“हीरे वाला सेट छोटी बहू को… और असली खजाना बड़ी बहू को!” रसोई में बर्तनों की खनखनाहट के बीच बुआ जी की फुसफुसाहट साफ सुनाई दे रही थी। "अरे विमला, देख रही हो न? घर की बड़ी बहू अभी तक चूल्हे के सामने पसीना बहा रही है और छोटी वाली... वो देखो, अभी सोकर उठी है और सास उसे अपने हाथों से बादाम वाला दूध दे रही है। हद है भाई, एक ही घर में दो बहुओं के साथ इतना भेदभाव?" कावेरी ने यह सुना और उसके हाथ एक पल के लिए रुक गए। उसने अपनी साड़ी के पल्लू से चेहरे का पसीना पोंछा और एक गहरी सांस लेकर दोबारा रोटी बेलने लगी। यह उसके लिए नई बात नहीं थी। पिछले तीन सालों से, जब से वह इस 'हवेली' में ब्याह कर आई थी, और उसके छह महीने बाद जब देवरानी 'शिखा' आई, तब से यह भेदभाव रोज का किस्सा बन गया था। कावेरी, घर की बड़ी बहू, एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार से थी। पढ़ी-लिखी, समझदार और बेहद मेहनती। वहीं शिखा, शहर के एक रईस और रसूखदार खानदान की बेटी थी। शिखा के आते ही जैसे घर का नक्शा बदल गया था। सास, गायत्री देवी, जो शहर की मशहूर समाज सेविका और लोहे जैसी सख्त महिला मानी जाती थीं, शिखा के सामने मोम बन ज...