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मामा

 अजय ने कई दिनों के बाद मेसेंजर खोला तो उसमें कुछ सन्देश दिखे। सभी तो जान पहचान के थे एक raymani नामक प्रेषक के 'hello' को छोड़ कर।  अजय ने इसे अनदेखा करते हुए अन्य सभी को उत्तर दे दिया।

दो दिनों के बाद उसी अनजाने मित्र raymani का पुनः सन्देश आया। इस बार लिखा था- सर, नमस्कार। मैं आपकी सभी कविताएं पढ़ती हूँ। मुझे आपकी भाषा शैली अत्यंत प्रिय है।

अब इसे पढ़ कर अनदेखा तो नहीं किया जा सकता था। एक प्रशंसिका का मन आहत हो जाता। अतः अजय ने उत्तर लिखा - आपका बहुत बहुत धन्यवाद जी। कृपया अपने नाम को हिंदी में लिखें ताकि हम उच्चारण कर सकें और आपको सम्बोधित कर सके ।

तुरन्त प्रतिक्रिया आयी - सर्, मेरा नाम रायमणि है और मैं कोलकाता से हूँ।

- पहली बार ऐसा नाम पढ़ रहा हूँ रायमणि। पहले नीलमणि, लालमणि, मणि, पारसमणि आदि नाम तो सुने थे किंतु रायमणि ....

- जी सर, यह बहुत यूनिक नाम है। मेरा नाम मेरे दादाजी ने मणि ही रखा था किन्तु रायबहादुर थे इसलिए मुझे रायबहादुर की मणि कहने लगे। फिर यह शॉर्ट फॉर्म में रायमणि ही रह गया।

(मुस्कुराने वाली स्माइली)

- वाह! बढिया। ठीक है रायमणि बाद में बात करता हूँ।।

- ओके सर। नो प्रॉब्लम। थैंक्स सर। बाय।

अजय ने इसके बाद फिर कई दिन मेसेंजर नहीं खोला। जब खोला तब सब से अधिक रायमणि के ही सन्देश थे और उनमें भी सब दिनों की सुबह की नमस्ते और रात की गुडनाइट।

एक सन्देश यह भी था - सर, कहाँ चले गए? प्लीज ग्रुप में आइये न!

अजय को लगा कि यह कोई लड़का है जो उसे खिझा रहा है। बेमतलब में सेन्टी बना घूम रहा है। एक बार तो लगा कि इसे ब्लॉक कर दे फिर अगले ही पल विचार आया कि बिना सोचे समझे  नहीं। सच्चाई तो पता लगाना ही चाहिए। इसलिए उसने मेसेज लिखा।

- रायमणि! कैसी हो?

- सर, एकदम ठीक। आप तो ठीक हैं न।

- जी हाँ, एकदम चौकस और चकाचक हूँ।

- बहुत अच्छा। ईश्वर आपको सदैव स्वस्थ रखे।

- रायमणि, क्या करती हो?

- सर, मैं गृहलक्ष्मी हूँ और दो प्यारी बच्चियों की मम्मी भी हूँ। (और तुरंत अपनी गोद मे बैठी दोनों बेटियों की फ़ोटो पोस्ट कर दी)

- और मातपिता व परिवार के अन्य सदस्य?

- सर माता पिता कोलकाता में रहते हैं जबकि बड़ी बहन जयपुर में ब्याही हैं और मैं ससुराल लखनऊ में। पति का फैंसी ज्वेलरी का व्यवसाय है।

-भैया भाभी?

- नहीं सर्, हम दो बहनें ही हैं।

- अच्छा तो मैं आज से आपको दिद्दा कहूँ तो? मुझे अपना भाई बना लेंगी आप?

- सर, आप को जो उचित हो वह कह लें मुझे कोई आपत्ति नहीं है। (हँसती हुई इस्माइली के साथ) ये मेरी खुशनसीबी होगी जो आप मेरे भाई बन रहे हैं।

इसके बाद वे दोनों वर्चुअल भाई बहन प्रतिदिन चैट करने लगे और हाल खबर लेते देते कुछ ही दिनों में वे एक दूसरे की शिक्षा, परिवार, आदतों, स्वभाव, हॉबीज आदि के विषय में जान गए। अजय से आधी उम्र की थी रायमणि किन्तु दोनों ही एक दूसरे को खूब वर्चुअल सम्मान देते थे। अस्सी किमी दूर रहते हुए भी दोनों में अति समीप्यता थी। वैसे भी कानपुर और लखनऊ को युग्म-शहर कहा जाता है। समीप्यता तो होनी ही थी। पूरी डिग्निटी के साथ दोनों चैट को जारी रखे रहे।

-----//------

लगभग एक माह बाद रायमणि ने एक दिन वार्तालाप के मध्य अचानक से लिखा- सर, मैं आपकी आवाज सुनना चाहती हूँ।

- ठीक है दिद्दा, पहले आप अपनी आवाज़ में  एक गाना गुनगुना कर अपलोड कर दीजिए।

- मुझे गाना नही  आता। (रोनी इस्माइली के साथ)

- ओह! तो अपना व्हाट्सअप नम्बर दीजिये।

- ◆■★©®∆£¢€¥

इस नम्बर अजय ने अपने स्वर में दो पंक्तियों का पाठ करके वॉइस मेसेज भेज दिया।

- थैंक्यू सर। थैंक्यू।

- दिद्दा, मुझे आपका स्वर सुनना हो तो?

तुरन्त एक वौइस् मेसेज आया .. थैंक्यू सर।

अजय ने उसे चिढाते हुए कहा - यह तो मेल वॉइस है। चीटर...

तभी व्हाट्सअप काल आयी.. रायमणि ही थी।

- हेलो

- जी सर, अब आवाज़ मेल लगी या फीमेल

- मैं चिढा रहा था आपको दिद्दा।

- सर्, मुझे विश्वास नहीं हो रहा है कि आपसे बात हो रही है।

- मैं स्वयं रिजर्व टाइप का बन्दा हूँ। मेरे हृदय ने कैसे आपसे बात करनी चाही... मैं स्वयं हैरान हूँ।

- मेरी लक अच्छी है जो फेसबुक में भी ऐसी इंस्पिरेशनल सख्शियत से मेरी बात हो रही है।

- चलिए ठीक है दिद्दा। अत्यंत आवश्यक हो तो ही काल करें अन्यथा नहीं। आपको निराश होना पड़ेगा क्योंकि मैं कॉल को इग्नोर करूँगा।

- नहीं करूंगी सर, मुझे आपको खोना नहीं है। ओके बाय सर।

रायमणि स्वयं को बहुत प्रसन्न और उल्लास से भरा हुआ महसूस कर रही थी।

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दो माह बाद

- सर एक बात बोलनी थी आपको

- जी दिद्दा कहें आप।

- सर कल आप लखनऊ आ जाइये।

- क्यों? क्या हुआ।

- सर, मेरी बडी बेटी का जन्मदिन है। आशीर्वाद दे जाइए। आपका बड़ा उपकार होगा।

- हम्म! दिद्दा मैं ट्राय करूँगा। श्योर नहीं हूँ।

- ओके सर। मैं लोकेशन भेज रही हूं।

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रायमणि ने बर्थडे केक में साथ ही पूजा की एक थाल सजाई और उसमें एक राखी भी रख ली, पहली बार भाई आ रहा था। राखी तो वह बाँधेगी ही। बेटियों को भी बताया था कि आज उन्हें  मामा मिलने वाले हैं। पति को पहले ही वह बता चुकी थी। देर से केक काटने के बाद भी इंतजार करती है किंतु रायमणि का विशिष्ट मेहमान नहीं आया। उसे लगा कि किसी कार्य में फंस जाने के कारण अ'जय' सर  नहीं आये हैं।

उसने मेसेंजर में मेसेज किया।

कोई उत्तर नही  आया..

प्रतिक्रिया सुबह तक भी नहीं आयी..

दोपहर.. शाम.. रात..

अगली सुबह भी कोई प्रतिक्रिया नही आई।

उसने कॉल करने का मन बनाया। फिर ठहर गई। सोचा इतना भी जरूरी नहीं है। अजय सर को बुरा न लग जाय।

फेसबुक में भी दो दिनों से कोई अपडेट नहीं थी अजय की।

मन नहीं माना तो कॉल लगा दी..

पूरी घण्टी गयी किन्तु नहीं उठा फोन..

वह सहम गई..

उसे लगा कि सर इग्नोर कर रहे हैं।

आकुल मन से विवश हो कर 10 मिनट बाद पुनः कॉल की..

फोन उठा तो उसने कहा - हेलो सर।

- कौन बोल रही हैं आप?

- यह अजय सर का फोन है न?

- जी हाँ। मैं उनका बेटा बोल रहा हूँ।

- कौन मानस?

- जी हाँ पर आप कौन हैं?

- मैं आपके डैडी की वर्चुअल इंटरनेट बहन हूँ लखनऊ से। कृपया अजय सर से बात करा दीजिये।

- पर आँटी.... डैडी तो नही रहे!

- क्या? सर नहीं... (उसके हाथ से फोन छिटक कर नीचे गिर गया। धड़कनों में अचानक उबाल आ गया। आँखों से जल प्रपात बाह निकला। कांपते हाथों से फोन उठाकर कानों से लगाया और बोली - पर कैसे..  कहाँ..

- परसों दोपहर लखनऊ के लिए निकले थे। उनके एक  दोस्त की बच्ची की सालगिरह थी। उन्नाव के पास उनकी बस का एक्सीडेंट हो गया और हॉस्पिटल आते आते ...

- हे ईश्वर! मैं ही वह अभागी हूँ जिसकी बेटी का जन्मदिन था। उफ्फ!

रायमणि की आँखों से जलधार रुकने का नाम नहीं ले रही थी। उसकी दोनों बेटियाँ टुकुर टुकुर अपनी मम्मी को देख रही थीं। उसने दोनों बेटियों को सीने से चिपटा लिया और बोली, "मेरी बच्चियों! अब तुम्हारी लाइफ में  कोई मामा नहीं आने वाला।" हथेलियों में दबी राखी को उसने दूर फेंक दिया।

इसके बाद रायमणि ने वर्चुअल लाइफ से सन्यास के लिया।


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