"मम्मी कॉलेज की तरफ से हमे एक हफ्ते के लिए शिमला ले जा रहे है.मैंने भी अपना नाम लिखवा दिया है."कॉलेज से आते ही सायना बोली.
"कोई जरुरत नही जाने की.लड़कियां का ऐसे अकेले बाहर जाना ठीक नही. आजकल के लड़की वैसे भी पढ़ाई से ज्यादा प्यार व्यार में पड़ी रहती है." सरोज के कुछ कहने से पहले दादी नीरा जी बोल पड़ी
"क्यों दादी मैं क्यों नही जा सकती.भाईया भी तो गया था कुछ दिन पहले अपने कॉलेज ट्रीप पर.तब तो आपने कुछ नही बोला."
"वो लड़का है और तू लड़की."
"दादी आप हमेशा से भेदभाव करती आई है इससे अच्छा होता आप गांव में ही रहती. बेकार ही यहाँ चली आई."बहुत समय से सायना के मन में दबा गुस्सा बाहर निकल गया.
"सायना तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई दादी से ऐसे बात करने की.चलो माफी मांगो."
सायना ने दुखी मन से नीरा जी से माफी मांगी और रोते हुए अपने कमरे में चली गई.
"देख लिया ज्यादा आजादी देने का नतीजा. लड़कियों को इतना मुंह चलाना शोभा नही देता."
"अम्मा जी आपकी हर बात लड़की लड़का पर शुरू हो कर उन्हीं पर खत्म क्यों होती है.क्या लड़कियो की ख्वाहिशें नही होती. वैसे भी लड़कियो को अपनी ख्वाहिशें पूरे करने के मौके बहुत कम मिलते है."
"कौन कह रहा है कि अपनी इच्छा पूरी मत करो .बस जो करना है अपने ससुराल में और अपने पति की अनुमति से करे.लड़की की इज्ज़त बहुत नाजुक होती है.मायके में रहते हुए कुछ ऊंच नीच हो गई तो जिंदगी भर का दुख."
"अम्मा जी जब मायके में ही बेटी की ख्वाहिशें पूरी नही की जाती तो ससुराल से क्या उम्मीद. कई माता पिता ऐसे ही बोल कर अपना पल्ला झाड़ लेते है पर क्या सचमुच मायके में बहू की ख्वाहिश पूरी होती है."
"बहू तुम तो ऐसे कह रही हो जैसे हमने तुम्हें बेढ़ियों में जकड़ा हुआ है.जाती तो हो तुम बाहर,शादी पार्टी और घूमने."
"घर के लिए खरीदारी करना ,रिश्तेदारों के घर शादी ब्याह में जाने को आप घूमना कहती हो.आप सोच कर बताईये कभी मैं अपनी मर्जी से कही गई हूँ या एक दिन सिर्फ अपनी मर्जी से बिताया है. मेरा भी मन करता है कभी बिना चिंता फ्रिक के अपने लिए समय निकालू.वो जिसमें सिर्फ मै हूँ."
"बहू गृहणी के लिए ऐसा समय कभी नही आता न ही हमने बिताया है."अब तक नीरा जी थोड़ी शांत हो चुकी थी.
"तो क्या इसलिए हम सायना की ख्वाहिशें भी मार दे."
"आप अपनी सहेलियों के साथ कभी मथुरा, काशी और भी कितनी जगह जाती रहती है. ये ऑफिस टूर पर जाते है तो वहाँ घूम भी लेते है.बंटी भी अपने दोस्तों के साथ जाता रहता है.क्या ये नियम मेरे और मेरी बेटी के लिए ही बने है.मैंनै अपनी ख्वाहिशें को को मार दिया पर मेरी बेटी की सारी ख्वाहिशें पूरी होगी.
"सच कहती है बहू.जरूरी नही जो हमने सहा हमारी बेटी भी सहे.अब से मैं सायना को कभी नही टोकूगी.अभी जा कर अपने लाड़ो को मनाती हूँ.तब तक तू उसकी पसंद का सूजी का हवला बना कर ला."
सरोज खुश थी कि अब उसकी बेटी की ख्वाहिशें दम नही तोड़ेगी,कम से कम मायके में तो नही.
शशि ध्यानी
दिल्ली
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