"अरे बुढ़िया! दिन भर खट-पट, खट-पट... चैन से दो घड़ी बैठने भी नहीं देती। अब क्या फोड़ दिया? अभी कल ही तो नया कांच का गिलास लाई थी, वो भी तोड़ दिया क्या? हाथ हैं या हथौड़े?" कुसुम जी बड़बड़ाते हुए अपने कमरे से निकलीं और घर के पिछवाड़े बने उस छोटे से, सीलन भरे कमरे की तरफ बढ़ीं जहाँ उनकी अस्सी वर्षीय सास, जानकी देवी रहती थीं। जानकी देवी का शरीर अब हड्डियों का ढांचा मात्र रह गया था। हाथों में कंपन इतना था कि पानी का गिलास भी भूकंप की तरह हिलता था। "बहू... वो... पानी पीने की कोशिश कर रही थी... हाथ फिसल गया," जानकी देवी ने अपनी सूखी और झुर्रियों वाली आँखों को ऊपर उठाकर डरते हुए कहा। फर्श पर कांच बिखरा पड़ा था और पानी फैला हुआ था। "हाथ फिसल गया!" कुसुम जी ने नफरत से मुंह बिचकाया। "तो मांग नहीं सकती थी? महारानी को खुद उठकर पानी पीना है। अब ये कांच कौन साफ़ करेगा? मैं? या तुम्हारे लाडले बेटे को बुलाऊँ ऑफिस से? दिन भर बस नुकसान... नुकसान!" कुसुम जी ने वहां पड़ा झाड़ू उठाया और पैर से कांच के टुकड़ों को एक कोने में सरका दिया। "पड़ी रहो अब प्यासी। जब त...