शहर के सबसे बड़े मॉल में लोगों की भीड़ लगी हुई थी। कोई कपड़ों की दुकानों में व्यस्त था तो कोई इलेक्ट्रॉनिक्स की शॉप में। इसी भीड़ में सुषमा देवी अपने बेटे निखिल और बहू अनु के साथ चल रही थीं।
निखिल ने नए जूते खरीदे थे और बहू अनु भी कई बैग और ड्रेस खरीद चुकी थी। अचानक सुषमा एक चप्पल की दुकान के सामने रुक गईं। शीशे की अलमारी में रखी भूरे रंग की चमड़े की चप्पल पर उनकी नजर ठहर गई।
उन्होंने एक बार देखा, फिर आगे बढ़ गईं। पर अगले ही पल फिर मुड़कर उस चप्पल को देखने लगीं।
निखिल ने देखा—
“मम्मी, आपको पसंद आई क्या?”
सुषमा झेंपकर बोलीं—
“अरे नहीं बेटा, बस यूं ही देख रही थी। वैसे भी पुरानी चप्पल अभी काम कर रही है। नया लेने की जरूरत ही क्या है?”
अनु ने हँसते हुए कहा—
“मम्मी, पुरानी चप्पल तो सिलाई से भी जुड़ी हुई है। आप जैसे ही चलती हैं, चूं-चूं की आवाज़ करती है। अब तो बदल ही डालिए।”
सुषमा ने धीमे स्वर में कहा—
“बिटिया, जब तक चल रही है, क्यों फिजूल खर्च करें? वैसे भी घर के कामों में चप्पल ज्यादा टिकती कहां है।”
निखिल ने चप्पल उठाई। उसकी कीमत देखकर वह ठिठक गया—2200 रुपये।
“मम्मी, ये तो महंगी है।”
सुषमा ने तुरंत जवाब दिया—
“देखा न! इतनी महंगी चप्पल मैं कभी नहीं पहन सकती। जब तुम्हारे पापा थे, तब भी मैंने कभी अपने लिए इतनी कीमत की चीज़ नहीं ली। अब तो और भी क्या जरूरत है।”
इतना कहकर सुषमा आगे बढ़ गईं।
उस रात जब निखिल अपने कमरे में था, उसे बरसों पुराना वाक़या याद आ गया।
वह तब सातवीं क्लास में था। उसका एडमिशन अच्छे स्कूल में हुआ था। उसे नए जूते चाहिए थे, पर पापा की नौकरी चली गई थी और घर की हालत तंग थी।
निखिल याद करता है—
“मैं दुकान में खड़ा था। ब्लैक शूज़ बहुत पसंद आए थे। मम्मी ने दुकानदार से कीमत पूछी। 850 रुपये। मम्मी ने पर्स खोला, उसमें सिर्फ 900 रुपये थे। उस वक्त हमारी महीने भर की ज़रूरतें उन्हीं पैसों से चलनी थीं।
मम्मी ने दुकानदार से कहा—
‘पैक कर दो। बच्चे को चाहिए।’
घर आकर मम्मी ने मुझे जूते पहनाए। मैं खुशी से उछल पड़ा। पर तब मैंने देखा—मम्मी की चप्पल फट चुकी थी। अगले दिन उन्होंने उसे सुई-धागे से सी दिया। और कई साल तक उसी चप्पल में घर-बाहर का सारा काम करती रहीं।”
आज वही दृश्य दोहराया जा रहा था। बस फर्क इतना था कि अब बेटा कमाऊ हो गया था। अच्छे पैकेज पर नौकरी करता था, विदेश तक जा आया था। पर मम्मी के त्याग की आदत अब भी जस की तस थी।
अगले दिन ऑफिस जाते समय निखिल ने ठान लिया—
“अब चाहे कुछ हो जाए, मम्मी के लिए वो चप्पल लाकर रहूंगा।”
शाम को निखिल घर लौटा तो देखा, मम्मी मंदिर से वापस आ रही थीं। पांव में वही पुरानी सिलाई वाली चप्पल थी।
निखिल ने कहा—
“मम्मी, चलो आज फिर मॉल चलते हैं। आपको चप्पल दिलानी ही है।”
सुषमा बोलीं—
“बेटा, मैंने दुकानदार से बात कर ली है। वही मोहल्ले वाली दुकान पर अच्छी चप्पल मिल जाएगी, सस्ती भी होगी।”
असल में, दिन में ही सुषमा दुकान पर जाकर दुकानदार से कह आई थीं—
“देखो भाई, शाम को मेरा बेटा आएगा। वो महंगी चप्पल दिलाना चाहेगा। तुम कीमत ज्यादा मत बताना। और अगर वो ज़िद करे तो सस्ती वाली चप्पल ही दिखाना। बाद में मैं आकर असली दाम चुका दूंगी।”
दूसरी तरफ निखिल भी चुप नहीं बैठा था। वह पहले ही जाकर दुकानदार से कह आया था—
“अंकल, मम्मी को जितनी भी चप्पल दिखाएँ, कीमत 500–700 रुपये कम बताइएगा। बाद में मैं आपको असली पैसे दे दूंगा। असल में मम्मी अपनी खुशियों पर खर्च ही नहीं करतीं।”
दुकानदार दोनों की बातें सुनकर मुस्कुरा दिया। “वाह री मां-बेटे की जोड़ी! दोनों एक-दूसरे की परवाह में कीमतों का खेल खेलने चले हैं।”
शाम को जब वे दुकान पहुंचे तो दुकानदार ने कई चप्पलें निकालकर रख दीं।
सुषमा ने फिर वही महंगी चमड़े की चप्पल उठाई। हल्के हाथों से उसे सहलाया, फिर वापस रख दी।
“नहीं भाई, ये तो बहुत महंगी होगी। दिखने में ही लग रहा है।”
निखिल बोला—
“मम्मी, आप ट्राय तो कर लीजिए। कीमत की चिंता मत करिए।”
सुषमा ने चप्पल पहनी। आरामदायक थी। पांव में मानो बादलों का स्पर्श हो। उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई, लेकिन उन्होंने तुरंत कहा—
“नहीं बेटा, ये छोड़ दो। ये हमारे बस की नहीं।”
निखिल ने पर्स निकाला।
“अंकल, पैक कर दीजिए।”
सुषमा ने रोकना चाहा।
“निखिल, इतना पैसा बरबाद क्यों करता है?”
दुकानदार ने दोनों को देखा और बोला—
“बेटा, ये चप्पल की कीमत 2200 रुपये है। पर आज इसकी असली कीमत रुपये में नहीं, भावनाओं में है। ये मां के त्याग और बेटे के प्यार का प्रतीक है। मैं इसे किसी भी पैसे में नहीं बेच सकता। ये तो मेरी तरफ से मां-बेटे के रिश्ते को एक छोटा-सा उपहार है।”
सुषमा और निखिल दोनों चौंक गए।
“पर अंकल, आप ऐसा क्यों कर रहे हैं? ये आपका नुकसान है।”
दुकानदार हँस पड़ा—
“नुकसान? नहीं बेटा। आज तो मैंने अपने जीवन का सबसे बड़ा मुनाफा कमाया है। सालों से जूते-चप्पल बेचते-देखते आए हैं, पर मां-बेटे की ये अनकही जुगलबंदी पहली बार देखी है। मां चाहती है बेटे का पैसा बचे, बेटा चाहता है मां की खुशी खरीदे। ये सौदा रुपयों का नहीं, दिलों का है।”
सुषमा की आँखों में आँसू भर आए। उन्होंने चप्पल पहनी और बेटे का हाथ थाम लिया।
“निखिल, आज पहली बार मुझे लगा कि मेरे सारे त्याग का फल मिल गया। मुझे इस चप्पल की कीमत नहीं चाहिए, मेरे लिए असली दौलत तुम्हारा यह प्यार है।”
निखिल ने मां के पैरों पर हाथ रख दिए—
“मम्मी, अगर मैं आज कुछ भी बन पाया हूँ, तो सिर्फ आपके त्याग और समझदारी की वजह से। ये चप्पल मेरे लिए करोड़ों की है।”
अनु भी भावुक हो गई।
मॉल की भीड़ में खड़े वो तीनों मानो रिश्तों की असली कीमत समझ चुके थे।
मां का प्यार और त्याग कभी भी पैसों से नहीं तौला जा सकता। वो हमेशा अपनी खुशियों से समझौता कर बच्चों को खुश करती हैं। लेकिन जब बच्चे बड़े होकर मां के त्याग को समझते हैं और उनकी इच्छाओं को पूरा करने का प्रयास करते हैं, तो यही सबसे बड़ा उपहार होता है।
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