साँझ होने ही वाली थी सारे रस्म-रिवाज निपट चुके थे उन रिवाजों को निभाते-निभाते वो थक कर चूर हो चुकी थी ऊपर से उपवास रात को सिर्फ़ फलाहार के लिए सासु माँ बोल कर गयी थी
जैसे ही कमरे से सब निकले उसने सबसे पहले दो किलो वज़न वाली चुनरी को उतार पलंग पर रखा और आइने के सामने खड़ी हो ख़ुद को निहारने लगी नाक का सिंदूर लीपा कर गाल तक फैल चुका था ज़्यादा कुछ नहीं पसीने की वजह से काजल और सिंदूर का आपस में अलग मिलन हो रहा था, जिसकी बदौलत वो काली माई लग रही थी मगर सासु माँ का सख़्त आदेश था कि टटका सिंदूर धुलना नहीं चाहिए तो मुँह भी नहीं धो सकती थी
बालों को ऊपर की तरफ़ करते हुए अब खिड़की के पास आ खड़ी हो गयी सामने गागर निम्बू का पेड़ था जिसके फूलों की ख़ुशबू छन कर अब उसके नाक तक पहुँचने लगी जी में आया कि बाहर जा कर उस पेड़ के नीचे आराम से लेट जाए और वो फूल धीरे-धीरे उसके ऊपर चुए
मगर फिर ख़्याल आया, “बेटा ससुराल में हो ये दिमाग़ी घोड़े न दौड़ाओ”
क़दम वापिस पलंग की तरफ़ जा मुड़े दूल्हे राजा का अलग से कोई पता ठिकाना नहीं था मामी जी को पहुँचाने निकले थे अभी तक लौटे भी नहीं थे मोबाइल भी घर पर छोड़ कर चले गये थे थोड़ी देर बैठी रही फिर नींद आने लगी तो लेटने को हुई ही थी कि बग़ल वाली गोतनी सब मुँह देखने आ गयी
जल्दी से नन्द भागते हुए कमरे में आयी और रुमाल से मुँह पोंछ कर फिर से टिका-नथीया पहना चुन्नी ओढ़ा दी दुल्हन फिर से मुँह दिखाई के लिए घुटने के बल आँख झुका कर बैठ गयी
कोई गोतनी नाक की बड़ाई कर रही थी तो कोई मुस्कान की नंदोई बग़ल में बैठ गाना गा रहा था,
“क्या अदा क्या जलवे तेरे पारो, दिल के टुकड़े हो गये हज़ारों”
वैसे दुल्हन का हँसना तो सख़्त मना था मगर अब मनु की हँसी छूट गयी सास ने हल्की खाँसी करके उसके ग़लती का अहसास करवाया मगर तब तक सब और हँसने लगे थे
लेकिन अगले ही पल नन्द मनु को कमरे में पहुँचा आयी और साथ में सेब और दूध भी रखते हुए खा लेने को बोली
मनु एक सेब खा दूध पी कर सोने की कोशिश करने लगी शिवाय अब भी नहीं लौटा था मनु को धीरे-धीरे ग़ुस्सा आने लगा और ग़ुस्से में इज़ाफ़ा हो इसलिए बिजली भी चली गयी
मोबाइल में देखा तो कोई बारह बज चुके थे सब लोग अपनी -अपनी जगह पकड़ कर सो चुके थे आँगन वाली खिड़की की तरफ़ मनु झाँक कर देखी तो सब चाँदनी का लुत्फ़ लेते हुए खुले आसमान के नीचे सो रहे थे
मनु को घर की याद आने लगी बिजली नहीं होने पर वो भी भाई-बहनों के साथ छत पर सोया करती थी मगर फिर वही बात, वो अब ससुराल में थी
बेचारी उदास होती हुई पलंग के किनारे लेट गयी न जाने कब नींद आयी पता ही नहीं चला आँख खुली तो शिवाय की गोद में सिर था और वो धीरे-धीरे बेना डुला रहा था
“आप कब आयें?”
“थोड़ी देर हुई तुम जग क्यूँ गयी!”
“अरे नींद खुल गयी आप सो जाइए न कितनी गरमी है मैं पंखा करती हूँ” बोलते हुए मनु शिवाय के हाथों से बेना लेने लगी
शिवाय कुछ सोच कर बोला, “गरमी तो बहुत है बाहर चलोगी?”
“अरे नहीं माँ को पता चलेगा तो ग़ुस्सा करेंगी!”
“नहीं थोड़ी देर के लिए चलते हैं फिर आ जाएँगे पीछे वाले दरवाज़े से चलो”
मनु का जाने का तो मन था ही मगर बेचारी डर रही थी जैसे ही कमरे से बाहर निकलने लगी पायल की आवाज़ दोनों के कानों में पड़ी
मनु कुछ सोच पाती इसके पहले ही शिवाय ने इधर-उधर देखा और मनु को गोद में उठा लिया अब पायल नहीं बज रहे थे मनु और शिवाय के दिलों में घंटियाँ बज रही थी अगले ही पल में दोनों गागर निम्बू के पेड़ के नीचे थे हल्की हवा से लग कर फूल मनु के ऊपर झड़ रहे थे शिवाय उन फूलों को टाँकने में जुटा हुआ था
खिड़की से सासु माँ ने देखा और आवाज़ देने ही वाली थी कि ससुर जी ने उनके कंधों पर हाथ रख दिया सासु माँ जो चिढ़ कर उन दोनों को डाँटने वाली थी अब पिघल कर अपने दूल्हे की बाहों में सिमट आयीं
उन्हें अपने वो दिन याद आने लगे जब उनको बाहर जाना होता था, तो रात को छुप कर शिवाय के पापा उसी पीछे वाले दरवाज़े से निकाल वही उसी पेड़ के नीचे ले जाया करते थे
उस पल में एक साथ कई दिल दूल्हा और दुल्हन बन मिल रहे थे चाँदनी प्रेम बरसा रही थी अब
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