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भरोसा कागज से नहीं… आदत से बनता है।

 “मैं शादी को ‘लॉटरी’ नहीं मानती, पापा… मैं तो इसे ‘प्रोजेक्ट’ मानती हूँ।” रसोई में रखा चाय का कप उठाते हुए तृषा ने ऐसे कहा जैसे वह किसी मीटिंग में प्रेज़ेंटेशन दे रही हो।

डाइनिंग टेबल पर बैठे उसके पिता शरद अग्रवाल अख़बार से झाँककर मुस्कुराए। “वाह! फिर तो तुम्हारी शादी का ‘प्रोजेक्ट मैनेजर’ मैं नहीं, तुम खुद हो।”

तृषा खिलखिला दी। सामने बैठी उसकी माँ किरण और दादी वसुधा ने एक-दूसरे को देखा—उन नज़रों में चिंता भी थी और हैरानी भी।

किरण ने गहरी साँस ली, “अच्छा, ज़रा साफ़-साफ़ बोलो… तुम्हारे मन में चल क्या रहा है? शादी कोई ऑफिस का टास्क है क्या?”

तृषा ने उँगलियों से अपने बाल पीछे किए, “मम्मा, मैं भागकर शादी नहीं कर रही। मैं बस चाहती हूँ कि जो रिश्ता बने, वो समझदारी से बने। प्यार ठीक है, पर प्यार के साथ ज़िम्मेदारी, सम्मान और सीमाएँ भी तो हों। मैं अपनी लाइफ में किसी के मूड स्विंग्स, कंट्रोलिंग आदतें, या ‘मेरे घर में ऐसे ही होता है’ जैसी बातें झेलने नहीं आई।”

वसुधा ने चश्मा ठीक किया, “पर बेटा, ये सब बातें शादी के बाद भी तो सीखते हैं लोग। हम लोगों ने कौन सी कोई ट्रेनिंग ली थी?”


सुबह की धूप अभी पूरी तरह तेज़ नहीं हुई थी, मगर स्टेशन के बाहर की भीड़ और गाड़ियों के हॉर्न से शहर जाग चुका था। अंशुमान जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाता जा रहा था। एक हाथ में फाइलों का बैग, दूसरे में पिता हरिहर का हाथ। हरिहर जी का हाथ अब पहले जैसा मजबूत नहीं रहा था। उँगलियाँ हल्की-हल्की काँपती थीं, पकड़ ढीली रहती थी, पर अंशुमान ने उस हाथ को ऐसे थामा था जैसे कोई कीमती चीज़ थामे हो—ध्यान से, संभालकर, बिना हड़बड़ी के।

आज अंशुमान की कंपनी में एक महत्वपूर्ण मीटिंग थी। बाहर से आई क्लाइंट टीम—बड़े लोग, बड़े नाम, बड़ी डील। अंशुमान को उसी मीटिंग के बाद एक प्रमोशन की घोषणा भी मिलने वाली थी, ऐसा उसके मैनेजर ने संकेत दिया था। लेकिन आज ही उसके पिता की डॉक्टर अपॉइंटमेंट भी थी। कई हफ्तों से हरिहर जी के पैर सूज रहे थे, साँस भी जल्दी फूल जाती थी। डॉक्टर ने साफ कहा था—टेस्ट जरूरी हैं, देर मत कीजिए।

अंशुमान ने ऑफिस को पहले ही बता दिया था कि वह दो घंटे लेट हो सकता है। सहकर्मियों ने तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ दीं। किसी ने कहा, “इतनी बड़ी मीटिंग में लेट? रिस्क मत लो यार।” किसी ने हँसकर कहा, “घर में कोई और नहीं है क्या?” और किसी ने मजाक में ताना मार दिया, “अब तुम इतने बड़े आदमी हो गए… पैरेंट्स के चक्कर में मत पड़ो।”

अंशुमान ने मुस्कुराकर सब टाल दिया, पर भीतर कहीं एक चिंता जरूर थी—क्या सच में वह दो दुनियाओं के बीच फँस गया है? करियर की रफ्तार और पिता की धीमी चाल।

अस्पताल में लाइन लंबी थी। रिसेप्शन पर भीड़, कुर्सियों पर बैठे लोग, बच्चों की रोने की आवाज़, और दवाइयों की हल्की-सी गंध। हरिहर जी को बैठाया तो वे धीरे से बोले, “बेटा, तू जा… मैं अकेला बैठ जाऊँगा… तेरी मीटिंग—”

“पापा, मीटिंग रोज होती है,” अंशुमान ने उनकी बात काट दी, “आप रोज नहीं।”

हरिहर जी ने नजरें झुका लीं। उनके चेहरे पर वह भाव था जो बूढ़े माता-पिता अक्सर छुपाते हैं—बोझ बनने का डर।

टेस्ट हो गए, डॉक्टर ने दवाइयाँ बदलीं और सख्त हिदायत दी—नमक कम, चलना थोड़ा, और तनाव बिलकुल नहीं। बाहर निकलते समय हरिहर जी का पैर लड़खड़ा गया। अंशुमान ने तुरंत उन्हें संभाला। पास खड़े एक युवक ने देखा और धीमे से अपने दोस्त से बोला, “देख… कितना टाइम है लोगों के पास… पिता को लेकर घूम रहा है।” दोस्त ने कंधे उचकाए, “अरे छोड़, हमारे घर में तो ये सब नहीं होता।”

अंशुमान ने सुना… पर अनसुना कर दिया। पिता की बाँह को और मजबूत पकड़कर वह बाहर की तरफ चल पड़ा।

ऑफिस पहुँचते-पहुँचते दोपहर हो गई थी। मीटिंग शुरू हो चुकी थी। अंशुमान ने पिता को पास के एक शांत कैफे में बिठाया—वहीं जहां ऑफिस की बिल्डिंग से सामने ही हरियाली वाला छोटा सा कोना था। उसने सोचा, पापा थोड़ी देर आराम कर लेंगे, मैं मीटिंग निपटा कर वापस आ जाऊँगा।

कैफे में हल्की-सी म्यूजिक, कॉफी की खुशबू, और खिड़की से आती धूप। हरिहर जी कुर्सी पर बैठकर आसपास देख रहे थे। अंशुमान ने उनके सामने पानी रखा, एक सैंडविच ऑर्डर किया और बोला, “पापा, बस बीस मिनट। मैं अभी आया।”

हरिहर जी ने सिर हिलाया, “ठीक है बेटा… तू अपनी चिंता कर।”

अंशुमान तेज़ कदमों से ऑफिस की ओर बढ़ा। लिफ्ट में उसने अपनी शर्ट के बटन ठीक किए, बाल सलीके से किए, और एक गहरी साँस ली। आज का दिन उसके लिए निर्णायक था।

मीटिंग रूम में जैसे ही वह पहुँचा, उसकी मैनेजर की निगाहें उस पर टिक गईं—सवाल भी था, खीज भी। क्लाइंट टीम के लोग अंदर बैठे थे, स्लाइड चल रही थी। अंशुमान ने बहुत संयम से “सॉरी” कहा और अपनी सीट पर बैठ गया। उसकी आवाज़ मीटिंग के शोर में छोटी लग रही थी, मगर उसके भीतर आत्मविश्वास था—काम उसे आता था।

मीटिंग खत्म होते-होते वातावरण थोड़ा सहज हुआ। अंशुमान ने अपनी प्रस्तुति इतनी सटीक दी कि क्लाइंट ने अंत में तारीफ भी की। मैनेजर ने उसकी ओर देखते हुए बस इतना कहा, “गुड। लेकिन टाइमिंग…।”

अंशुमान ने जवाब नहीं दिया। उसके दिमाग में पिता ही थे—क्या वे ठीक से बैठे हैं? क्या उन्हें कोई परेशानी तो नहीं?

मीटिंग के बाद उसने तुरंत कैफे की ओर कदम बढ़ाए। अंदर पहुँचा तो देखा—पिता के सामने खाना रखा है, मगर प्लेट के किनारे पर कुछ गिरा हुआ है। हरिहर जी की उँगलियाँ काँप रही थीं। वे चम्मच से सूप उठाने की कोशिश कर रहे थे, पर आधा सूप मेज पर छलक गया था। उनकी आँखों में घबराहट और शर्म का मिश्रण था। ठीक उसी समय, पास वाली टेबल पर बैठे दो ऑफिस कर्मचारी—शायद उसी बिल्डिंग के—एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा रहे थे। उनमें से एक ने धीमे से कहा, “ये देखो… ऐसे लोग बाहर क्यों आते हैं? घर पर रहना चाहिए।”

अंशुमान के कदम एक पल को ठिठक गए। उसकी गर्दन गर्म हो गई। उसे लगा जैसे किसी ने उसके भीतर की नस पर उँगली रख दी हो। एक पल के लिए मन में आया—काश, यह दृश्य कोई न देखे। काश, उसके पिता की यह कमजोरी उसकी आज की सफलता के सामने न आ जाए।

लेकिन उसी पल उसने पिता की आँखों में देखा—वहाँ शर्म थी, और साथ ही एक डर… कि बेटा नाराज़ न हो जाए।

अंशुमान ने तुरंत अपना बैग कुर्सी पर रखा और मुस्कुराकर पिता के पास बैठ गया। बहुत स्वाभाविकता से उसने नैपकिन उठाई, मेज साफ की और कहा, “कोई बात नहीं पापा, मैं भी तो अक्सर ऑफिस में कॉफी गिरा देता हूँ।”

हरिहर जी ने जैसे राहत की साँस ली। फिर भी उनकी आवाज़ कांप रही थी, “बेटा… आज तेरी वजह से नहीं, मेरी वजह से… लोग—”

अंशुमान ने उनकी बात पूरी नहीं होने दी। उसने धीरे से पिता का हाथ अपने हाथ में लिया, “पापा, आप जानते हैं जब मैं पाँच साल का था और दूध गिरा देता था, तो आप क्या करते थे?”

हरिहर जी ने हैरानी से देखा, “क्या?”

अंशुमान ने मुस्कुरा कर कहा, “आप कहते थे—कोई बात नहीं, सीख जाओगे। और फिर आप खुद कपड़ा लेकर साफ करते थे।”

हरिहर जी की आँखें भर आईं। उनके होंठ काँपने लगे, पर इस बार शर्म से नहीं—कृतज्ञता से। अंशुमान ने बिना किसी बनावटीपन के सूप का चम्मच उठाया और कहा, “लाइए, आज मैं आपको खिलाता हूँ। आराम से।”

पास वाली टेबल पर बैठे दोनों लोग चुप हो गए। उनकी हँसी कहीं गायब हो चुकी थी। कैफे के काउंटर के पास खड़े एक बुजुर्ग ने यह दृश्य देखा और कुछ देर तक देखते रहे—जैसे किसी पुराने गीत की धुन सुन रहे हों।

अंशुमान ने पिता को धीरे-धीरे खाना खिलाया, बीच-बीच में पानी पिलाया। फिर खुद भी दो कौर खाए। हरिहर जी ने धीमे से कहा, “तू बड़ा आदमी बन गया बेटा…”

अंशुमान ने सिर हिलाया, “बड़ा आदमी नहीं पापा… बस आपका बेटा।”

खाना खत्म हुआ। अंशुमान बिल देने काउंटर पर गया। कार्ड स्वाइप करते समय उसकी उंगलियाँ अब स्थिर थीं। उसे भीतर एक अजीब-सा सुकून महसूस हो रहा था—जैसे किसी परीक्षा में पास हो गया हो, लेकिन वह परीक्षा क्लाइंट की नहीं थी, इंसानियत की थी।

वह बिल लेकर लौटा। पिता धीरे-धीरे उठे। अंशुमान ने उनका सहारा दिया। बाहर निकलते समय वही बुजुर्ग सज्जन उनके पास आए। सफेद बाल, सादा कपड़े, आँखों में गहराई।

उन्होंने अंशुमान से कहा, “बेटा, एक बात कहूँ?”

अंशुमान ने आदर से कहा, “जी।”

सज्जन ने मुस्कुराकर कहा, “आप यहाँ कुछ छोड़कर जा रहे हैं।”

अंशुमान ने हैरानी से अपनी जेबें टटोलीं, “नहीं सर… सब है।”

सज्जन ने धीरे से कहा, “जेब में नहीं… लोगों के मन में। आपने यहाँ बैठे हर उस बेटे के लिए एक आईना छोड़ दिया है, जो अपने पिता की कमजोरी से शर्मिंदा होता है… और हर उस पिता के लिए एक उम्मीद छोड़ दी है, जो सोचता है कि वह अब बोझ बन गया है।”

हरिहर जी की आँखों से आँसू टपक पड़े। उन्होंने कांपते हाथ जोड़ दिए। अंशुमान की आँखें भी नम हो गईं। उस क्षण उसे लगा कि प्रमोशन, डील, तारीफ—सब अपनी जगह हैं, लेकिन आज जो उसने किया, वह उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी जीत है।

कार में बैठते समय हरिहर जी बोले, “मुझे माफ कर दे बेटा… मैंने तुझे—”

अंशुमान ने तुरंत कहा, “पापा, माफी किस बात की? आप तो वही हैं, जिन्होंने मुझे चलना सिखाया… गिरकर उठना सिखाया… और आज मैं आपको बस थोड़ा सहारा दे रहा हूँ।”

हरिहर जी खिड़की से बाहर देखते रहे। उनके चेहरे पर संतोष था—ऐसा संतोष जो दवा से नहीं मिलता।

घर पहुँचे तो किराए की सीढ़ियाँ चढ़ते समय हरिहर जी थक गए। अंशुमान ने उन्हें धीरे से बैठाया और पानी दिया। फिर दवा निकालकर समय पर दी।

रात को जब अंशुमान अपने कमरे में आया, तो फोन पर मैनेजर का संदेश आया—“क्लाइंट बहुत खुश हैं। प्रमोशन प्रोसेस आगे बढ़ेगा।”

अंशुमान ने स्क्रीन देखा, मुस्कुराया, और फोन उल्टा रख दिया। उसके मन में कैफे वाला दृश्य घूम रहा था। वह समझ गया था—सफलता का असली मतलब सिर्फ ऊँचा पद नहीं, ऊँचा चरित्र भी है।

उसी रात उसने पिता के कमरे का दरवाज़ा खटखटाया। भीतर से धीमी आवाज़ आई, “कौन?”

“मैं,” अंशुमान ने कहा।

हरिहर जी ने दरवाज़ा खोला। अंशुमान ने उनके पैर छुए। हरिहर जी घबरा गए, “ये क्या कर रहा है?”

अंशुमान ने कहा, “आज मुझे लगा… मैं जितना भी आगे बढ़ जाऊँ, अगर मैं आपके सम्मान में छोटा पड़ गया, तो मेरी सारी ऊँचाई बेकार है। आपसे ही तो मेरी शुरुआत है।”

हरिहर जी की आँखें भर आईं। उन्होंने बेटे के सिर पर हाथ रखा।

और उस हाथ में अब काँपने के बावजूद एक आशीर्वाद था—जो किसी कवच की तरह बेटे के चारों ओर फैल गया।

कई दिनों बाद जब अंशुमान ऑफिस की उसी कैफे के सामने से गुज़रा, उसने देखा—वही दो कर्मचारी अपनी टेबल पर बैठे थे। उनमें से एक ने अंशुमान को देखकर सिर झुका लिया। दूसरा उठा और धीरे से बोला, “भाई… उस दिन… सॉरी।”

अंशुमान ने बस मुस्कुराकर कहा, “कोई बात नहीं। बस अपने घर में भी वही करना… जो उस दिन देख कर तुम्हें सही लगा।”

वह आगे बढ़ गया। उसके कदम हल्के थे। क्योंकि उसके भीतर एक बात पक्की हो चुकी थी—बुज़ुर्गों की कमजोरी शर्म नहीं होती, वह हमारी जिम्मेदारी होती है।

और जो जिम्मेदारी को प्यार में बदल देता है, वही सच में बड़ा बनता है।

लेखिका : आरती शुक्ला 


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