तृषा ने दादी का हाथ पकड़कर हल्का सा दबाया, “दादी, आपने बहुत निभाया… और मैं आपकी इज्ज़त करती हूँ। मगर मैं चाहती हूँ कि निभाने का मतलब ‘खुद को मिटा देना’ न हो। मैं वही गलती नहीं दोहराना चाहती।” शरद ने हँसकर माहौल हल्का करना चाहा, “तुम्हारी बेटी तो शादी से पहले ही ‘रिस्क मैनेजमेंट’ कर रही है।” किरण का चेहरा थोड़ा सख्त हो गया, “रिस्क मैनेजमेंट? या रिश्तों से डर? कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम्हें भरोसा करना ही नहीं आता?” तृषा ने बिना बहस किए सिर हिलाया, “भरोसा करना आता है, मम्मा। बस आँख बंद करके नहीं। मैं किसी को मौका दूँगी, लेकिन खुद को गिरवी रखकर नहीं।” उस रात बातचीत वहीं खत्म हो गई, पर किरन की आँखों में चिंता टिक गई। उसे लगता था बेटी बहुत तेज़ हो गई है; और वसुधा को लगता था—ज़माना बदल गया है, पर दिल तो वही है, उसे कैसे समझाएँ? कुछ ही दिनों बाद तृषा की ट्रेन थी। उसे हैदराबाद नई नौकरी के लिए जाना था। स्टेशन पर भीड़ के बीच किरन बार-बार उसका चेहरा देख रही थी, जैसे आँखों में भरकर रख लेना चाहती हो। “ख्याल रखना,” किरन ने बस इतना कहा। तृषा ने माँ के माथे को चूमा, “मैं अपना भी ख्याल रखूँगी और आपक...