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Showing posts from December, 2025

शादी ना बाबा ना

  तृषा ने दादी का हाथ पकड़कर हल्का सा दबाया, “दादी, आपने बहुत निभाया… और मैं आपकी इज्ज़त करती हूँ। मगर मैं चाहती हूँ कि निभाने का मतलब ‘खुद को मिटा देना’ न हो। मैं वही गलती नहीं दोहराना चाहती।” शरद ने हँसकर माहौल हल्का करना चाहा, “तुम्हारी बेटी तो शादी से पहले ही ‘रिस्क मैनेजमेंट’ कर रही है।” किरण का चेहरा थोड़ा सख्त हो गया, “रिस्क मैनेजमेंट? या रिश्तों से डर? कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम्हें भरोसा करना ही नहीं आता?” तृषा ने बिना बहस किए सिर हिलाया, “भरोसा करना आता है, मम्मा। बस आँख बंद करके नहीं। मैं किसी को मौका दूँगी, लेकिन खुद को गिरवी रखकर नहीं।” उस रात बातचीत वहीं खत्म हो गई, पर किरन की आँखों में चिंता टिक गई। उसे लगता था बेटी बहुत तेज़ हो गई है; और वसुधा को लगता था—ज़माना बदल गया है, पर दिल तो वही है, उसे कैसे समझाएँ? कुछ ही दिनों बाद तृषा की ट्रेन थी। उसे हैदराबाद नई नौकरी के लिए जाना था। स्टेशन पर भीड़ के बीच किरन बार-बार उसका चेहरा देख रही थी, जैसे आँखों में भरकर रख लेना चाहती हो। “ख्याल रखना,” किरन ने बस इतना कहा। तृषा ने माँ के माथे को चूमा, “मैं अपना भी ख्याल रखूँगी और आपक...

भरोसा कागज से नहीं… आदत से बनता है।

  “मैं शादी को ‘लॉटरी’ नहीं मानती, पापा… मैं तो इसे ‘प्रोजेक्ट’ मानती हूँ।” रसोई में रखा चाय का कप उठाते हुए तृषा ने ऐसे कहा जैसे वह किसी मीटिंग में प्रेज़ेंटेशन दे रही हो। डाइनिंग टेबल पर बैठे उसके पिता शरद अग्रवाल अख़बार से झाँककर मुस्कुराए। “वाह! फिर तो तुम्हारी शादी का ‘प्रोजेक्ट मैनेजर’ मैं नहीं, तुम खुद हो।” तृषा खिलखिला दी। सामने बैठी उसकी माँ किरण और दादी वसुधा ने एक-दूसरे को देखा—उन नज़रों में चिंता भी थी और हैरानी भी। किरण ने गहरी साँस ली, “अच्छा, ज़रा साफ़-साफ़ बोलो… तुम्हारे मन में चल क्या रहा है? शादी कोई ऑफिस का टास्क है क्या?” तृषा ने उँगलियों से अपने बाल पीछे किए, “मम्मा, मैं भागकर शादी नहीं कर रही। मैं बस चाहती हूँ कि जो रिश्ता बने, वो समझदारी से बने। प्यार ठीक है, पर प्यार के साथ ज़िम्मेदारी, सम्मान और सीमाएँ भी तो हों। मैं अपनी लाइफ में किसी के मूड स्विंग्स, कंट्रोलिंग आदतें, या ‘मेरे घर में ऐसे ही होता है’ जैसी बातें झेलने नहीं आई।” वसुधा ने चश्मा ठीक किया, “पर बेटा, ये सब बातें शादी के बाद भी तो सीखते हैं लोग। हम लोगों ने कौन सी कोई ट्रेनिंग ली थी?” सुबह की...

नीलिमा होम फूड्स

  बरसों पहले जिस गली के मोड़ पर छोटा सा ठेला लगा करता था, आज वहीं चमचमाता शोरूम खड़ा था। बड़े-बड़े अक्षरों में नाम लिखा था—“नीलिमा होम फूड्स।” शीशे के भीतर सजे मसाले, अचार, मुरब्बे, पापड़, और रेडी-टू-कुक मिक्स ऐसे रखे थे जैसे किसी प्रदर्शनी में हों। भीतर ए.सी. की ठंडी हवा थी, बाहर लोगों की भीड़। यह सब देखकर नीलिमा के चेहरे पर गर्व नहीं, एक सादगी भरी थकान उतर आती थी। वह आज भी वही सूती साड़ी पहनती थी, बालों में वही सादा सा जूड़ा और माथे पर छोटी सी बिंदी। फर्क बस इतना था कि अब उसके हाथों में बहीखाता नहीं, कंपनी का टैबलेट होता था… और उसकी जेब में चिल्लर नहीं, कार्ड। पर उसकी आँखें—उनमें आज भी वही पुरानी चुप्पी थी, जो कभी तानों से पैदा हुई थी और आज भी जरूरत पड़ने पर लौट आती थी। नीलिमा के पति प्रकाश तब दुनिया में नहीं थे। उनके जाने के बाद नीलिमा ने बच्चों के साथ मिलकर काम को सँभाला था। प्रकाश की तस्वीर आज भी ड्रॉइंग रूम में उसी जगह टंगी थी, जैसे घर का सबसे बड़ा बुजुर्ग वहीं बैठा हो—सबको देख रहा हो, सुन रहा हो। “तुम्हारे पापा होते तो कितना खुश होते,” नीलिमा अक्सर तस्वीर से कहती, और फिर क...

वक्त

  बरसों पहले जिस गली के मोड़ पर छोटा सा ठेला लगा करता था, आज वहीं चमचमाता शोरूम खड़ा था। बड़े-बड़े अक्षरों में नाम लिखा था—“नीलिमा होम फूड्स।” शीशे के भीतर सजे मसाले, अचार, मुरब्बे, पापड़, और रेडी-टू-कुक मिक्स ऐसे रखे थे जैसे किसी प्रदर्शनी में हों। भीतर ए.सी. की ठंडी हवा थी, बाहर लोगों की भीड़। यह सब देखकर नीलिमा के चेहरे पर गर्व नहीं, एक सादगी भरी थकान उतर आती थी। वह आज भी वही सूती साड़ी पहनती थी, बालों में वही सादा सा जूड़ा और माथे पर छोटी सी बिंदी। फर्क बस इतना था कि अब उसके हाथों में बहीखाता नहीं, कंपनी का टैबलेट होता था… और उसकी जेब में चिल्लर नहीं, कार्ड। पर उसकी आँखें—उनमें आज भी वही पुरानी चुप्पी थी, जो कभी तानों से पैदा हुई थी और आज भी जरूरत पड़ने पर लौट आती थी। नीलिमा के पति प्रकाश तब दुनिया में नहीं थे। उनके जाने के बाद नीलिमा ने बच्चों के साथ मिलकर काम को सँभाला था। प्रकाश की तस्वीर आज भी ड्रॉइंग रूम में उसी जगह टंगी थी, जैसे घर का सबसे बड़ा बुजुर्ग वहीं बैठा हो—सबको देख रहा हो, सुन रहा हो। “तुम्हारे पापा होते तो कितना खुश होते,” नीलिमा अक्सर तस्वीर से कहती, और फिर क...