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सही राह

 कमरे में फैले सूटकेस और बिखरे हुए कपड़ों के बीच अनन्या की आँखों में एक अजीब सी चमक थी। यह चमक किसी उत्सव की नहीं, बल्कि एक राहत की थी। पिछले छह महीनों से वह अपने ससुराल, 'गुप्ता निवास', की चारदीवारी और जिम्मेदारियों में ऐसी उलझी थी कि उसे सांस लेने की भी फुर्सत नहीं मिली थी।

आज सुबह ही उसके पिता का फोन आया था। उनकी आवाज़ में वो खनक नहीं थी जो हमेशा हुआ करती थी। "अनु, तेरी याद आ रही है बेटा। बीपी थोड़ा बढ़ा हुआ है, डॉक्टर ने आराम करने को कहा है। तू आ सकती है क्या दो-चार दिन के लिए?"

पिता की उस कमजोर आवाज़ ने अनन्या के भीतर की बेटी को झकझोर दिया था। उसने तुरंत अपने पति, कबीर, से बात की। कबीर, जो स्वभाव से सुलझे हुए थे, ने तुरंत हामी भर दी थी। "अरे, इसमें पूछने की क्या बात है? पापा की तबीयत ठीक नहीं है, तुम्हें जाना ही चाहिए। मैं ऑफिस से आते वक्त तुम्हें स्टेशन छोड़ दूँगा।"

अनन्या खुश थी। उसने पैकिंग शुरू कर दी थी। सासू माँ, सरिता जी, थोड़ी पुराने ख्यालों की थीं, लेकिन दिल की बुरी नहीं थीं। उन्होंने भी कह दिया था, "जा बेटा, समधी जी को देख आ। घर तो हम संभाल ही लेंगे।"

सब कुछ ठीक चल रहा था। एक आदर्श परिवार की तरह। लेकिन तभी घर की डोरबेल बजी और उस घंटी की आवाज़ के साथ ही घर का मौसम बदल गया।

दरवाजे पर कबीर की बुआ, यानी अनन्या की बुआ सास, 'विमला देवी' खड़ी थीं।

विमला देवी का व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा था कि उनके आते ही हवा का रुख बदल जाता था। वे घर की सबसे बड़ी थीं, क्योंकि उनके पति का देहांत जल्दी हो गया था और वे अपनी ससुराल छोड़कर वापस अपने मायके (यानी अनन्या के ससुराल) के पास ही एक मकान में रहती थीं। लेकिन उनका हुक्म आज भी इस घर पर चलता था।

"अरे विमला जीजी, आप? आइए-आइए," सरिता जी (अनन्या की सास) ने हड़बड़ाते हुए स्वागत किया।

विमला बुआ ने अंदर कदम रखा और उनकी बाज सी तेज़ नज़रें सीधे सोफे पर रखे अनन्या के खुले सूटकेस पर जा टिकिन्।

"यह क्या तैयारी है? कौन जा रहा है?" बुआ ने सोफे पर बैठते हुए कड़क आवाज़ में पूछा।

अनन्या पानी का गिलास लेकर आई और बुआ के पैर छुए। "नमस्ते बुआ जी। वो मैं जा रही हूँ। पापा की तबीयत थोड़ी नासाज़ है।"

विमला बुआ ने पानी का गिलास लिया, एक घूंट भरा और मेज पर ज़ोर से रख दिया।

"पापा की तबीयत नासाज़ है? तो क्या वहां डॉक्टर नहीं हैं? या फिर तुम्हारे भाई-भाभी मर गए हैं जो तुम्हें दौड़े जाने की ज़रूरत पड़ गई?"

कमरे में सन्नाटा छा गया। अनन्या की मुस्कान गायब हो गई।

सरिता जी ने बचाव करने की कोशिश की, "जीजी, वो समधी जी का बीपी बढ़ गया है। बच्ची का मन घबरा रहा है, तो मैंने ही कहा कि हो आ..."

"तुम चुप रहो सरिता!" विमला बुआ ने हाथ के इशारे से उन्हें रोक दिया। "तुम्ही ने सिर पर चढ़ा रखा है बहुओं को। इसी लाड़-प्यार ने आज के ज़माने की लड़कियों को बिगाड़ दिया है। ज़रा सी छींक आई नहीं कि मायके भागने का बहाना मिल गया।"

फिर वे अनन्या की ओर मुड़ीं। "बहू, अपना यह सूटकेस अभी अंदर रखो। तुम कहीं नहीं जा रही हो।"

अनन्या को लगा जैसे उसने गलत सुन लिया हो। "जी? बुआ जी, पापा बीमार हैं..."

"बीमार हैं तो ठीक हो जाएंगे," बुआ ने बेरुखी से कहा। "परसों से 'नवरात्रि' शुरू हो रही है। और तुम्हें पता है न कि हमारे खानदान में नवरात्रि की पहली पूजा घर की लक्ष्मी यानी बहू के हाथों ही होती है? अगर तुम चली गई, तो कलश स्थापना कौन करेगा? नौकरानी?"

"लेकिन बुआ जी, पूजा तो सासू माँ भी कर सकती हैं। और नवरात्रि में अभी दो दिन बाकी हैं। मैं कोशिश करूँगी कि वापस आ जाऊँ, लेकिन अभी मुझे जाना होगा," अनन्या ने विनम्रता से तर्क दिया।

विमला बुआ का चेहरा तमतमा गया। "कोशिश करूँगी? यह घर है या सराय? अपनी मर्जी से जाओगी और अपनी मर्जी से आओगी? मैंने कह दिया न, नहीं जाना मतलब नहीं जाना। शादी के बाद लड़की का असली घर ससुराल होता है। मायके वाले अब मेहमान हैं। उनकी बीमारी-शिमारी देखने के लिए वहां के लोग हैं। तुम्हारा धर्म यहाँ है।"

अनन्या की आँखों में आंसू आ गए। यह धर्म और कर्तव्य की बातें उसे बेतुकी लग रही थीं। उसके पिता बीमार थे और यहाँ एक पूजा के नाम पर उसे रोका जा रहा था, जबकि घर में तीन और सक्षम महिलाएं थीं जो पूजा कर सकती थीं।

"बुआ जी, धर्म तो माता-पिता की सेवा भी है," अनन्या ने धीमी लेकिन स्पष्ट आवाज़ में कहा।

यह सुनना था कि विमला बुआ आगबबूला हो गईं। "जुबान लड़ाती है? सरिता, देख रही है अपनी बहू के संस्कार? अभी तो चार दिन हुए नहीं आए और बुआ सास को धर्म सिखा रही है। सुन लड़की, जब मैं इस घर से ब्याह कर गई थी न, तो दस साल तक मायके की चौखट नहीं देखी थी। मेरे पिता की मृत्यु हुई थी तब भी मेरे सास-ससुर ने कहा था कि घर में मेहमान आए हैं, तुम नहीं जा सकतीं। और मैं नहीं गई थी। मैंने अपना धर्म निभाया था। और तू? तुझे तो बस उड़ने का बहाना चाहिए।"

अनन्या सन्न रह गई। उसे बुआ के अतीत पर दुख हुआ, लेकिन उसे यह समझ नहीं आया कि बुआ अपने साथ हुए अन्याय को 'परंपरा' का नाम देकर उस पर क्यों थोप रही हैं।

शाम को कबीर ऑफिस से आया। घर का माहौल तनावपूर्ण था। अनन्या अपने कमरे में रो रही थी और उसका सूटकेस आधा खुला पड़ा था। हॉल में विमला बुआ, सरिता जी को पुराने किस्से सुना रही थीं कि कैसे उन्होंने अपनी सास की हर बात मानी थी।

कबीर ने कमरे में आकर अनन्या को देखा। "अनु? तुम तैयार नहीं हुई? ट्रेन का टाइम हो रहा है।"

अनन्या ने सिसकते हुए कबीर को सारी बात बताई। कबीर का चेहरा गंभीर हो गया। वह बाहर हॉल में गया।

"बुआ जी, प्रणाम," कबीर ने कहा।

"जीता रह बेटा। देख, तेरी बीवी कैसे मुंह फुलाए बैठी है। मैंने बस इतना कहा कि त्योहार सिर पर है, ऐसे में घर की लक्ष्मी का जाना अपशकुन होता है," बुआ ने अपनी सफाई दी।

"बुआ जी," कबीर ने शांति से कहा, "अपशकुन जाने से नहीं, बल्कि किसी के मन को दुखाने से होता है। अनु के पापा बीमार हैं। उसे जाना है।"

"तू भी जोरू का गुलाम हो गया?" बुआ चिल्लाईं। "तुझे पता है समाज क्या कहेगा? कि गुप्ता परिवार की बहू त्योहार छोड़कर मायके भाग गई? हमारी नाक कट जाएगी।"

तभी अनन्या कमरे से बाहर आई। उसने अपना सूटकेस हाथ में ले रखा था। उसकी आँखों में अब आंसू नहीं थे, बल्कि एक अजीब सी दृढ़ता थी।

"बुआ जी," अनन्या ने कांपती लेकिन मज़बूत आवाज़ में कहा, "नाक तब नहीं कटती जब एक बेटी अपने बीमार पिता को देखने जाती है। नाक तब कटती है जब एक परिवार अपनी बहू को एक कैदी की तरह रखता है।"

"तू... तू मुझे सिखाएगी?" बुआ खड़ी हो गईं। "अगर तूने आज इस घर की देहरी लांघी, तो समझ लेना कि इस घर से तेरा रिश्ता खत्म। फिर कभी वापस मत आना।"

सरिता जी घबरा गईं। "जीजी, यह क्या कह रही हैं? बच्चा है, नासमझ है..."

"नहीं माँ जी," अनन्या ने सास को रोका। "मैं नासमझ नहीं हूँ। और बुआ जी, आप जो कह रही हैं, वो 'परंपरा' नहीं, वो आपका 'बदला' है।"

सभी चौंक गए।

अनन्या ने आगे कहा, "बुआ जी, अभी आपने कहा था कि आपके पिता की मृत्यु पर आपको जाने नहीं दिया गया था। मुझे आपके उस दर्द से सहानुभूति है। बहुत बुरा हुआ था आपके साथ। लेकिन क्या आपको उस वक्त गुस्सा नहीं आया था? क्या आपको नहीं लगा था कि आपके ससुराल वाले ज़ालिम हैं? लगा था न? फिर आज आप वही ज़ुल्म मुझ पर क्यों कर रही हैं?"

विमला बुआ का मुंह खुला का खुला रह गया। जैसे किसी ने आईना उनके सामने रख दिया हो।

"अक्सर, जिन लोगों के साथ अन्याय होता है, वे सोचते हैं कि यही नियम है और वे वही अन्याय दूसरों के साथ दोहराने लगते हैं," अनन्या ने कड़वा सच बोल दिया। "लेकिन बुआ जी, परंपरा वो है जो प्रेम बढ़ाए, वो नहीं जो इंसानियत का गला घोंट दे। अगर आज मैं नहीं गई, और कल मेरे पापा को कुछ हो गया... तो क्या मैं कभी आपको या इस घर को माफ़ कर पाऊँगी? क्या मैं कभी दिल से उस देवी की पूजा कर पाऊँगी जिसके नाम पर आपने मुझे रोका था?"

कमरे में सन्नाटा छा गया। विमला बुआ की सांसें तेज़ चल रही थीं। वे कुछ कहना चाहती थीं, पर शब्द नहीं मिल रहे थे। उनके अतीत का वो घाव, जिसे उन्होंने 'संस्कार' की पट्टी से ढक रखा था, आज अनन्या ने उसे उधेड़ दिया था। उन्हें वो दिन याद आ गया जब वे आंगन में छुपकर रोई थीं क्योंकि उन्हें पिता के अंतिम दर्शन नहीं करने दिए गए थे। उन्होंने उस दर्द को पत्थर बना लिया था।

कबीर ने आगे बढ़कर अनन्या का सूटकेस ले लिया। "चलो अनु, देर हो रही है।"

विमला बुआ ने कबीर को देखा, फिर अनन्या को।

"कबीर!" बुआ की आवाज़ गूंजी।

कबीर और अनन्या रुक गए। उन्हें लगा अब कोई श्राप मिलेगा या कोई और धमकी।

विमला बुआ अपनी जगह से हिलीं नहीं, बस उनकी नज़रें झुक गईं। उन्होंने धीमी, लगभग फुसफुसाती हुई आवाज़ में कहा, "जाओ..."

सब हैरान थे।

"जाओ..." बुआ ने फिर कहा, इस बार थोड़ी तेज़ आवाज़ में, लेकिन उसमें गुस्सा नहीं, एक भारीपन था। "इससे पहले कि मैं अपना इरादा बदल लूँ, या मेरा पुराना अहंकार फिर जाग जाए... जाओ यहाँ से।"

अनन्या ने मुड़कर बुआ को देखा। बुआ की आँखों के कोने गीले हो रहे थे। वे अपनी ही बनाई हुई जेल से बाहर निकलने की कोशिश कर रही थीं।

अनन्या वापस आई और उसने झुककर बुआ के पैर छुए। "मैं जल्दी आऊँगी बुआ जी। और आपके लिए मथुरा के पेड़े लाऊँगी, आपको पसंद हैं न?"

विमला बुआ ने अनन्या के सिर पर हाथ रखा। उनका हाथ कांप रहा था। "जा भाग जा... और सुन, अपने पिता से कहना... कहना कि बुआ ने भेजा है।"

अनन्या मुस्कुराई और कबीर के साथ बाहर निकल गई।

सरिता जी, जो अब तक सांस रोके खड़ी थीं, एक गिलास पानी लेकर विमला बुआ के पास आईं। "जीजी..."

विमला बुआ सोफे पर धम्म से बैठ गईं। उन्होंने अपनी आँखों से चश्मा हटाया और साड़ी के पल्लू से आंसू पोंछे।

"सरिता," बुआ ने रुंधे गले से कहा, "आज इस कल की आई लड़की ने मुझे हरा दिया। मैं सोचती थी कि मैं घर के नियम बचा रही हूँ, पर मैं तो बस अपनी जलन शांत कर रही थी। मुझे लगता था कि जो मैंने सहा, वो सबको सहना चाहिए। पर यह गलत है न?"

सरिता जी ने जीजी के कंधे पर हाथ रखा। "जीजी, समय बदल गया है। और अच्छा ही है कि बदल गया है। हम जिस घबराहट और घुटन में जिए, हमारी बच्चियों को उसमें नहीं जीना चाहिए।"

विमला बुआ ने खिड़की से बाहर देखा। कबीर की गाड़ी गेट से बाहर जा रही थी। बारिश शुरू हो चुकी थी, लेकिन बुआ को आज वह बारिश उदास नहीं लगी। उन्हें लगा जैसे बरसों से उनके सीने पर रखा एक भारी पत्थर पिघल कर बह गया हो।

"सही कहा तूने सरिता," बुआ ने एक गहरी सांस ली। "नवरात्रि में देवी की पूजा तो हर साल होती है, लेकिन आज इस घर से एक 'डर' की विदाई हो गई। और शायद... शायद यही असली पूजा है।"

उस रात विमला बुआ को बरसों बाद सुकून की नींद आई। उन्होंने उस जंजीर को तोड़ दिया था जो पीढ़ियों से चली आ रही थी—वह जंजीर जो कहती थी कि 'ससुराल ही औरत का नसीब है'। उन्होंने स्वीकार कर लिया था कि बहू सिर्फ एक 'पद' नहीं, एक 'इंसान' है जिसके दिल में भी वैसे ही धड़कनें हैं जैसी कभी उनके दिल में थीं।

अनन्या जब ट्रेन में बैठी, तो उसके चेहरे पर पिता से मिलने की खुशी तो थी ही, पर साथ ही एक संतोष भी था कि उसने अपनी बुआ सास का अपमान नहीं किया, बल्कि उन्हें उनके ही अतीत के भूत से आज़ाद कर दिया था। उसने साबित कर दिया था कि कभी-कभी बड़ों का आदर करने का मतलब उनकी हर बात मानना नहीं होता, बल्कि उन्हें सही राह दिखाना भी होता है।

लेखिका : आरती देवी


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