें तांबे के लोटे से एक घूंट पानी पीकर लोटा वापस मेज पर रख दिया था और बिस्तर पर लेटने की बजाय एक तकिए का सहारा ले दीवार से अपनी पीठ टिका बैठ गई थी "फिर क्या बात है बेटा कुछ भी नही मां मां की गोद को छोटे बच्चों की तरह बाहों में भरने की कोशिश करता वह उसके हर सवाल को खारिज कर गया था बेटा बता ना तेरी ब...

झगड़े का मूल कारण

  एक बार एक सेठ अपनी दुकान पर बेठे थे दोपहर का समय था इसलिए कोई ग्राहक भी नहीं था तो वो थोड़ा सुस्ताने लगे इतने में ही एक संत भिक्षक भिक्षा लेने के लिए दुकान पर आ पहुचे और सेठ जी को आवाज लगाई कुछ देने के लिए सेठजी ने देखा की इस समय कोन आया है ? जब उठकर देखा तो एक संत याचना कर रहा था सेठ बड़ा ही दयालु था वह तुरंत उठा और दान देने के लिए एक कटोरी चावल बोरी में से निकाला और संत के पास आकर उनको चावल दे दिया संत ने सेठ जी को बहुत बहुत आशीर्वाद और दुवाएं दी तब सेठ जी ने संत से हाथ जोड़कर बड़े ही विनम्र भाव से कहा की हे गुरुजन, आपको मेरा प्रणाम  मैं आपसे अपने मन में उठी शंका का समाधान पूछना चाहता हुं। संत याचक ने कहा की जरुर पूछो तब सेठ जी ने कहा की लोग आपस में लड़ते क्यों है ? संत ने सेठ जी के इतना पूछते ही शांत स्वभाव और वाणी में कहा की सेठ मैं तुम्हारे पास भिक्षा लेने के लिए आया हुं तुम्हारे इस प्रकार के मूर्खता पूर्वक सवालो के जवाब देने नहीं आया हुं। इतना संत के मुख से सुनते ही सेठ जी को क्रोध आ गया और मन में सोचने लगे की यह केसा घमंडी और असभ्य संत है ? ये तो बड़ा ही कृतघ्न है, एक त...