"आज फिर ये क्या ले आये ?"
"45" का एल.ई.डी टीवी है"
"टीवी तो है हमारे पास"
"अरे वो छोटा है उसे हम बैडरूम में लगा लेगे और इसे ड्राइंगरूम में.लोगों को भी तो पता चले हमारी हैसियत" बोलते हुए रजत के चेहरे पर गुरूर का भाव था
"कितनी बार कहा है मुझे ये दिखावा अच्छा नही लगता.दिखावे के चक्कर में आप कितने पैसे बर्बाद कर देते हो.मैं पैसे बचाने की कहती हूँ और आप उड़ा देते हो.कब से कह रही हूँ अपना घर ले लेते है पर आपको फर्क नही पड़ता." गुस्से और नाराजगी से मान्या बोली.
"फिर खुल गया तुम्हारा नसीहतों का पिटारा. जब देखो अपना घर ..अपना घर.. का रोना ले कर बैठ जाती हो.इतना बड़ा घर है.क्या कमी है इसमें और पैसे पेड़ पर लगे है जो तोडूं और घर खरीद लूं."
"घर बड़ा है पर अपना नही है.मुझे अपना घर चाहिए चाहे छोटा ही सही जिसे मैं अपनी पसंद से सजा संवार सकूं और माना पैसे पेड़ पर नही लगते लेकिन बचत तो कर सकते है और लोन भी ले सकते है पर आपको पैसे खर्च करने से फुर्सत कहाँ.
काश आप समझ पाते एक औरत के लिए अपने घर का क्या महत्व होता है." बोलते हुए मान्या की आंखें नम हो गई.
"बेटा बहू क्या गलत बोल रही है "बहुत देर से बेटे बहू की बातें सुन रही कमला जी से आखिर रहा नही गया तो उन्हें अपने कमरे से बाहर आ कर बोलना ही पड़ी.
"क्या माँ आप भी इसका साथ दे रही हो. आखिर क्या कमी है इस घर में.बड़ा है अच्छी सोसायटी में है."
"बेटा चाहे महल ही क्यों न हो लेकिन अपना न हो तो वो महल भी अच्छा नही लगता. बहू का दर्द मैं समझती हूँ.तुझे तो पता है तेरे पापा की छोटी सी दुकान थी उसी में गुजार मुश्किल से हो पाता था तो घर कहाँ से लेते.किराये के घर में रहते हुए जिंदगी बिता दी.मैं भी सोचती थी कभी अपना घर होगा पर मजबूरी थी.अब तो लगता है किराये के घर में ही मरूंगी.सच कह रही है बहू अपना घर होने की खुशी एक औरत से ज्यादा कोई नही समझ सकता.तू अभी कोशिश कर सकता है कल को बच्चे होंगे. स्कूल,कॉलेज जायेगे तो बचत नही हो पायेगी और बेटा कोई अच्छी नसीहत देता है तो उसे जरूर मानना चाहिए."
"सॉरी मम्मी,मान्या.मैं बहुत लापरवाह हूँ तुमने सही कहा अपना घर अपना घर होता है.मैं किराये के घर को ही अपना घर समझ बैठा.ये जानते हुए भी कभी न कभी ये घर खाली करना पड़ेगा."
कुछ महीनों बाद....
"मम्मी, मान्या जल्दी तैयार हो जाओ.कहीं जाना है."
"बताईये तो कहाँ जाना है ?"
"बस जल्दी से तैयार हो जाओ.कुछ घंटो की ही बात है सब पता चल जायेगा."
रजत दोनों को बहुत ही सुंदर सोसायटी के एक घर में ले गया.
घर का दरवाजा गेंदें और आम के पत्तों की माला से सजा था.दरवाजे पर बहुत सुंदर रंगोली बनी थी.अंदर से लोगों की आवाजें आ रही थी.कमला जी और मान्य हैरानी से रजत को देखने लगी.
"माँ,मान्या ये आप दोनों का अपना घर है. अब आप दोनों को किराये के घर में नही रहना पड़ेगा.अपने घर को आप जैसे मर्जी सजाओ संवारो."
दोनों सास बहू की आंखें खुशी से भर आई.आखिर उन्हें उनका अपना घर जो मिल ही गया था.
शशि ध्यानी
दिल्ली
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