"हाँ माँ," अनन्या ने सुमित्रा जी की ओर एक चोर नज़र डाली, जिन्होंने अब अपनी नज़रें नीचे झुका ली थीं। "माँ, दरअसल यहाँ मम्मी जी (सास) के पैर में फ्रैक्चर है। और कल घर में बहुत बड़ी पूजा है। मैं इस हालत में उन्हें और पापाजी को अकेले छोड़कर नहीं आ सकती। यहाँ मेरी ज़्यादा ज़रूरत है। रोहन से कहना मैं वीडियो कॉल कर लूंगी। और प्लीज़, आप नाराज़ मत होना।"
जुलाई की उमस भरी दोपहरी थी, लेकिन शुक्ला निवास के अंदर का माहौल मौसम की गर्मी से कहीं ज़्यादा तपा हुआ था। ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठीं सुमित्रा देवी के चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ पढ़ी जा सकती थीं। उनके सामने टेबल पर दवाइयों का एक ढेर लगा था और पास ही बैसाखियां रखी थीं। अभी तीन दिन पहले ही सीढ़ियों से उतरते वक्त उनका पैर फिसल गया था और टखने में हेयरलाइन फ्रैक्चर हो गया था। डॉक्टर ने सख्त हिदायत दी थी—"अगले तीन हफ्ते तक पैर ज़मीन पर नहीं रखना है।"
लेकिन सुमित्रा जी की चिंता अपने पैर की नहीं, बल्कि उस 'महा-भोग' की थी जो उनके घर की परंपरा थी। हर साल सावन के पहले सोमवार को उनके घर में शिव-रुद्राभिषेक और पूरे मोहल्ले के लिए भंडारे का आयोजन होता था। पिछले पच्चीस सालों से यह नियम कभी नहीं टूटा था।
"अब क्या होगा, केशव?" सुमित्रा जी ने अपने पति से रुआंसे स्वर में पूछा। "परसों पूजा है। हलवाई को तो बोल दिया है, लेकिन घर की व्यवस्था? प्रसाद की तैयारी? मेहमानों की आवभगत? मैं तो हिल भी नहीं सकती। मुझे लगता है इस साल यह परंपरा टूट जाएगी। हे भोलेनाथ, यह क्या परीक्षा ले ली तुमने?"
केशव बाबू ने अखबार नीचे रखते हुए पत्नी को ढाढस बंधाया, "सुमित्रा, तुम क्यों इतनी परेशान हो रही हो? हम हलवाई से कह देंगे कि वह थोड़ा ज्यादा काम संभाल ले। या फिर इस बार कार्यक्रम छोटा कर देते हैं।"
"सवाल छोटा या बड़ा करने का नहीं है जी," सुमित्रा जी ने झुंझलाते हुए कहा। "सवाल घर की लक्ष्मी के हाथ के शगुन का है। पंडित जी को कौन बताएगा कि पूजा की थाली कैसे सजानी है? 51 तरह के भोग का क्रम क्या होगा? यह सब हलवाई थोड़ी जानता है।"
तभी रसोई से एक ट्रे में सूप और दलिया लेकर उनकी बहू, अनन्या, बाहर आई। अनन्या को ब्याह कर आए अभी मुश्किल से छह महीने हुए थे। वह एक मल्टीनेशनल कंपनी में एचआर मैनेजर थी। सुबह 9 से शाम 7 बजे तक लैपटॉप में सिर खपाने वाली अनन्या को देखकर सुमित्रा जी को अक्सर लगता था कि यह लड़की घर-गृहस्थी की बारीकियां क्या ही समझेगी। उन्हें लगता था कि अनन्या एक अच्छी 'प्रोफेशनल' हो सकती है, लेकिन एक 'सुघड़ गृहिणी' बनना अलग बात है।
अनन्या ने ट्रे मेज पर रखी और मुस्कुराते हुए बोली, "मम्मी जी, आप इतना तनाव क्यों ले रही हैं? डॉक्टर ने कहा है कि स्ट्रेस से हीलिंग प्रोसेस धीमा हो जाता है। आप पहले यह सूप पीजिए।"
सुमित्रा जी ने अनन्या की ओर देखा। "बेटा, तुझे पता नहीं है। परसों की पूजा कोई छोटी-मोटी पूजा नहीं है। उसमें बहुत विधि-विधान लगते हैं। मेरी बहनें आ रही हैं, तेरी बुआ सास आ रही हैं। वे सब पुरानी ख्यालातों की हैं। थोड़ी भी चूक हुई तो बातें बनाएंगी। मुझे डर है कि तू अकेले यह सब कैसे संभालेगी? तेरी तो मीटिंग्स भी होती हैं।"
अनन्या ने धीरे से सास के पैर के नीचे तकिया ठीक किया और उनके हाथ में चम्मच थमाते हुए बहुत आत्मविश्वास से कहा, "मम्मी जी, आप भूल रही हैं कि मैं किसकी बहू हूं? सुमित्रा शुक्ला की। मैंने पिछले छह महीनों में आपको हर त्यौहार मनाते हुए देखा है। आपकी वो लाल डायरी, जिसमें आपने पूजा की सारी विधियां लिख रखी हैं, वो मैंने कल रात ही पढ़ ली है। और रही बात मीटिंग्स की, तो मैंने अगले तीन दिनों के लिए 'वर्क फ्रॉम होम' ले लिया है, लेकिन काम कम और घर ज्यादा देखूंगी। आप बस सोफे पर बैठकर मुझे निर्देश दीजिएगा, हाथ मेरे होंगे लेकिन तरीका आपका होगा।"
सुमित्रा जी अवाक रह गईं। उन्होंने अनन्या को हमेशा जींस-टॉप में ऑफिस भागते देखा था, लेकिन आज उसकी बातों में एक अलग ही परिपक्वता थी।
अगले दो दिन घर में युद्ध स्तर पर तैयारियां शुरू हुईं। अनन्या ने वाकई कमाल कर दिया था। वह सुबह पांच बजे उठ जाती। घर की साफ-सफाई से लेकर फूलों की सजावट तक, सब कुछ उसकी निगरानी में हो रहा था। उसने अपने कान में ब्लूटूथ हेडसेट लगा रखा था जिससे वह अपनी ऑफिस कॉल्स भी ले रही थी, और हाथों से कलावा और रोली की थालियां भी सजा रही थी।
सबसे बड़ी चुनौती थी 'मखाने की खीर' बनाना, जो सुमित्रा जी की खासियत थी। भंडारे के लिए यह खीर बहुत बड़ी मात्रा में बनती थी और इसका स्वाद ही इस आयोजन की जान था।
रविवार की शाम को, पूजा से एक दिन पहले, अनन्या रसोई में बड़े पतीले के सामने खड़ी थी। पसीना उसके माथे से बह रहा था। सुमित्रा जी व्हीलचेयर पर बैठकर रसोई के दरवाजे से उसे देख रही थीं।
"अनन्या बेटा," सुमित्रा जी ने टोका, "दूध को और गाढ़ा होने दे। और केसर अभी मत डालना, उतारने से पांच मिनट पहले डालना।"
"जी मम्मी जी," अनन्या ने मुस्कुराकर जवाब दिया। उसने एक बार भी उफ्फ नहीं की।
तभी अनन्या का फोन बजा। उसने फोन स्पीकर पर डाला। दूसरी तरफ उसकी माँ थीं।
"हेलो अनु, बेटा कब निकल रही है तू?" माँ की आवाज में उत्साह था। "तेरा भाई अमेरिका से आ रहा है कल सुबह। उसने खास तेरे लिए गिफ्ट्स लिए हैं। हमने लंच का प्रोग्राम रखा है, सब रिश्तेदार आ रहे हैं। तू आ रही है न?"
अनन्या का हाथ पल भर के लिए रुका। सुमित्रा जी के कान खड़े हो गए। उन्हें याद आया कि अनन्या ने दस दिन पहले ही बताया था कि उसका भाई तीन साल बाद विदेश से आ रहा है और उसे मायके जाना है। सुमित्रा जी को अपनी चोट और पूजा की हड़बड़ी में यह बात याद ही नहीं रही थी।
अनन्या ने कड़छी चलाते हुए सहज भाव से कहा, "माँ, मैं कल नहीं आ पाऊंगी। शायद अगले हफ्ते भी नहीं।"
"क्या?" उधर से माँ की निराश आवाज आई। "पर बेटा, रोहन तो परसों वापस चला जाएगा। तू उससे मिल भी नहीं पाएगी? और तूने तो छुट्टी भी ली थी न?"
"हाँ माँ," अनन्या ने सुमित्रा जी की ओर एक चोर नज़र डाली, जिन्होंने अब अपनी नज़रें नीचे झुका ली थीं। "माँ, दरअसल यहाँ मम्मी जी (सास) के पैर में फ्रैक्चर है। और कल घर में बहुत बड़ी पूजा है। मैं इस हालत में उन्हें और पापाजी को अकेले छोड़कर नहीं आ सकती। यहाँ मेरी ज़्यादा ज़रूरत है। रोहन से कहना मैं वीडियो कॉल कर लूंगी। और प्लीज़, आप नाराज़ मत होना।"
उधर से थोड़ी देर खामोशी रही, फिर माँ बोलीं, "नहीं बेटा, मुझे नाराज़गी नहीं, गर्व है तुझ पर। तू अपना फर्ज निभा। हम सब समझते हैं।"
फोन कट गया। रसोई में सिर्फ दूध उबलने की आवाज़ थी। सुमित्रा जी की आँखों में पानी भर आया था। जिस बहू को वे 'मॉडर्न' और 'अपने मन की करने वाली' समझती थीं, उसने आज अपने सगे भाई से मिलने का मौका सिर्फ इसलिए छोड़ दिया ताकि उनके घर की परंपरा न टूटे। अनन्या ने यह बात उन्हें महसूस भी नहीं होने दी थी कि वह कोई त्याग कर रही है।
सुमित्रा जी ने गला साफ किया। "अनन्या..."
"जी मम्मी जी?" अनन्या पलटी।
"तू जा सकती थी बेटा। पूजा तो हम हलवाई के भरोसे भी कर लेते। तेरा भाई इतने सालों बाद आया है..."
अनन्या उनके पास आई और उनके घुटनों पर हाथ रखकर बैठ गई। "मम्मी जी, भाई तो फिर आ जाएगा, या मैं चली जाऊंगी। लेकिन यह घर भी तो मेरा है। अगर आज मैं मुसीबत में होती, तो क्या आप मुझे छोड़कर कहीं जातीं? नहीं न? फिर मैं कैसे जा सकती हूँ? और रही बात परंपरा की, तो यह अब सिर्फ आपकी नहीं, मेरी भी ज़िम्मेदारी है।"
अगले दिन पूजा बहुत भव्य तरीके से संपन्न हुई। मोहल्ले के लोग, रिश्तेदार, और अनन्या की बुआ सास—सबने व्यवस्था की तारीफ की।
बुआ सास, जो अक्सर मीन-मेख निकालने के लिए मशहूर थीं, खीर खाते हुए बोलीं, "अरे सुमित्रा! तेरे पैर में चोट थी, फिर भी क्या स्वाद बनाया है। बिल्कुल तेरे हाथ का जादू है। मान गए भाई, तू बिस्तर पर पड़े-पड़े भी घर को मुट्ठी में रखती है।"
सुमित्रा जी मुस्कुराईं। उन्होंने सबकी तरफ देखा और फिर अनन्या को आवाज़ दी जो मेहमानों को पानी पिला रही थी।
"इधर आ अनन्या," सुमित्रा जी ने उसे अपने पास बुलाया।
अनन्या आई। सुमित्रा जी ने सबके सामने उसका हाथ अपने हाथ में लिया।
"दीदी," सुमित्रा जी ने अपनी ननद से कहा, "यह खीर मैंने नहीं बनाई। और सच कहूं तो इस बार पूजा की एक भी तैयारी मैंने नहीं की। यह सब मेरी बहू, अनन्या का कमाल है। मैं तो बस देख रही थी, किया सब इसने है। और जो स्वाद आप कह रही हैं न, वो मेरे हाथ का नहीं, इसके समर्पण का स्वाद है।"
पूरा हॉल शांत हो गया। अनन्या का चेहरा शर्म से लाल हो गया।
सुमित्रा जी ने बात आगे बढ़ाई, "मैं हमेशा डरती थी कि आज की लड़कियां घर को सराय समझती हैं। लेकिन आज मुझे अपनी गलती का अहसास हो गया। इसने अपने भाई के आने की खुशी छोड़ दी, ताकि मेरे घर का मान रह सके। यह सिर्फ मेरे बेटे की पत्नी नहीं है, यह इस घर की रीढ़ की हड्डी बन गई है।"
तभी केशव बाबू एक छोटा सा मखमली डिब्बा लेकर आए। सुमित्रा जी ने उसे खोला। उसमें उनकी सास (अनन्या की दादी सास) का पुश्तैनी नौलखा हार था, जिसे सुमित्रा जी ने तिजोरी में बंद करके रखा था कि 'सही वक्त' आने पर बहू को देंगी। उन्हें लगता था कि शायद अनन्या इसकी कद्र नहीं कर पाएगी।
सुमित्रा जी ने वह हार अनन्या के गले में पहना दिया।
"मम्मी जी, यह तो..." अनन्या चौंक गई।
"यह तेरा है, बेटा। हक़ से," सुमित्रा जी ने उसकी माथे को चूमा। "आज तूने साबित कर दिया कि तू इस घर की अमानत को संभालने के काबिल ही नहीं, बल्कि उसे आगे बढ़ाने वाली है। भगवान करे, हर सास को तेरे जैसी बहू मिले जो मॉडर्न होकर भी जड़ों से जुड़ी हो।"
अनन्या की आँखों से आंसू छलक पड़े। उसने झुककर सुमित्रा जी के पैर छुए, लेकिन सुमित्रा जी ने उसे गले लगा लिया।
शाम को जब सब मेहमान चले गए, तो घर में एक सुकून भरी शांति थी। अनन्या सोफे पर सुमित्रा जी के पैर दबा रही थी।
"अनन्या," सुमित्रा जी ने कहा।
"जी?"
"मैंने रोहन (अनन्या का भाई) को फोन किया था। वो कल सुबह की फ्लाइट से वापस नहीं जा रहा। मैंने उसकी टिकट कैंसिल करवा दी है," सुमित्रा जी ने शरारती मुस्कान के साथ कहा।
अनन्या हैरान रह गई। "क्या? क्यों?"
"क्योंकि मैंने उसे और तेरे मम्मी-पापा को कल लंच पर यहाँ बुलाया है। अब जब मेरी बहू उनके पास नहीं जा पाई, तो उनका फ़र्ज़ बनता है कि वो यहाँ आएं। और हाँ, कल मेनू में वही मखाने की खीर बनेगी। मैं चाहती हूं कि वे भी देखें कि उनकी बेटी ने मेरी नाक कैसे बचा ली।"
अनन्या की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने झट से सुमित्रा जी को गले लगा लिया। "थैंक यू, मम्मी जी! यू आर द बेस्ट।"
"मक्खन मत लगा," सुमित्रा जी ने हंसते हुए कहा, "और सुन, कल मुझे भी थोड़ा लैपटॉप चलाना सीखा देना। मैं भी देखना चाहती हूं कि मेरी बहू दिन भर करती क्या है।"
कमरे में दोनों की हंसी गूंज उठी। बाहर बारिश शुरू हो गई थी, लेकिन घर के अंदर का मौसम अब पूरी तरह बदल चुका था। वो दीवार जो एक 'सास' और 'बहू' के बीच थी, अनन्या के त्याग और सुमित्रा जी की समझदारी ने हमेशा के लिए गिरा दी थी। अब वहां सिर्फ दो स्त्रियां थीं जो एक-दूसरे की ताकत थीं।
केशव बाबू, जो अपने कमरे से यह सब सुन रहे थे, ने राहत की सांस ली। उन्हें पता था कि अब उनका घर सुरक्षित हाथों में है। परंपराएं नहीं टूटेंगी, बस उनका रूप बदल जाएगा—और शायद पहले से और भी सुंदर हो जाएगा।
लेखिका : सीमा श्रीवास्तव
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