राधिका जी का एक ही बेटा था, रजत। वह उसे बहुत प्यार करती थीं। राधिका जी दहेज नहीं चाहती थीं और एक पढ़ी-लिखी, संस्कारी बहू अपने घर लाना चाहती थीं। इसलिए उन्होंने अपनी सहेली की बेटी से रजत की शादी करा दी। जैसे उसकी बहू चाहती, वैसे करती। वह सुबह 9 बजे सोकर उठती, सासू मां से खाना बनवाती, अपनी सहेलियों को बुला लेती, नाच-गाना करती और तो और सासू मां से सहेलियों के लिए नाश्ता भी बनवाती।
यह सब उसके बेटे रजत को जरा भी पसंद नहीं था, लेकिन उसकी मां ने उसे रोक कर रखा था। हमेशा कहतीं, "जाने दे बेटा, धीरे-धीरे सब समझ जाएगी। तुम परेशान मत हो।"
इससे पहले माही खुद खाना बनाती थी। एक दिन उसकी सहेली अपनी बेटी से मिलने आई। पर जो देखा, उसके तो होश उड़ गए—अपनी सास मां से अपनी बेटी माही अपने पांव दबवा रही थी। माही की मां ने माही को एक थप्पड़ जड़ दिया और बोली, "तुझे शर्म है कि नहीं? अपनी सासू मां से कोई पांव दबवाता है क्या? नहीं, नहीं, मेरी ही गलती है कि मैंने तुझे सिर पर चढ़ा रखा है। इतना अच्छा परिवार मिला है, शायद इसलिए ही इनकी इज्जत नहीं करती।"
तभी रजत भी आ गया। "ठीक कह रही हैं आप, मुझे ही माने इसको कुछ भी कहने से मना किया है। मेरी मां से इतना कुछ करवाती है, फिर भी मां है कि कहती हैं जाने दो, समझ जाएगी। मेरी मां तो इसी उम्मीद में हैं कि एक दिन सब ठीक होगा। पर जब यह खुद बदलना चाहेगी, तभी ठीक होगा।"
माही की मां बोलीं, "नहीं दामाद जी, यह ऐसे नहीं मानेगी। आप इसको गाँव भेजो। जब देखेगी, बहुएं क्या-क्या करती हैं, तब समझ में आएगा।"
माही रोते हुए बोली, "मुझे नहीं जाना गाँव, मैं यहीं रहूंगी, मुझे माफ कर दो।"
माही की मां बोलीं, "कुछ नहीं दामाद जी, इसको ले जाइए।"
राधिका जी बोलीं, "तुम मुझे माफ कर दो, मुझसे कुछ बताया नहीं।"
राधिका जी बोलीं, "अरे, वह गाँव नहीं रह पाएगी।"
माही की मां बोलीं, "उसकी सासू मां तुम हो या मैं? अब तुम चुप रहो, जो तुझे करना चाहिए, वह मैं कर रही हूं।"
माही गाँव पहुंच गई। बड़ा सा घूंघट, साड़ी पहन रखी थी। रजत की दादी बोलीं, "बहरिया, तुम्हें नहीं पता कि कहीं से आते हैं, तो बड़ों के पैर छूते हैं?"
रजत ने माही से कहा, "दादी के पैर छुओ।"
माही ने दादी के पैर छुए।
"बहरिया, खाना खाकर थोड़ा आराम कर लो, फिर शाम को खाना तुझे ही बनाना है।"
माही बोली, "मुझे खाना बनाना नहीं आता।"
"क्या नहीं आता, कोई बात नहीं, जैसा बनाओगी वैसा हम सब खा लेंगे।"
माही चिढ़कर रह गई। शाम को खाना बनाया, सबने खाया। दादी बोलीं, "बहरिया, भोर में जल्दी उठकर स्नान करके ठाकुर जी की आरती में आ जाना। लेट हुई तो खाना-पीना सब बंद।"
अगली सुबह माही जैसे-तैसे उठकर पूजा घर में पहुंची।
दादी बोलीं, "ठीक है बहरिया, अब खाने की तैयारी कर लो।"
उधर रजत भी आने के लिए तैयार हो गया। माही रोने लगी, "मुझे घर चलना है यहां से।"
रजत बोला, "तुम अपने आप नहीं जा सकती जब तक दादी ना कहें।"
रजत भी चला गया।
धीरे-धीरे वहां रहते हुए उसे दो हफ्ते हो गए थे, पर सासू मां से बात करने की हिम्मत नहीं हुई। उसकी सासू मां ने फोन किया तो माही फूट-फूटकर रोने लगी, "मां, मुझे माफ कर दो, मुझसे गलती हुई है, अब ऐसा कभी नहीं होगा। अगर आप मुझे माफ कर दें तो मैं यहां जिंदगी भर रह लूंगी। बस एक बार आपके पैर छूकर माफी मांगनी है और रजत से भी।"
राधिका जी ने कहा, "ठीक है, हम कल आ रहे हैं।"
उसकी दादी बोलीं, "बहरिया, तू बड़ी किस्मत वाली है, ऐसी सास मिली है, उसे अपने पलकों पर बिठा। माही, मतलब राधे, मतलब कोई ऐसा दिन नहीं कि वह तुम्हें याद ना करती हो। गाँव में थोड़ा नियम ज्यादा है, परंपरा ज्यादा है, पर निर्दयी नहीं हूं। रजत ने सब कुछ बताया था, इसलिए यह सब कुछ करना पड़ा। अब तुम्हें अगर यहाँ पर शर्म है, तो घर जा सकती हो। एक बात बता दूं, तेरी सास हीरा है, तुमने उसके साथ कितना गलत किया, फिर भी वह तुम्हें कितना प्यार करती है, बिल्कुल अपनी बेटी जैसे।"
माही बोली, "हाँ दादी, बस वह जल्दी से आ जाएं।"
अगली सुबह माही के सास-ससुर उसको लेने आ गए। माही राधिका से लिपटकर खूब रोई, उनके पैर छुए और बोली, "अब कभी ऐसा नहीं होगा।"
माही ने दादी से कहा, "आप निश्चिंत रहिए, उनकी सेवा में कोई कमी नहीं होगी, आज से वह मेरी मां हैं।"
उसके बदले मिजाज को देखकर राधिका जी बहुत खुश थीं।
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