फूलझड़ी कुटीर को झिलमिल चमकते रोशनी से सजाया सँवारा गया है , घर में सब के सब रोहित के बरात निकलने के तैयारी में जुटे हैं । रोहित अपने कमरे में तैयार हो रहा है , मनपसंद लड़की उसकी जीवनसंगिनी बनने जा रही है , रूचि उसी के साथ एक ही ऑफिस में काम करती है और उसके समकक्ष कमाती है । रोहित की माँ रुक्मिणी जी काफी उत्साहित हैं कि उनकी छोटी बहू कमाऊ है और सगे संबंधियों से इतरा इतरा कर कह रही हैं कि कमाऊ पतोहू ( बहू) आएगी तो घर साजो-सामान से भर देगी, लक्ष्मी है वो ।
बड़ी बहू क्या है भई, आपने तो उसे बाहर काम नहीं करने दिया था , अब आपका हृदय परिवर्तित हो गया है और खुशी के गीत गाए जा रही हैं कि कमानेवाली बहू आ रही है बहुत चोन्हा (इतराना)रही हैं आप , ननद रीमा ने अपनी भाभी रूक्मिणी पर कटाक्ष किया है , लेकिन रुक्मिणी कन्नी काटकर निकल गई। बड़ी बहू ललिता साक्षात सरस्वती का स्वरूप, विदूषी महिला थी लेकिन बीएड एमएड की डिग्री के होने के बावजूद सास ने नौकरी करवाने से साफ तौर पर मना कर दिया था यह कहकर, कि हमें बहू की कमाई नहीं खानी है ? हमें घर सँभालेवाली लड़की की दरकार है । ललिता ने खामोशी से अपनी काबिलियत को तिलांजलि दे दी थी और सास ससुर, ननद देवर को देखती आ रही थी ।अब समय करवट ले रहा है।
दूसरे दिन रूचि बहू बनकर आ गई है । ललिता भी खुश है कि उसके समकक्ष ही देवरानी आयी है और उसमें अपनी छवि देख , जेठानी बन प्रफुल्लित है कि चलो कोई तो उसे चाय बना कर देगा और रसोईघर में मदद करेगा । लेकिन ललिता को उसके रंग ढंग और आचरण व्यवहार दूसरे दिन ही समझ आ गए थे ।रूचि को मुँह दिखाई के रस्म में काफी कैश , ज्वेलरी और कपड़े मिले हैं । बैठक में यह कार्यक्रम के पश्चात देवर रोहित बोल रहा __ मम्मी , मुँह दिखाई के गिफ्ट पर रूचि का हक है ना , कल रिसेप्शन पार्टी में भी गिफ्टस मिलेंगे ही तो उसे आप सब रख लेना । रोहित की बात से वहाँ बैठे ससुर , ललिता के पति रोहन और सास ननद ने हामी भरी , लेकिन ललिता का मन कचोट रहा है और रोहित की बात सुन हृदय को ठेस लगी है कि उसकी शादी में पति रोहन ने नहीं कहा कि शादी में मिले उपहार पर ललिता का हक है , आज देवर बेबाकी से अपनी पत्नी को मिले सामान को बंदरबांट कर रहा है । सास भी रूचि को खुश करने के चक्कर में भूल रही थीं कि उनके दोहरा आचरण को लेकर ललिता का दिल कलपता है ।
शादी में आए रिश्तेदार जा चुके थे , घर में सास ससुर थे ललिता और रोहन , दो बच्चे , साथ में रोहित व रूचि । ऑफिस जाने के वक्त अफरातफरी मची रहती , सुबह छः बजे से लेकर दस बजे तक ललिता चक्करघिन्नी की भाँति सारे काम निपटाती , सास कुछ नहीं करती , ना रूचि घर के कामों में हाथ बंटाती है । रोहित प्रतिदिन रूचि के साथ ऑफिस चला जाता , रूचि ललिता और सास को बाय मम्मीजी बाय भाभी कहते हुए ठसक में रहती अपना हाथ हिलाते निकल जाती । ललिता के हाथों का बना नाश्ता करती और अपना और रोहित का लंच पैक कर लेती और बैग हिलाते ऑफिस चली जाती । हद तो बढ़ती है कि सास के शह पर वो भी ललिता की गृहकार्य में मदद नहीं करती , शाम को कुछ करना भी चाहे तो सास मना कर देती ,सब ललिता कर लेगी उसे काम करने की आदत है , तुम थक जाती होगी इसलिए अपने कमरे में जाकर आराम करो और देवर भी कुछ ना बोलते ? ललिता यह सब भेदभाव देख कुढ़ती , पर अपने पति से कुछ नहीं बोल पायी क्योंकि रोहन को औरतों के मामले में बोलना पसंद नहीं था , ना ही कभी कुछ बोले थे ।ससुर भी गंभीर स्वभाव के थे उन्होंने भी घर के अंदर क्या हो रहा है कभी भी हस्तक्षेप नहीं किया था । अब सिर के ऊपर पानी जा रहा था , यदि इस बार नहीं बोलती तो दोनों का( देवर देवरानी ) मन बढ़ता जा रहा धा और अब इनके उच्छृंखलता (निरकुंशता / स्वेच्छाचारिता ) पर लगाम कसना जरूरी था ।
हुआ यूँ , ललिता सुबह के नाश्ते में इडली बनाती है और गर्मागर्म साँभर इडली अपने दोनों बच्चों को देने के लिए प्लेट लगा रही, उसी समय रसोईघर में रूचि आती है भाभी मेरे और रोहण के लंच पैक कर दीजिए ना , मेरे लंच बॉक्स में दस बारह इडली डाल दीजिएगा ,अपनी कलिग को खिला दूंगी और रोहित को चार इडली दे दीजिए, दूसरे डिब्बे में सेब और खीरा दे दीजिएगा , मतलब जेठानी को फर्माइश/ आर्डर देने की आदी रूचि बड़े आराम से कह मुड़ने को हुई, अभी तो एक पारी ही इडली निकला है, शुभम् सुहाना को दे रही हूँ ,ऐसा करो रूचि तुम फ्रूट्स वाला लंच बॉक्स तैयार कर लो और दुबारा इडली दस मिनट में रेडी हो रहा है तब तक रूकना होगा ठीक है ना रूचि । अरे भाभी ये दोनों तो घर ही में है ना , मुझे देर हो रही है और रोहित को भी अपने बाॅस के साथ दूसरे जगह साइट पर जाना है , आप ऐसा करिये शुभम् सुहासी का इडली लंच में दे दीजिए और दुसरा पारी वाला आप इन्हें खिला देना , यह कह प्लेट में रखे इडली को टिफिन में रखने लगी है , ऐसा करते देख ललिता को काटो तो खुन नहीं !
सुबह से किचन में पसीने से लथपथ हो नाश्ता तैयार कर रही मैं और ये महारानी जी मेरे ही बच्चों के मुँह से निवाला छीन रही है , बर्दाश्त की भी सीमा होती है । ललिता ने झट से रूचि का हाथ पकड लिया , सुनो रूचि आज से और अभी से तुम अपना नाश्ता खाना डिनर खुद बनाना, सासु जी को तुम बहुत पसंद हो इसलिए उनकी जिम्मेदारी भी तुम्हीं निभाओ और हाँ अब से मैं तुम्हारे लिए खाना नहीं बना सकती , ना देवर के लिए बताऊंगी। तुमने मेरे सब्र का बाँध तोड़ दिया है , आज शाम को फैसला मेरा होगा कि मुझे तुम्हारे साथ रहना है या नहीं ? तुम कमाती हो अपने लिए ना कि मेरे लिए या मेरे बच्चों के लिए।
इसलिए खबरदार रूचि , मेरे रसोईघर में आयी तो ! इतना सुनते ही गुस्से में लाल हो रूचि झनमनाती अपने कमरे जाती है , जोर जोर से चीखने चिल्लाने की आवाज आ रही है , रोहित शांत होने को कहता है लेकिन रूचि अपनी मान मर्यादा भूल रोहित को तू ता और ना जाने कितने अपशिष्ट शब्दों से नवाजती है और देवर भींगी बिल्ली बन खड़े हैं । सास गई हैं रूचि को समझाने , उल्टे उन्हीं पर चढ़ बैठी है , मम्मी मेरे खाने पीने का हिसाब किताब किया जा रहा है मेरी कमाई को लेकर ताना मारा जा रहा है , अब मैं इस घर में नहीं रह सकती । लेकिन बेटा हुआ क्या, सारा वाकया नमक मिर्च और हींग के तड़का के साथ सास को परोसा जा रहा था वो रूचि के हाँ में हाँ मिला रही थीं इसलिए उसके सुर में सुर मिलाती जा रही थी , कमाऊ बहू कभी बैग सिल्क साड़ी ज्वेलरी लाकर देती थी और ललिता कहाँ से लाती ? वो तो कमाती नहीं थी ।
ठीक है बेटा ,तुम शांत हो जाओ । रात में सबके सामने अपनी बात रखना । दोनों टेंशन में हैं इसलिए ऑफिस नहीं गए।
रात मे रोहन ऑफिस से आते हैं तब सब लोगों को हाॅल में इकट्ठा होने को कहा जाता है । सास ससुर, रोहन और रोहित हैं ललिता भी बैठी है एकदम शांत और रूचि रो रो के मुँह सुजाए खड़ी है मानों उसके सिर पर मनों विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा है खुद को बिचारी जैसी दिखा रही है और ललिता रणचंडिका का रूप धारण की हुई है , आर या पार ।
ससुर पूछते हैं क्या हुआ बड़ी बहू ? आप मुझसे पूछिए ना क्या हुआ। बीच में सास की कर्कश बोली सुन ससुर डपटते हैं चुप हो जाओ रूक्मिणी , तुम्हारी दुष्टता के कारण ही आज हमारा घर महाभारत का अखाड़ा बना हुआ है और तुम बड़ी बहू की तुलना छोटी से क्यूँ करती हो , ललिता ने कभी तुमसे उच्च स्वर में बात की है , कभी भी तुम्हारे मेरे सेवा टहल में कमी की है , आज ऐसी स्थिती की जिम्मेदार तुम हो , कहाँ ललिता कहाँ तुम ! कोई तुलना नहीं है रूचि से , ना तुमसे ।
चार महीने से आई हो छोटी बहू , कितनी बार रसोईघर के तरफ झांकी हो , ललिता ने सब कुछ तुमलोगों के लिए निश्छल भाव से किया है उसका यह मूल्य चुका रही हो तुम और सास की बात में आकर कर रही हो ना तुम। अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार ली हो , सास के साथ पार्टी मजबूत बनाकर खुश हो रही हो ना , तो मैं आज से ये घर बाँट रहा हूँ । ऊपर तल्ले पर दो कमरे हैं बाद में और दो कमरे बनवा दूँगा , घर में सुख शांति चाहती हो तो रोहित, तुम और रूक्मिणी शिफ्ट जाओ । ललिता मेरे साथ रहेगी और दोनों पोता पोती मेरे साथ रहेंगे , रोहन तो मेरा खून है गऊ जैसा इसलिए उसे मैं अपने साथ रखूंगा। रोहित तुम अपनी बीबी के पैसे पर नाज कर रहे हो ना , पैसा से ही पेट नहीं भरता बल्कि हाथ पैर भी चलाना जरूरी । रूचि बहू ने बहुत बड़ा पाप किया है बड़ी बहन जैसी जेठानी को अंडरइस्टिमेट कर खून का आंसू रुलाया है जिससे आज कठोर फैसला लेना पड़ा है । ललिता भी हाई क्वालिफाइड है शायद उसने अपनी सास के बात का मान रखा और नौकरी नहीं किया और तुम जो पैसे का घमंड करती हो ना , तो जान लो इसके पिता ने एक फ्लैट दिया है और महंगे महंगे संस्कार तहजीब दिए हैं शायद तुम्हारे माता पिता देना भूल गए तुम्हें ।
ससुर के बात से ललिता का रोम रोम ससुर जी के प्रति अतिशय श्रद्धा से झूक गया है ,हृदय भी आह्लादित है। ससुर कभी भी घरेलू मसले में नहीं बोलते थे पर आज वो अपनी बड़ी पतोहू के लिए दुनिया का बेस्ट फादर इन लाॅ दिख रहे थे । न्याय के मूर्ति बन कर न्यायाधीश के रूप में सही फैसला सुनाया था ।
लेखिका : अंजूओझा
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