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Showing posts from March, 2026

कर्म का आईना: एक बहू की अनूठी सीख

  "अरे बुढ़िया! दिन भर खट-पट, खट-पट... चैन से दो घड़ी बैठने भी नहीं देती। अब क्या फोड़ दिया? अभी कल ही तो नया कांच का गिलास लाई थी, वो भी तोड़ दिया क्या? हाथ हैं या हथौड़े?" कुसुम जी बड़बड़ाते हुए अपने कमरे से निकलीं और घर के पिछवाड़े बने उस छोटे से, सीलन भरे कमरे की तरफ बढ़ीं जहाँ उनकी अस्सी वर्षीय सास, जानकी देवी रहती थीं। जानकी देवी का शरीर अब हड्डियों का ढांचा मात्र रह गया था। हाथों में कंपन इतना था कि पानी का गिलास भी भूकंप की तरह हिलता था। "बहू... वो... पानी पीने की कोशिश कर रही थी... हाथ फिसल गया," जानकी देवी ने अपनी सूखी और झुर्रियों वाली आँखों को ऊपर उठाकर डरते हुए कहा। फर्श पर कांच बिखरा पड़ा था और पानी फैला हुआ था। "हाथ फिसल गया!" कुसुम जी ने नफरत से मुंह बिचकाया। "तो मांग नहीं सकती थी? महारानी को खुद उठकर पानी पीना है। अब ये कांच कौन साफ़ करेगा? मैं? या तुम्हारे लाडले बेटे को बुलाऊँ ऑफिस से? दिन भर बस नुकसान... नुकसान!" कुसुम जी ने वहां पड़ा झाड़ू उठाया और पैर से कांच के टुकड़ों को एक कोने में सरका दिया। "पड़ी रहो अब प्यासी। जब त...

बूढ़ी माँ की खामोशी

शहर के सबसे मशहूर न्यूरोसर्जन, डॉ. समीर मल्होत्रा की आलीशान बीएमडब्ल्यू कार आज अपनी रफ्तार से नहीं, बल्कि एक अजीब सी भारी खामोशी के साथ रेंग रही थी। कार का एयर कंडीशनर पूरी ताकत से चल रहा था, फिर भी समीर के माथे पर पसीने की महीन बूंदें थीं। पिछली सीट पर उनकी 70 वर्षीय माँ, सुमित्रा देवी बैठी थीं। उनके हाथ में एक छोटा सा, पुराना सा बैग था—वही बैग जिसे लेकर वो कभी समीर को स्कूल छोड़ने जाती थीं। आज वही बेटा, उसी बैग के साथ उन्हें छोड़ने जा रहा था... लेकिन स्कूल नहीं, शहर के बाहरी इलाके में बने 'सांध्य दीप वृद्धाश्रम' में। कार में सन्नाटा इतना गहरा था कि समीर को अपनी ही सांसों की आवाज़ शोर जैसी लग रही थी। वह बार-बार रियर-व्यू मिरर (शीशे) में माँ को देखने की कोशिश करता, लेकिन सुमित्रा देवी की नज़रें खिड़की के बाहर भागते हुए पेड़ों पर टिकी थीं। उनके चेहरे पर न कोई शिकन थी, न आँखों में कोई आंसू। बस एक ठहराव था, जैसे किसी नदी ने समुद्र में मिलने से पहले अपनी गति छोड़ दी हो। समीर ने गला साफ किया। उसे लगा कि इस खामोशी को तोड़ना ज़रूरी है, शायद अपने ज़मीर को तसल्ली देने के लिए। "माँ, तुम वहां ...

वह घर जो अब मेरा नहीं रहा

  शाम की आरती का समय था, लेकिन शर्मा जी के घर में घंटी की आवाज़ की जगह बर्तनों के पटकने की आवाज़ आ रही थी। ड्राइंग रूम के कोने में बैठी सुधा ने अपनी आँखों से बहते आंसुओं को पल्लू से कसकर पोंछ लिया। यह अब रोज़ की बात हो गई थी। सुधा, 32 साल की एक समझदार महिला, छह महीने पहले अपनी ससुराल से वापस लौट आई थी। ससुराल में दहेज के लिए प्रताड़ना और पति के अवैध संबंधों ने उसे तोड़कर रख दिया था। जब उसने विरोध किया, तो उसे एक रात कपड़ों के जोड़े में घर से धक्के मारकर निकाल दिया गया। उसके पास सिवाय अपने पिता के घर लौटने के और कोई रास्ता नहीं था। शुरुआत के कुछ दिन तो सब ठीक रहा। माँ-बाबूजी रोए, भाई-भाभी ने भी सहानुभूति दिखाई। पड़ोसियों ने कहा, "बेचारी के साथ बहुत बुरा हुआ।" लेकिन जैसे-जैसे दिन हफ़्तों में और हफ़्ते महीनों में बदले, सहानुभूति की वह परत उतरने लगी और उसके नीचे छिपा 'बोझ' का सच सामने आने लगा। रसोई में सुधा की भाभी, रितिका, ज़ोर-ज़ोर से अपनी सास (सुधा की माँ, सावित्री जी) से बहस कर रही थी। "मम्मी जी, अब और कितना? पिछले छह महीने से राशन का बिल दोगुना आ रहा है। बिजली का बिल देखिये...