शहर के सबसे मशहूर न्यूरोसर्जन, डॉ. समीर मल्होत्रा की आलीशान बीएमडब्ल्यू कार आज अपनी रफ्तार से नहीं, बल्कि एक अजीब सी भारी खामोशी के साथ रेंग रही थी। कार का एयर कंडीशनर पूरी ताकत से चल रहा था, फिर भी समीर के माथे पर पसीने की महीन बूंदें थीं। पिछली सीट पर उनकी 70 वर्षीय माँ, सुमित्रा देवी बैठी थीं। उनके हाथ में एक छोटा सा, पुराना सा बैग था—वही बैग जिसे लेकर वो कभी समीर को स्कूल छोड़ने जाती थीं। आज वही बेटा, उसी बैग के साथ उन्हें छोड़ने जा रहा था... लेकिन स्कूल नहीं, शहर के बाहरी इलाके में बने 'सांध्य दीप वृद्धाश्रम' में।
कार में सन्नाटा इतना गहरा था कि समीर को अपनी ही सांसों की आवाज़ शोर जैसी लग रही थी। वह बार-बार रियर-व्यू मिरर (शीशे) में माँ को देखने की कोशिश करता, लेकिन सुमित्रा देवी की नज़रें खिड़की के बाहर भागते हुए पेड़ों पर टिकी थीं। उनके चेहरे पर न कोई शिकन थी, न आँखों में कोई आंसू। बस एक ठहराव था, जैसे किसी नदी ने समुद्र में मिलने से पहले अपनी गति छोड़ दी हो।
समीर ने गला साफ किया। उसे लगा कि इस खामोशी को तोड़ना ज़रूरी है, शायद अपने ज़मीर को तसल्ली देने के लिए।
"माँ, तुम वहां खुश रहोगी। वहां तुम्हारी उम्र के बहुत से लोग हैं। घर पर तुम अकेली हो जाती हो, रिया और मैं दोनों हॉस्पिटल में बिजी रहते हैं। बच्चे हॉस्टल चले गए हैं। वहां डॉक्टर, नर्स, सब 24 घंटे रहते हैं। तुम्हारी केयर अच्छी होगी।"
समीर की आवाज़ में एक रटा-रटाया स्पष्टीकरण था, जो शायद उसने पिछले एक हफ्ते से खुद को शीशे के सामने खड़े होकर सुनाया था।
सुमित्रा देवी ने धीरे से सिर घुमाया और बेटे को देखा। उन आँखों में वही ममता थी जो बचपन में समीर के घुटने छिल जाने पर होती थी।
"मैं जानती हूँ बेटा," उन्होंने बेहद शांत स्वर में कहा। "तू जो भी करता है, सोच समझकर ही करता है। तू डॉक्टर है, तुझे बेहतर पता है कि 'इलाज' कब ज़रूरी है और 'परहेज' कब।"
समीर को यह जवाब समझ नहीं आया। 'परहेज'? किससे? क्या माँ खुद को एक बीमारी मान रही थीं जिससे समीर को बचना ज़रूरी था?
कार वृद्धाश्रम के लोहे के बड़े गेट के सामने रुकी। गेट पर लिखा था—'सांध्य दीप: अपनों से दूर, अपनों के लिए'। समीर को वह टैगलाइन पढ़कर एक चुभन महसूस हुई।
प्रबंधक (Manager) मिस्टर वर्मा पहले से वहां खड़े थे। समीर ने पहले ही ऑनलाइन पेमेंट कर दी थी—डीलक्स रूम, एसी, पर्सनल अटेंडेंट। उसने सोचा था कि पैसों की चमक से वह अपने 'कर्तव्य' के अंधेरे को ढक लेगा।
सामान उतारा गया। सुमित्रा देवी ने एक बार भी पीछे मुड़कर उस आलीशान कार को नहीं देखा। उन्होंने बस समीर के सिर पर हाथ रखा।
"खुश रहना बेटा। और सुन, रिया से कहना कि अब गेस्ट रूम खाली हो गया है, तो वो अपना स्टडी रूम बना ले। उसे हमेशा शिकायत रहती थी न कि घर में जगह कम है।"
समीर का गला रुंध गया। माँ को यह भी याद था? रिया और समीर के बीच पिछले महीने इसी बात पर झगड़ा हुआ था। रिया ने कहा था, "समीर, तुम्हारा घर बड़ा है, पर दिल नहीं। तुम्हारी माँ के पुराने संदूक और पूजा-पाठ ने पूरा घर घेर रखा है। मेरे क्लिन्कि के पेपर्स फैलाने की जगह भी नहीं है।"
समीर ने तब रिया को डांटा था, लेकिन धीरे-धीरे रिया की वो 'लॉजिकल' बातें समीर के दिमाग में घर कर गई थीं। और आज नतीजा यह था कि माँ यहाँ खड़ी थीं।
"मैं चलता हूँ माँ... संडे को आऊंगा," समीर ने नज़रें चुराते हुए कहा।
सुमित्रा देवी मुस्कुराईं। एक ऐसी मुस्कान जिसने समीर के अंदर तक सब कुछ हिला दिया। "जा बेटा, तेरे मरीज़ इंतज़ार कर रहे होंगे।"
समीर वहां से भागा। सचमुच भागा। उसने कार स्टार्ट की और एक्सीलेटर पर पैर दबा दिया। उसे लग रहा था कि वृद्धाश्रम की हवा में उसका दम घुट जाएगा।
हॉस्पिटल पहुँचकर समीर ने खुद को काम में डुबो दिया। वह शहर का टॉप सर्जन था। दिमाग का ऑपरेशन करता था। उसे लगा कि वह अपनी यादों का ऑपरेशन करके माँ को भी दिमाग के किसी कोने में सुला देगा।
दोपहर को रिया का फोन आया।
"समीर, छोड़ आए?" उसकी आवाज़ में राहत थी।
"हम्म्," समीर ने छोटा सा जवाब दिया।
"अच्छा हुआ समीर। तुम प्रैक्टिकल बनो। वहां उन्हें कंपनी मिलेगी। और हाँ, मैंने कारपेंटर को बुला लिया है, वो कमरा अब हम रिनोवेट करवाएंगे। शाम को जल्दी आना।"
समीर ने फोन काट दिया। पहली बार उसे रिया की आवाज़ किसी कर्कश संगीत जैसी लगी।
शाम को समीर अपनी केबिन में बैठा एक मरीज़ की फाइल देख रहा था। तभी उसकी नज़र अपनी मेज़ पर रखे एक टिफिन बॉक्स पर पड़ी। यह वो टिफिन था जो सुबह निकलते वक़्त माँ ने कार में रख दिया था।
"रास्ते में भूख लगे तो खा लेना," उन्होंने कहा था।
समीर ने अनमने ढंग से टिफिन खोला।
अंदर गाजर का हलवा था।
समीर सन्न रह गया। उसे याद आया, कल रात ही उसने डाइनिंग टेबल पर कहा था, "यार, सर्दियों में गाजर का हलवा खाने का मन कर रहा है, पर आजकल बाज़ार में वो स्वाद नहीं मिलता।"
माँ ने कब बनाया? रात को तो वो सो गई थीं। इसका मतलब वो सुबह 4 बजे उठी होंगी, ताकि समीर के लिए हलवा बना सकें—उस दिन, जिस दिन बेटा उन्हें घर से निकालने वाला था।
हलवे की खुशबू ने समीर के बचपन का दरवाज़ा खोल दिया। उसे याद आया जब पिता जी गुज़र गए थे, तब समीर मेडिकल की पढ़ाई कर रहा था। फीस भरने के लिए पैसे नहीं थे। सुमित्रा देवी ने अपनी साड़ियाँ, गहने, यहाँ तक कि घर के बर्तन तक बेच दिए थे।
"तू बस पढ़ाई कर समीर, मैं हूँ ना," यह उनका तकियाकलाम था।
समीर ने हलवे का एक चम्मच मुंह में डाला। वह हलवा नहीं, ममता का पिघला हुआ रूप था। समीर की आँखों से आंसू टपक कर टिफिन में गिर गए। वह जो 'प्रैक्टिकल' डॉक्टर बना फिरता था, इस एक चम्मच हलवे ने उसे वापस वो 'छोटा बच्चा' बना दिया।
तभी, उसके केबिन का दरवाज़ा नॉक हुआ।
मिस्टर वर्मा, वृद्धाश्रम के मैनेजर, का फोन उसके लैंडलाइन पर था।
"हेलो, डॉ. समीर? मैं सांध्य दीप से वर्मा बोल रहा हूँ।"
"जी मिस्टर वर्मा, कोई परेशानी? माँ ठीक तो हैं?" समीर घबरा गया।
"नहीं डॉक्टर साहब, वो तो अपने कमरे में आराम कर रही हैं। दरअसल, सफाई करते वक़्त उनके तकिए के नीचे से एक डायरी मिली है। उसमें कुछ मेडिकल रिपोर्ट्स भी रखी हैं। मुझे लगा शायद ज़रूरी हों, तो आपको बता दूँ। क्या मैं व्हाट्सएप कर दूँ?"
"मेडिकल रिपोर्ट्स? माँ तो ठीक हैं... बस बीपी की दवाई लेती हैं," समीर हैरान था।
"एक मिनट सर, मैं भेजता हूँ," वर्मा जी ने कहा।
फोन पर 'टिंग' की आवाज़ हुई। इमेजेस आ गईं।
समीर ने पहली इमेज खोली। वह एक सी.टी. स्कैन की रिपोर्ट थी। मरीज़ का नाम—सुमित्रा देवी।
तारीख—दो महीने पुरानी।
डायग्नोसिस—एडवांस्ड अल्जाइमर और ब्रेन ट्यूमर (शुरुआती स्टेज)।
समीर के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह न्यूरोसर्जन था। वह एक नज़र में समझ गया कि रिपोर्ट क्या कह रही है। ट्यूमर ऐसी जगह था जहाँ से याददाश्त का जाना और धीरे-धीरे शरीर का लकवाग्रस्त होना तय था।
उसने कांपते हाथों से अगली इमेज खोली। वह डायरी का एक पन्ना था। माँ की टेढ़ी-मेढ़ी लिखाई:
"आज डॉक्टर ने बताया कि मेरे पास ज्यादा वक़्त नहीं है। और जो वक़्त बचा है, उसमें मैं सब कुछ भूलने लगूंगी। मुझे डर मौत से नहीं लगता, मुझे डर इस बात से लगता है कि मेरा समीर मुझे इस हालत में देखेगा। उसका करियर अभी पीक पर है। रिया और वो अपनी दुनिया में सेटल हो रहे हैं। अगर मैं बिस्तर पकड़ लूँगी, तो समीर अपनी प्रैक्टिस छोड़कर मेरी सेवा में लग जाएगा। वो बहुत भावुक है, अपना भविष्य ख़राब कर लेगा। और रिया... वो चिढ़ जाएगी। मेरे बेटे का घर मेरी वजह से नर्क बन जाएगा। नहीं... मैं ऐसा नहीं होने दूंगी। मुझे समीर से दूर जाना होगा। मुझे कोई ऐसी वजह बनानी होगी कि वो खुद मुझे छोड़ आए। मैं उसे मजबूर करूँगी। मैं थोड़ी ज़िद करूँगी, थोड़ा ड्रामा करूँगी कि मुझे घर में नहीं रहना। वो मुझे नफरत करे तो चलेगा, पर वो मेरी वजह से दुखी नहीं होना चाहिए। मैं वृद्धाश्रम चली जाऊंगी। वहां मरना आसान होगा, बेटे की आँखों के सामने घुट-घुट कर जीने से तो बेहतर ही है।"
समीर के हाथ से फोन छूटकर मेज़ पर गिर पड़ा।
सन्नाटा। एक गहरा, चीखता हुआ सन्नाटा।
माँ ने उसे घर से नहीं निकाला था। माँ ने खुद को उसकी ज़िन्दगी से 'काट' दिया था, जैसे एक गैंग्रीन वाले हिस्से को काटा जाता है ताकि बाकी शरीर ज़िंदा रह सके। वह जिसे रिया की 'लॉजिकल बातों' का असर समझ रहा था, वह दरअसल माँ का रचा हुआ एक नाटक था। उन्होंने अपनी बीमारी छिपाई, अपना दर्द छिपाया, सिर्फ इसलिए ताकि समीर की 'सफेद कोट' वाली दुनिया पर कोई दाग न लगे।
"लानत है मुझ पर..." समीर चीखा। उसकी आवाज़ केबिन की दीवारों से टकराकर वापस उसी को थप्पड़ मार रही थी।
वह डॉक्टर होकर भी अपनी माँ का चेहरा नहीं पढ़ पाया, जिसका दिमाग पढ़ना दुनिया के लिए उसका पेशा था।
समीर कुर्सी से उठा। इस बार उसकी चाल में वो थकान नहीं थी, बल्कि एक आंधी थी। वह बाहर निकला।
नर्स ने पूछा, "सर, शाम की ओपीडी?"
"कैंसिल करो सब! मेरी माँ इंतज़ार कर रही है," समीर ने चिल्लाकर कहा और पार्किंग की तरफ भागा।
कार फिर उसी रास्ते पर थी। लेकिन इस बार रफ़्तार अलग थी। समीर की आँखों से आंसू बह रहे थे, जिससे रास्ता धुंधला दिख रहा था। उसे रिया का फोन आया।
"समीर, तुम कब आ रहे हो? कारपेंटर पूछ रहा है..."
"रिया!" समीर ने बीच में ही टोक दिया। "कारपेंटर को वापस भेज दो। वो कमरा किसी का नहीं, मेरी माँ का है। और सुन लो, अगर उस घर में मेरी माँ के लिए जगह नहीं है, तो उस घर में मेरे लिए भी कोई जगह नहीं है। मैं उन्हें लेने जा रहा हूँ।"
उसने फोन काट दिया और सीट पर पटक दिया।
वृद्धाश्रम पहुँचकर समीर ने कार का दरवाज़ा भी ठीक से बंद नहीं किया और अंदर भागा।
"माँ! माँ!"
मिस्टर वर्मा दौड़कर आए, "डॉक्टर साहब, क्या हुआ? आप अभी तो..."
समीर ने उनकी बात नहीं सुनी। वह सीधे डीलक्स रूम नंबर 104 की तरफ भागा।
दरवाज़ा खुला था। सुमित्रा देवी खिड़की के पास बैठी ढलते हुए सूरज को देख रही थीं। उनके हाथ में समीर की बचपन की एक फोटो थी।
"माँ!"
सुमित्रा देवी चौंककर पलटीं। "समीर? तू? क्या हुआ बेटा? कुछ भूल गया क्या?"
समीर दौड़कर उनके पास गया और उनके पैरों में गिर पड़ा। वह फूट-फूट कर रो रहा था, एक बच्चे की तरह।
"हाँ माँ... मैं भूल गया था। मैं सब कुछ भूल गया था। मैं भूल गया था कि मैं डॉक्टर बाद में हूँ, पहले तेरा बेटा हूँ। मैं भूल गया था कि जिस उंगली को पकड़कर मैंने चलना सीखा, आज उसी हाथ को मैं छोड़कर चला गया।"
सुमित्रा देवी घबरा गईं। "उठ बेटा, क्या कर रहा है? लोग क्या कहेंगे? बड़ा डॉक्टर है तू।"
समीर ने उठकर माँ को गले लगा लिया। इतना कसकर, जैसे अगर अब छोड़ा तो वो हवा में विलीन हो जाएंगी।
"मैं कोई बड़ा डॉक्टर नहीं हूँ माँ। मैं दुनिया का सबसे नालायक इंसान हूँ। तुमने मुझसे अपनी बीमारी क्यों छिपाई? क्यों? तुम्हें लगा मैं तुम्हें बोझ समझूंगा?"
सुमित्रा देवी की आँखों में भी आंसू आ गए। उनका राज़ खुल चुका था।
"बेटा... मैं तेरी उड़ान में पत्थर नहीं बनना चाहती थी।"
"तुम पत्थर नहीं, मेरी ज़मीन हो माँ। और ज़मीन के बिना उड़ान का कोई मतलब नहीं होता," समीर ने सिसकते हुए कहा। "चलो घर। अभी। इसी वक़्त। तुम्हारा इलाज मैं करूँगा। दुनिया का बेस्ट न्यूरोसर्जन तेरा बेटा है, और वो अपनी माँ को कुछ नहीं होने देगा। अगर याददाश्त चली भी गई, तो मैं तुम्हें रोज याद दिलाऊंगा कि मैं कौन हूँ और तुम कौन हो।"
"पर रिया..." सुमित्रा देवी ने हिचकिचाते हुए कहा।
"रिया को समझना होगा माँ। उसे स्वीकार करना होगा। और अगर वो नहीं कर सकती, तो मैं उस घर को ही छोड़ दूंगा। मैंने मकान बनाया था माँ, 'घर' तो तुम हो। और मैं बेघर नहीं होना चाहता।"
समीर ने वही पुराना बैग उठाया।
मिस्टर वर्मा, जो दरवाज़े पर खड़े थे, अपनी आँखों के कोने पोंछ रहे थे। उन्होंने कहा, "डॉक्टर साहब, आज तक यहाँ लोग छोड़ने आते थे, पहली बार कोई इतनी जल्दी वापस 'लेने' आया है। काश हर बेटा आपकी तरह गलती सुधारना जानता।"
वापसी के रास्ते पर कार में वही सन्नाटा नहीं था।
समीर ने अपनी एक हाथ से माँ का हाथ पकड़ रखा था और दूसरे हाथ से स्टेयरिंग।
रेडियो पर पुराना गाना बज रहा था—'तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी, हैरान हूँ मैं...'
समीर ने मन ही मन कसम खाई कि जब तक माँ की सांसें हैं, वह उनके और मौत के बीच एक दीवार बनकर खड़ा रहेगा। उसने जान लिया था कि वृद्धाश्रम ईंट-पत्थर की दीवारों से नहीं, बल्कि बच्चों के कठोर दिलों से बनते हैं। और आज उसने अपने दिल की वो दीवार तोड़ दी थी।
कहानी के अंत में आपसे एक सवाल:
क्या समीर ने सही समय पर अपनी गलती सुधार ली? क्या आज के दौर में हम अपनी 'प्राइवेसी' और 'करियर' के नाम पर अपने माता-पिता के त्याग को भूलते जा रहे हैं?
अगर इस कहानी ने आपकी आँखों को नम किया और दिल के किसी कोने को छुआ, तो कृपया इसे लाइक करें और अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें।
शायद आपका एक शेयर किसी और 'समीर' को अपनी 'सुमित्रा' को वृद्धाश्रम छोड़ने से रोक सके। ऐसी ही दिल को छू लेने वाली पारिवारिक और मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए हमारे पेज को फ़ॉलो करना न भूलें। धन्यवाद!
Comments
Post a Comment