Skip to main content

Posts

Showing posts from January, 2026

आप अमीर हैं या गरीब, यह आपकी जेब नहीं, आपकी सोच तय करती है

  अमावस की काली रात थी और आसमान मानो धरती को डुबो देने की कसम खाकर बरसा जा रहा था। बादलों की गड़गड़ाहट से खिड़कियों के पुराने पल्ले थरथरा रहे थे। शहर के बाहरी इलाके में, एक तंग गली के आखिरी छोर पर बने एक जर्जर मकान में केशव और उसकी पत्नी सुधा रहते थे। गरीबी ने उनके घर की दीवारों का प्लास्टर उधेड़ दिया था, लेकिन उनके हौसलों की चमक को फीका नहीं कर पाई थी। केशव एक छोटी सी प्रिंटिंग प्रेस में काम करता था, जहाँ उसे दिहाड़ी के हिसाब से पैसे मिलते थे। सुधा घरों में सिलाई-कढ़ाई का काम करती थी। दोनों की ज़िंदगी अभावों में कट रही थी, लेकिन उनकी आँखों में एक सपना था—अपने बेटे 'आर्यन' को एक बड़ा अफ़सर बनते देखना। आर्यन अभी दस साल का था और पढ़ने में बहुत होशियार था, लेकिन पिछले कुछ महीनों से वह एक अजीब सी बीमारी से जूझ रहा था। डॉक्टरों ने कहा था कि उसके फेफड़ों में संक्रमण है और इलाज के लिए अच्छे-खासे पैसों की ज़रूरत होगी। उस रात केशव और सुधा बहुत बेचैन थे, लेकिन वजह उनकी गरीबी या बारिश नहीं थी। वजह थी एक 'उम्मीद'। दो दिन पहले, केशव को काम से लौटते वक़्त एक साधु मिले थे। साधु ने केशव के माथे की ...

सही राह

  कमरे में फैले सूटकेस और बिखरे हुए कपड़ों के बीच अनन्या की आँखों में एक अजीब सी चमक थी। यह चमक किसी उत्सव की नहीं, बल्कि एक राहत की थी। पिछले छह महीनों से वह अपने ससुराल, 'गुप्ता निवास', की चारदीवारी और जिम्मेदारियों में ऐसी उलझी थी कि उसे सांस लेने की भी फुर्सत नहीं मिली थी। आज सुबह ही उसके पिता का फोन आया था। उनकी आवाज़ में वो खनक नहीं थी जो हमेशा हुआ करती थी। "अनु, तेरी याद आ रही है बेटा। बीपी थोड़ा बढ़ा हुआ है, डॉक्टर ने आराम करने को कहा है। तू आ सकती है क्या दो-चार दिन के लिए?" पिता की उस कमजोर आवाज़ ने अनन्या के भीतर की बेटी को झकझोर दिया था। उसने तुरंत अपने पति, कबीर, से बात की। कबीर, जो स्वभाव से सुलझे हुए थे, ने तुरंत हामी भर दी थी। "अरे, इसमें पूछने की क्या बात है? पापा की तबीयत ठीक नहीं है, तुम्हें जाना ही चाहिए। मैं ऑफिस से आते वक्त तुम्हें स्टेशन छोड़ दूँगा।" अनन्या खुश थी। उसने पैकिंग शुरू कर दी थी। सासू माँ, सरिता जी, थोड़ी पुराने ख्यालों की थीं, लेकिन दिल की बुरी नहीं थीं। उन्होंने भी कह दिया था, "जा बेटा, समधी जी को देख आ। घर तो हम संभ...

एक-दूसरे की ताकत

  "हाँ माँ," अनन्या ने सुमित्रा जी की ओर एक चोर नज़र डाली, जिन्होंने अब अपनी नज़रें नीचे झुका ली थीं। "माँ, दरअसल यहाँ मम्मी जी (सास) के पैर में फ्रैक्चर है। और कल घर में बहुत बड़ी पूजा है। मैं इस हालत में उन्हें और पापाजी को अकेले छोड़कर नहीं आ सकती। यहाँ मेरी ज़्यादा ज़रूरत है। रोहन से कहना मैं वीडियो कॉल कर लूंगी। और प्लीज़, आप नाराज़ मत होना।" जुलाई की उमस भरी दोपहरी थी, लेकिन शुक्ला निवास के अंदर का माहौल मौसम की गर्मी से कहीं ज़्यादा तपा हुआ था। ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठीं सुमित्रा देवी के चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ पढ़ी जा सकती थीं। उनके सामने टेबल पर दवाइयों का एक ढेर लगा था और पास ही बैसाखियां रखी थीं। अभी तीन दिन पहले ही सीढ़ियों से उतरते वक्त उनका पैर फिसल गया था और टखने में हेयरलाइन फ्रैक्चर हो गया था। डॉक्टर ने सख्त हिदायत दी थी—"अगले तीन हफ्ते तक पैर ज़मीन पर नहीं रखना है।" लेकिन सुमित्रा जी की चिंता अपने पैर की नहीं, बल्कि उस 'महा-भोग' की थी जो उनके घर की परंपरा थी। हर साल सावन के पहले सोमवार को उनके घर में शिव-रुद्राभिषेक और पूरे ...