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चार बहुएँ

 शर्मा   जी  के चार बेटे थे और चारों की शादी हो चुकी थी। घर की कमान संभाल रही थीं शकुंतला देवी — घर की मुखिया और चारों बहुओं की सास।

पहली बहू थी सरोज। शादी के वक्त सरोज मुश्किल से अठारह साल की थीं। भोली-भाली, संस्कारी और बेहद सीधी। सुबह चार बजे उठकर नहा-धोकर साड़ी पहन लेना, घूँघट डालकर पूजा करना और फिर पूरे घर का खाना बनाना — यही उनका रोज़ का क्रम था। दिनभर बिना थके सबका ख्याल रखतीं और कभी शिकायत तक नहीं करतीं। लेकिन घर में उनका सम्मान जितना होना चाहिए था, उतना कभी नहीं हुआ। सबको लगता था कि यह तो उनका फ़र्ज़ है।

कुछ सालों बाद दूसरी बहू आईं रीना। रीना थोड़ी पढ़ी-लिखी थीं और मायके में ही सलवार-सूट पहनने की आदी थीं। घर आने पर जब उन्होंने घूँघट ओढ़ने से इंकार किया तो पूरे घर में हलचल मच गई।
“बहू, ये ससुराल है कोई कॉलेज नहीं।” — शकुंतला देवी ने ताना कसा।
लेकिन रीना हँसकर बोलीं — “अम्मा जी, घूँघट ओढ़ने से सम्मान नहीं बढ़ता। सम्मान तो हमारे व्यवहार से मिलता है। आप बस कहें तो मैं आपके सामने दुपट्टा ले लूँगी।”

धीरे-धीरे रीना ने पूरे घर का माहौल बदल दिया। अब सरोज को भी सलवार-सूट पहनने की इजाज़त मिल गई। सरोज को रीना का साथ अच्छा लगता, जैसे कोई उनकी साथी मिल गई हो।

लेकिन असली हलचल तब मची जब तीसरी बहू सोनाली घर आईं। मायके से इतना दहेज लेकर आईं कि शकुंतला देवी और उनके पति हरिशंकर जी तक हैरान रह गए। नई कार, लाखों रुपये नकद, फ्लैट और सोने के गहनों का ढेर।
सोनाली ने आते ही साफ़ कर दिया —
“देखिए, मैं नौकरी भी करती हूँ और शादी में मेरा परिवार इतना सब दे चुका है। तो अब मुझसे उम्मीद मत रखिए कि मैं सुबह-सुबह उठकर रोटियाँ बेलूँगी। मैं और मेरे पति अपना नाश्ता खुद बना लेंगे।”

पहली बार शकुंतला देवी चुप हो गईं। जिनके सामने कभी सरोज ने सिर झुकाया, रीना ने बहस की, वहाँ सोनाली ने सीधे-सीधे सख्ती से अपना रास्ता बना लिया। कारण साफ़ था — उसका दहेज और मायके की ताक़त।

अब घर का ढर्रा बदल चुका था। सरोज और रीना मिलकर घर का सारा काम करतीं और सोनाली अपने कमरे में मोबाइल और लैपटॉप पर व्यस्त रहतीं। शकुंतला देवी को मन मारकर यह सब सहना पड़ा, वरना सोनाली पलटकर जवाब देने से पीछे नहीं हटतीं।

कुछ साल बाद चौथी बहू नैना घर आईं। नैना का अंदाज़ और भी निराला था। वह एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करती थीं और शादी के बाद भी जॉब छोड़ने का सवाल ही नहीं था।
सुबह नौ बजे ऑफिस का लॉग-इन और रात देर तक काम। घर में रहते हुए भी उनका दिमाग़ मीटिंग और प्रोजेक्ट्स में उलझा रहता।

नैना का पहनावा भी सबसे अलग था। वह फ्रॉक, जींस और टॉप में आराम से घर के सामने आ जातीं। एक दिन तो रात के खाने पर सीधे नाइट ड्रेस में ही बैठ गईं। सरोज और रीना हैरान रह गईं। सोचतीं — “काश! हमारे पास भी इतनी हिम्मत होती तो हम भी सास के दबाव से बच जाते।”

नैना की सबसे बड़ी ताक़त थी उनकी कमाई। महीने में लाखों रुपये का पैकेज। घर में सास-ससुर से लेकर पति तक, सब उसकी इज़्ज़त इसलिए करते क्योंकि वह आर्थिक रूप से मज़बूत थी।
धीरे-धीरे घर की बागडोर नैना के हाथ में आने लगी। बड़ी बहू सरोज, जिसने अपनी पूरी जवानी घूँघट और रसोई में खपा दी, चुपचाप यह सब देखती रहीं।

लेकिन अजीब बात यह थी कि सरोज को नैना से जलन नहीं हुई। बल्कि उनकी आँखें भीग गईं। उन्होंने मन ही मन कहा —
“अच्छा है, कोई तो है जो इनको दिखा रहा है कि बहुएँ सिर्फ़ रसोई और आँगन तक सीमित नहीं। हम भले सह गए, लेकिन अगली पीढ़ी को तो सहना नहीं पड़ेगा।”

रीना भी नैना की बेबाकी देखकर खुश थीं। उन्हें लगता कि उनकी छोटी-छोटी लड़ाइयाँ अब बड़ी जीत में बदल रही हैं।
सोनाली थोड़ी जलन महसूस करती थीं क्योंकि उनकी ताक़त दहेज पर टिकी थी, जबकि नैना की ताक़त उसके हुनर और मेहनत पर।

शकुंतला देवी, जिन्होंने सालों तक अपनी हुकूमत चलाई थी, अब समझ चुकी थीं कि वक्त बदल चुका है। बहुओं के बीच भेदभाव करना, उन्हें झुकाना अब मुमकिन नहीं रहा।

धीरे-धीरे घर का माहौल बदल गया।

  • सरोज अब भी पूजा-पाठ और घर के काम में लगी रहतीं, लेकिन नैना अक्सर उन्हें काम में मदद के लिए कुक या मेड रखने को कह देतीं।

  • रीना अपनी मँझली पहचान से बाहर निकलकर बच्चों की पढ़ाई और घर के खर्चों में सक्रिय हो गईं।

  • सोनाली अब भी अपने दहेज के दम पर अकड़ दिखातीं, लेकिन उनके पति की नौकरी डगमगाने लगी तो घर में उनका रुतबा कम हो गया।

  • नैना, जो सबसे छोटी थीं, लेकिन सबसे आगे बढ़ी हुईं, परिवार में नई सोच और बराबरी का माहौल लाने लगीं।

एक दिन सरोज अपनी तीनों गोतनियों के साथ बैठी थीं। उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा —
“देखो बहनों, हम सब एक ही छत के नीचे रहते हैं। मैंने ज़िंदगी चुपचाप काट दी, रीना ने थोड़ा बदलाव किया, सोनाली ने दहेज का सहारा लिया और नैना ने अपनी मेहनत से सबका सम्मान पाया। मुझे तो यही लगता है कि औरत चाहे छोटी हो या बड़ी, उसे अपनी आवाज़ और पहचान ज़रूर बनानी चाहिए। तभी समाज और परिवार उसका सम्मान करेगा।”

नैना ने सरोज का हाथ थामकर कहा —
“दीदी, आपने जितना सहा, वो हमारी ताक़त है। आपने रास्ता नहीं बनाया होता तो शायद हम भी यह हिम्मत नहीं कर पाते।”

चारों बहुएँ पहली बार एक-दूसरे को समझ पाईं। उन्हें एहसास हुआ कि पीढ़ी दर पीढ़ी बदलाव ही असली ताक़त है।

मूल लेखिका : अंजू ओझा


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