बरसों पहले जिस गली के मोड़ पर छोटा सा ठेला लगा करता था, आज वहीं चमचमाता शोरूम खड़ा था। बड़े-बड़े अक्षरों में नाम लिखा था—“नीलिमा होम फूड्स।” शीशे के भीतर सजे मसाले, अचार, मुरब्बे, पापड़, और रेडी-टू-कुक मिक्स ऐसे रखे थे जैसे किसी प्रदर्शनी में हों। भीतर ए.सी. की ठंडी हवा थी, बाहर लोगों की भीड़।
यह सब देखकर नीलिमा के चेहरे पर गर्व नहीं, एक सादगी भरी थकान उतर आती थी। वह आज भी वही सूती साड़ी पहनती थी, बालों में वही सादा सा जूड़ा और माथे पर छोटी सी बिंदी। फर्क बस इतना था कि अब उसके हाथों में बहीखाता नहीं, कंपनी का टैबलेट होता था… और उसकी जेब में चिल्लर नहीं, कार्ड।
पर उसकी आँखें—उनमें आज भी वही पुरानी चुप्पी थी, जो कभी तानों से पैदा हुई थी और आज भी जरूरत पड़ने पर लौट आती थी।
नीलिमा के पति प्रकाश तब दुनिया में नहीं थे। उनके जाने के बाद नीलिमा ने बच्चों के साथ मिलकर काम को सँभाला था। प्रकाश की तस्वीर आज भी ड्रॉइंग रूम में उसी जगह टंगी थी, जैसे घर का सबसे बड़ा बुजुर्ग वहीं बैठा हो—सबको देख रहा हो, सुन रहा हो।
“तुम्हारे पापा होते तो कितना खुश होते,” नीलिमा अक्सर तस्वीर से कहती, और फिर काम में लग जाती।
समय बदला, किस्मत बदली, पर नीलिमा का स्वभाव नहीं बदला। वह अभी भी हर स्टोर पर खुद जाती, स्टाफ की परेशानियाँ सुनती, मजदूरों का हाल पूछती, और बीच-बीच में किसी नए लड़के को काम सिखाते हुए कहती, “दाम बढ़ जाए, शोहरत बढ़ जाए… पर इंसानियत मत घटने देना।”
उस दिन सुबह-सुबह फोन आया।
“दीदी! जल्दी आ जाना… समय से,” आवाज़ में मिठास टपक रही थी। “परसों का कार्यक्रम बड़ा खास है। हमारे बेटे राघव की सगाई है। आप ही की तो बड़ी बहन जैसी हो आप। और हाँ… गाड़ी भेज दूँ? ड्राइवर भी साथ रहेगा।”
फोन करने वाली थी सुजाता—नीलिमा की देवरानी नहीं, ननद नहीं… बस रिश्ते में ‘भाभी’ कहलाने वाली एक ऐसी स्त्री, जिसने सालों तक नीलिमा को “ठेले वाली” कहकर उसके आत्मसम्मान को चुभोया था।
नीलिमा के हाथ में फोन था, पर उँगलियाँ जैसे सुन्न पड़ गईं।
“नहीं… हम आ जाएंगे,” नीलिमा ने बहुत शांत स्वर में कहा और फोन काट दिया।
फोन कटते ही वह कुछ देर खाली दीवार को देखती रही। रसोई से हल्की सी लौकी की खुशबू आ रही थी। घर में सब सामान्य था, पर उसके भीतर कोई पुरानी कहानी फिर से जाग गई थी—वो कहानी जिसे वह खुद से भी छुपाकर जीती रही थी।
वो दिन उसे याद आया जब वह पहली बार शहर के बड़े घर में बहू बनकर गई थी। उसके मायके की हालत साधारण थी, और ससुराल में रिश्ते… बस नाम के थे। नीलिमा को पढ़ाई का शौक था, लेकिन शादी के बाद पढ़ाई छूट गई। उसने घर संभाला, सबकी सेवा की, फिर भी हर बात पर सुनना पड़ा—“ये तो हमारे घर की नहीं… बाहर से आई है।”
और जब उसने अपने हाथ से बनाए अचार की खुशबू से घर में माहौल बदला, तब भी तारीफ नहीं मिली। सुजाता तब कहती थी, “अचार बनाना कौन सी बड़ी बात है? हर औरत बनाती है।”
एक बार नीलिमा ने त्यौहार पर सबको नए कपड़े दिलाने की जिद की थी। सुजाता ने हँसकर कहा था, “तुम्हारे बस की बात नहीं है भाभी। तुम तो दो रुपये का हिसाब रखो, बस।”
उस दिन नीलिमा रात भर रोई थी। प्रकाश ने बस इतना कहा था, “देखो नीलू, लोग अपने भीतर की कमी दूसरों को नीचा दिखाकर छुपाते हैं। तू अपना काम कर।”
और नीलिमा ने सच में अपना काम किया। पहले छोटे से ठेले पर, फिर दो कमरों की दुकान में, फिर शहर भर में… और आखिर देश भर में।
सफलता जब आई तो नीलिमा के दरवाज़े पर बहुत लोग आ गए। वे लोग भी—जो कभी मुड़कर देखते तक नहीं थे।
सगाई वाले दिन नीलिमा अपने दोनों बच्चों के साथ तय समय से पहले ही पहुँच गई। उसने जान-बूझकर कोई भारी ज़ेवर नहीं पहना। बस कान में छोटे झुमके, और हाथ में एक साधारण सा बैग। उसके बेटे ईशान ने कहा, “माँ, आप चाहें तो डायमंड सेट पहन लें… आप ही की तो साख है।”
नीलिमा ने मुस्कुरा कर कहा, “साख कपड़े से नहीं, व्यवहार से बनती है बेटा।”
कार्यक्रम किसी बड़े होटल में था। प्रवेश द्वार पर फूलों की मेहराब, भीतर संगीत, और कैमरे की फ्लैश। जैसे ही नीलिमा अंदर आई, सुजाता दौड़ती हुई आई और दोनों हाथ जोड़कर बोली, “दीदी! आप आ गईं! हमने तो सोच ही लिया था आप नाराज़ होंगी। चलिए… आपको सबसे आगे वाली सीट दिलवाती हूँ। और ये… ये आपका पसंदीदा पान… मैंने खास मंगवाया है।”
नीलिमा ने शांति से ‘हाँ’ में सिर हिलाया।
कुछ ही देर में सुजाता के पति सुरेश आए। “दीदी… आपका आना हमारे लिए सौभाग्य है। आप तो हमारे घर की लक्ष्मी हैं।”
नीलिमा ने बस मुस्कुरा दिया।
वो लोग उसकी हर बात पर हँस रहे थे, हर कदम पर “दीदी-दीदी” कर रहे थे। कार्यक्रम में जैसे ही कोई बड़ा आदमी आता, सुजाता तुरंत कहती—“ये हमारी दीदी हैं… नीलिमा होम फूड्स वाली… इनके बिना हमारा घर अधूरा है।”
नीलिमा को यह सब सुनकर न गर्व हुआ, न खुशी। बस भीतर से एक पुराना घाव कुरेदने लगा। वो सोच रही थी—जब मैं “घर का हिस्सा” थी तब मैं किसी को दिखाई नहीं दी… आज मेरा नाम ब्रांड बन गया तो मैं “लक्ष्मी” बन गई?
सगाई का समय हुआ। राघव और लड़की साक्षी मंच पर बैठे। परिवार वालों को बुलाया गया। सुजाता ने नीलिमा का हाथ पकड़ा और उसे सबसे आगे ले गई।
“दीदी, आप ही आशीर्वाद दीजिए… आपके हाथ का स्पर्श शुभ होता है,” सुजाता बोली।
नीलिमा ने राघव के माथे पर हाथ रखा और धीमे से कहा, “सुखी रहो।”
साक्षी ने नीलिमा के पैर छुए। नीलिमा ने उसे उठाकर गले लगाया।
और उसी पल नीलिमा की नजर मंच के पीछे रखी एक पुरानी सी प्लेट पर पड़ी, जिसमें रस्म के लिए रखी चीजें थीं। वही पुरानी याद—जब नीलिमा को रस्म में पीछे खड़ा कर दिया गया था। तब कहा गया था, “भाभी, आप रहने दीजिए… ये सब सुजाता करेगी… घर की बात है।”
उस दिन नीलिमा ने खुद को छोटा महसूस किया था। आज वही लोग उसे आगे खींच रहे थे।
कार्यक्रम समाप्त हुआ। लौटते वक्त नीलिमा ने कार में बैठकर गहरी साँस ली। घर पहुँचकर उसने सीधे स्नान किया और फिर ड्रॉइंग रूम में आकर प्रकाश की तस्वीर के सामने बैठ गई।
उसके हाथ में एक कप चाय था, पर चाय ठंडी हो रही थी।
“देखा?” नीलिमा ने तस्वीर से कहा, “आज वही लोग… जो कल तक मुझे छूने से भी कतराते थे… आज मेरे आगे पीछे घूम रहे थे।”
उसकी आँखें भर आईं।
“कितनी अजीब बात है प्रकाश… इंसान नहीं, नाम बोलता है। पैसा बोलता है। आज उनकी जुबान पर मेरे लिए सम्मान है, क्योंकि मेरी दुकानें हैं, मेरे बोर्ड हैं, मेरी गाड़ी है… वरना नीलिमा तो वही थी… वही हाथ… वही दिल… वही सेवा।”
तस्वीर चुप थी। पर उसकी चुप्पी में जैसे नीलिमा को जवाब मिल रहा था।
इतने में ईशान आ गया। उसने माँ की आँखों को देखा तो समझ गया। “माँ… आपको अच्छा नहीं लगा, है ना?”
नीलिमा ने धीरे से कहा, “अच्छा-बुरा नहीं बेटा… बस सच कड़वा है।”
“तो फिर आप उनसे बात क्यों नहीं करतीं? उनसे कह देतीं कि आपने क्या-क्या झेला है?”
नीलिमा ने ईशान का हाथ पकड़कर अपने पास बैठाया। “कहकर क्या मिल जाएगा? उन्हें शर्म आएगी? शायद। पर उनके भीतर की सोच बदलेगी? जरूरी नहीं। और मैं… मैं अपना सम्मान किसी के ‘सॉरी’ से नहीं जोड़ना चाहती।”
ईशान बोला, “फिर आप क्या करेंगी?”
नीलिमा थोड़ी देर चुप रही। फिर बोली, “मैं वही करूँगी जो मैंने हमेशा किया… सम्मान देना सीखूँगी, पर अपमान सहना नहीं। मैं उनसे मेलजोल रखूँगी, पर अपने आत्मसम्मान की सीमा तय करके।”
“कैसे?” ईशान ने पूछा।
नीलिमा ने शांत स्वर में कहा, “आज सुजाता बहुत मीठी थी। पर मैं जानती हूँ, यह मिठास मेरे नाम की है, मेरे अस्तित्व की नहीं। इसलिए मैं अब रिश्तों में भी वही नियम रखूँगी जो व्यापार में रखती हूँ—स्पष्टता, सीमा और गरिमा।”
ईशान उसकी ओर देखता रहा। माँ की आंखों में आँसू थे, पर आवाज़ में मजबूती।
अगले दिन सुजाता का फोन फिर आया। “दीदी, आपके लिए खास गिफ्ट रख दिया है… आकर ले जाइए। और हाँ… राघव की नौकरी के लिए अगर आप कुछ… मतलब… आपके पहचान के लोग…”
नीलिमा ने फोन कान पर रखा, आँखें बंद कीं और धीरे से कहा, “सुजाता, सुनो… मैं मदद कर दूँगी, पर एक बात याद रखना—मेरा नाम इस्तेमाल करने से पहले, मेरे इंसान होने का सम्मान करना सीखो। तुम लोगों की मिठास अगर सच है, तो वह तब भी रहे जब मुझे तुमसे कुछ नहीं चाहिए होगा, और तुम्हें मुझसे कुछ नहीं चाहिए होगा।”
उधर सन्नाटा हो गया।
नीलिमा ने बात आगे बढ़ाई, “और एक बात… सगाई में जो तुमने मुझे आगे बुलाया, अच्छा लगा। पर आगे भी अगर किसी बहू-बेटी को कभी ‘पीछे’ खड़ा करने का मन हो, तो याद कर लेना—अपमान का स्वाद बहुत लंबे समय तक जीभ पर रहता है।”
सुजाता की आवाज़ धीमी पड़ गई। “दीदी… मुझे… मुझे समझ नहीं आया था…”
नीलिमा ने शांत होकर कहा, “अब समझ लो। बस यही काफी है।”
फोन कट गया।
नीलिमा ने खिड़की से बाहर देखा। सड़क पर लोग भाग रहे थे, गाड़ियाँ चल रही थीं। समय अपनी गति से चल रहा था। पर नीलिमा के भीतर आज एक बदलाव हो चुका था—उसने अपने दर्द को कमजोरी नहीं बनने दिया, और अपनी सफलता को घमंड नहीं बनने दिया।
उसने सीख लिया था कि इज्ज़त पैसे से जरूर खरीद ली जाती है, पर आत्मसम्मान किसी कीमत पर नहीं बिकता। और जो रिश्ते सिर्फ चमक देखकर करीब आते हैं, उनसे दूर रहना ही समझदारी है—लेकिन बिना कड़वाहट के, बस सीमा के साथ।
लेखिका : रीना अग्रवाल
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