शाम की आरती का समय था, लेकिन शर्मा जी के घर में घंटी की आवाज़ की जगह बर्तनों के पटकने की आवाज़ आ रही थी। ड्राइंग रूम के कोने में बैठी सुधा ने अपनी आँखों से बहते आंसुओं को पल्लू से कसकर पोंछ लिया। यह अब रोज़ की बात हो गई थी।
सुधा, 32 साल की एक समझदार महिला, छह महीने पहले अपनी ससुराल से वापस लौट आई थी। ससुराल में दहेज के लिए प्रताड़ना और पति के अवैध संबंधों ने उसे तोड़कर रख दिया था। जब उसने विरोध किया, तो उसे एक रात कपड़ों के जोड़े में घर से धक्के मारकर निकाल दिया गया। उसके पास सिवाय अपने पिता के घर लौटने के और कोई रास्ता नहीं था।
शुरुआत के कुछ दिन तो सब ठीक रहा। माँ-बाबूजी रोए, भाई-भाभी ने भी सहानुभूति दिखाई। पड़ोसियों ने कहा, "बेचारी के साथ बहुत बुरा हुआ।" लेकिन जैसे-जैसे दिन हफ़्तों में और हफ़्ते महीनों में बदले, सहानुभूति की वह परत उतरने लगी और उसके नीचे छिपा 'बोझ' का सच सामने आने लगा।
रसोई में सुधा की भाभी, रितिका, ज़ोर-ज़ोर से अपनी सास (सुधा की माँ, सावित्री जी) से बहस कर रही थी।
"मम्मी जी, अब और कितना? पिछले छह महीने से राशन का बिल दोगुना आ रहा है। बिजली का बिल देखिये। विकास (सुधा का भाई) की सैलरी सीमित है। हमारे बच्चों की स्कूल फीस है, ट्यूशन है। हम एक और पेट पालने की स्थिति में नहीं हैं। माना कि वो आपकी बेटी है, पर अब वो पराई है। उसकी ज़िम्मेदारी उसके पति की है, हमारी नहीं।"
सावित्री जी दबी आवाज़ में समझा रही थीं, "बहु, धीरे बोल। सुधा सुन लेगी तो उसका दिल टूट जाएगा। अभी उसका तलाक का केस चल रहा है, वो कहाँ जाएगी?"
"तो क्या हम सड़क पर आ जाएं?" रितिका चिल्लाई। "समाज क्या कहेगा? जवान बेटी घर में बैठी है। और कब तक बैठी रहेगी? आप लोग उसे कुछ कहते क्यों नहीं? या तो वो नौकरी करे या फिर अपने पति के पास जाकर सुलह करे। हमारे सिर पर कब तक बैठी रहेगी?"
सुधा ने अपने कानों पर हाथ रख लिए। ये शब्द किसी तेज़ाब से कम नहीं थे। यह वही रितिका भाभी थीं, जो शादी से पहले सुधा को अपनी सगी बहन मानती थीं। सुधा ने अपनी सैलरी से रितिका को न जाने कितने तोहफे दिए थे। और आज? आज सुधा 'एक और पेट' बन गई थी।
सुधा उठी और अपने पिता, रामशरण जी के कमरे में गई। रामशरण जी रिटायर हो चुके थे और अपनी पेंशन पर घर का कुछ खर्च उठाते थे, लेकिन असली बागडोर अब विकास के हाथ में थी।
"बाबूजी..." सुधा की आवाज़ कांप रही थी।
रामशरण जी ने अखबार से नज़र हटाई। बेटी का चेहरा देखते ही वे समझ गए।
"क्या हुआ बेटा? रितिका ने फिर कुछ कहा?"
सुधा उनके पैरों के पास ज़मीन पर बैठ गई और अपना सिर उनकी गोद में रख दिया। "बाबूजी, मैं बोझ बन गई हूँ ना? जिस घर के आंगन में मैं खेली, बड़ी हुई, आज उसी घर में मेरे सांस लेने पर भी गिनती हो रही है। ससुराल वालों ने कहा 'यह घर तेरा नहीं', और अब यहाँ भी मुझे लग रहा है कि यह घर मेरा नहीं है। आखिर एक लड़की का घर होता कौन सा है बाबूजी?"
रामशरण जी की आँखों में बेबसी के आंसू आ गए। उन्होंने कांपते हाथों से बेटी के सिर पर हाथ फेरा। "बेटा, घर ईंट-पत्थर का नहीं, अधिकार का होता है। और कड़वा सच यह है कि शादी के बाद समाज बेटी से उसका मायके का अधिकार छीन लेता है। मैं हूँ, तब तक यह छत तेरी है। लेकिन मेरे बाद..." उनकी आवाज़ भर्रा गई।
उस रात सुधा को नींद नहीं आई। उसे समझ आ गया था कि पिता का प्यार अपनी जगह है, लेकिन भाई और भाभी की गृहस्थी में वह एक 'अवांछित मेहमान' है। उसे लगा कि अगर वह यहाँ और रही, तो जो थोड़ा-बहुत सम्मान बचा है, वह भी ख़त्म हो जाएगा।
अगले दिन सुबह, नाश्ते की मेज पर सन्नाटा था। विकास भी चुपचाप नाश्ता कर रहा था।
सुधा ने एक गहरी सांस ली और बोली, "भैया, भाभी... मैंने एक फैसला लिया है।"
सबने चौंककर उसकी तरफ देखा। रितिका के चेहरे पर एक उम्मीद की किरण दिखी।
"क्या फैसला दीदी?" रितिका ने पूछा।
"मैं कल से नौकरी शुरू कर रही हूँ। मुझे एक बुटीक में मैनेजर की नौकरी मिल गई है," सुधा ने झूठ बोला। अभी नौकरी पक्की नहीं थी, बस बात चल रही थी, लेकिन उसे अपने आत्मसम्मान के लिए यह बोलना पड़ा।
"अरे, यह तो अच्छी बात है," विकास ने राहत की सांस ली। "घर से बाहर निकलोगी तो मन भी लगा रहेगा।"
विकास ने यह नहीं कहा कि 'पैसे की ज़रूरत नहीं है', उसने बस 'राहत' महसूस की। यह बात सुधा को चुभ गई।
सुधा ने नौकरी ढूँढनी शुरू की। उसने अपनी एम.ए. की डिग्री निकाली और धक्के खाने लगी। आख़िरकार, उसे एक छोटे से स्कूल में रिसेप्शनिस्ट की नौकरी मिल गई। सैलरी बहुत कम थी, लेकिन सुधा के लिए यह आज़ादी की पहली सीढ़ी थी।
सुधा ने घर के खर्च में पैसे देने शुरू कर दिए। वह अपनी सैलरी का आधा हिस्सा रितिका के हाथ में रख देती। रितिका अब खुश थी। ताने कम हो गए थे, लेकिन ख़त्म नहीं हुए थे।
"देखो, पैसे तो दे रही है, पर घर का काम तो नहीं करती ना। दिन भर बाहर रहती है, आकर थककर सो जाती है। नौकरानी थोड़ी हूँ मैं," रितिका अब भी शिकायत करती।
सुधा सब सुनती, पर चुप रहती। उसका लक्ष्य अब कुछ और था। वह पाई-पाई जोड़ रही थी।
वक़्त बीतता गया। एक साल हो गया। सुधा अब घर में एक 'किरायेदार' की तरह रहती थी। सुबह जाना, शाम को आना, पैसे देना और अपने कमरे में बंद हो जाना। पिता से बातें होती थीं, पर भाई-भाभी से रिश्ता औपचारिक हो गया था।
तभी एक दिन, रामशरण जी को बाथरूम में चक्कर आया और वे गिर पड़े। ब्रेन स्ट्रोक था।
घर में कोहराम मच गया। विकास ऑफिस में था। रितिका घबरा गई। सुधा उस दिन संयोग से घर पर थी (स्कूल की छुट्टी थी)।
सुधा ने एम्बुलेंस बुलाई और पिता को अस्पताल ले गई। डॉक्टर ने कहा कि तुरंत ऑपरेशन करना होगा और खर्चा करीब 5 लाख आएगा।
विकास अस्पताल पहुंचा। डॉक्टर की बात सुनकर उसके हाथ-पाँव फूल गए।
"5 लाख? अभी? मेरे पास तो सेविंग्स में सिर्फ़ 1 लाख पड़े हैं। रितिका, तुम्हारे गहने..."
रितिका ने साफ़ मना कर दिया। "बच्चों की एफ.डी. (FD) नहीं तोड़ सकते, और गहने तो मेरे स्त्रीधन हैं। तुम कोई लोन ले लो।"
वक्त निकलता जा रहा था। रामशरण जी की हालत बिगड़ रही थी। विकास हताश होकर सिर पकड़कर बैठ गया। "मैं क्या करूँ? कोई दोस्त भी फोन नहीं उठा रहा।"
तभी सुधा काउंटर पर आई। उसने अपने पर्स से एक चेकबुक निकाली और एक चेक काटकर रिसेप्शनिस्ट को थमा दिया।
"ऑपरेशन शुरू कीजिये। बाकी पैसे मैं शाम तक आर.टी.जी.एस. (RTGS) कर दूंगी," सुधा ने दृढ़ता से कहा।
विकास और रितिका हक्के-बक्के रह गए।
"सुधा... तेरे पास इतने पैसे कहाँ से आए?" विकास ने अविश्वास से पूछा।
सुधा ने शांत स्वर में कहा, "भैया, पिछले एक साल से मैं स्कूल के बाद ट्यूशन पढ़ाती थी और रात को फ्रीलांस कंटिंग (Writing) करती थी। मैंने एक भी नया कपड़ा नहीं खरीदा, एक भी पैसा अपनी ज़रूरतों पर खर्च नहीं किया। मैं यह पैसा अपने लिए एक छोटा सा फ्लैट बुक करने के लिए जोड़ रही थी ताकि मैं इस घर से 'बोझ' हटा सकूँ। लेकिन फ्लैट से ज़रूरी बाबूजी की जान है।"
रितिका का चेहरा शर्म से लाल हो गया। जिस ननद को वह 'बोझ' और 'मुफ्त की रोटियां तोड़ने वाली' समझती थी, आज उसी ने घर की इज़्ज़त और पिता की जान बचाई थी।
रामशरण जी का ऑपरेशन सफल रहा।
कुछ दिनों बाद उन्हें घर लाया गया। अब घर का माहौल बदल चुका था। विकास और रितिका की नज़रों में सुधा के लिए सम्मान था, लेकिन साथ ही एक अपराधबोध भी।
एक शाम, जब रामशरण जी आराम कर रहे थे, सुधा ने सबको हॉल में बुलाया।
उसके हाथ में एक सूटकेस था।
"सुधा? तुम कहीं जा रही हो?" सावित्री जी ने घबराकर पूछा।
सुधा मुस्कुराई। एक ऐसी मुस्कान जिसमें दर्द नहीं, आत्मविश्वास था।
"हाँ माँ। मुझे बैंक से लोन मिल गया है और मैंने पास वाली सोसाइटी में एक किराये का फ्लैट ले लिया है। मैं वहां शिफ्ट हो रही हूँ।"
"लेकिन क्यों दीदी?" विकास आगे बढ़ा। "अब तो सब ठीक है। तुम यहीं रहो ना। यह तुम्हारा घर है।"
सुधा ने विकास के कंधे पर हाथ रखा। "नहीं भैया। यह घर अब तुम्हारा और रितिका का है। जिस दिन मेरी शादी हुई थी, उसी दिन यह घर 'मायका' बन गया था। और मायके में बेटियां मेहमान होती हैं, सदस्य नहीं। अगर मैं यहाँ रही, तो कल फिर कोई छोटी सी बात होगी, फिर कोई ताना आएगा, और फिर मुझे लगेगा कि मैं बोझ हूँ। मैं अपने और तुम्हारे बीच के रिश्ते को कड़वाहट से बचाना चाहती हूँ।"
रितिका ने सिर झुका लिया। "दीदी, मुझे माफ़ कर दो। मैंने बहुत गलत किया तुम्हारे साथ।"
सुधा ने रितिका को गले लगाया। "माफ़ी मत मांगो भाभी। तुमने मुझे एक बहुत बड़ी सीख दी है। तुमने मुझे सिखाया कि एक औरत का असली घर वही होता है जो वह खुद बनाती है—चाहे वह पति का हो या खुद की कमाई का। जब तक मैं दूसरों की छत के नीचे रहूँगी, तब तक मुझे अपनी इज़्ज़त की भीख मांगनी पड़ेगी। अब मैं अपनी छत के नीचे रानी बनकर रहूँगी।"
सुधा ने अपने पिता के पैर छुए। रामशरण जी की आँखों में आंसू थे, पर इस बार वे बेबसी के नहीं, गर्व के थे।
"जा बेटा," रामशरण जी ने कहा। "आज तूने साबित कर दिया कि बेटा और बेटी में कोई फर्क नहीं होता। बल्कि बेटियां तो बेटों से चार कदम आगे होती हैं।"
सुधा ने अपना सूटकेस उठाया और दरवाज़े की ओर बढ़ी।
उसने एक बार मुड़कर उस घर को देखा। उस घर ने उसे बहुत यादें दी थीं, लेकिन पिछले एक साल ने उसे 'आत्मनिर्भरता' का पाठ पढ़ाया था।
सुधा ने दहलीज लांघी।
ससुराल से निकली हुई, मायके में बोझ बनी हुई वह लड़की अब एक 'स्वतंत्र औरत' बन चुकी थी। उसने समझ लिया था कि **"औरत का सम्मान किसी के देने से नहीं मिलता, उसे खुद कमाना पड़ता है।"**
वह अपनी नई दुनिया, अपने छोटे से फ्लैट की ओर चल पड़ी, जहाँ कोई उसे यह नहीं कहेगा कि वह पराई है।
---
**कहानी का सार:**
अक्सर समाज में यह देखा जाता है कि ससुराल से ठुकराई हुई बेटियां मायके में भी पराई हो जाती हैं। आर्थिक निर्भरता उन्हें कमज़ोर बनाती है। सुधा की कहानी हमें सिखाती है कि स्वाभिमान की लड़ाई अकेले लड़नी पड़ती है। जब तक आप आर्थिक रूप से सक्षम नहीं होते, तब तक दुनिया (यहाँ तक कि अपने भी) आपको बोझ ही समझेंगे। अपना घर वही है, जो आप अपने दम पर बनाते हैं।
**अंत में आपसे एक सवाल:**
क्या सुधा का घर छोड़कर जाने का फैसला सही था? या उसे माफ़ करके उसी घर में रहना चाहिए था? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।
**"अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ और आपकी आँखों को नम किया, तो लाइक, कमेंट और शेयर जरूर करें। हर उस बेटी तक यह कहानी पहुँचाएं जो अपनी लड़ाई लड़ रही है। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसी ही दिल को छू लेने वाली मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें। धन्यवाद!"**
Comments
Post a Comment