"तुम्हारी वजह से मैं खुद से प्यार करने लगी हूँ, हाँ, मुझे जीना आ गया है।"
आज अपनी शादी की 50वीं सालगिरह के मौके पर जब सभी रिश्तेदारों और मेहमानों ने सुनीता जी की तारीफ की, तो वह अपने पति को इस बात का क्रेडिट देने से खुद को रोक नहीं पाईं। बालकृष्ण जी ने सुनीता जी का हाथ अपने हाथों में लेकर उन्हें इशारा किया—"अगर तुम समझो तो चारों तरफ प्यार ही प्यार है।"
सुनीता जी और बालकृष्ण जी के दो बेटे और एक बेटी हैं। बेटी अपनी ससुराल में खुश है, दोनों बेटे और बहुएँ उनके साथ ही रहते हैं। लेकिन पहले सुनीता जी ऐसी नहीं थीं—हर समय घर की बहुओं के साथ टोका-टाकी, कभी समय से नहीं उठने का रोना, तो कभी उनकी पसंद का खाना न बनने की शिकायत।
आज चाय-नाश्ता समय पर नहीं मिला, तो आज बहू ने घर की सफाई अच्छे से नहीं की। जब तक बालकृष्ण जी ऑफिस जाते, उन्हें घर की बातों से कोई मतलब नहीं होता था। बालकृष्ण जी की रिटायरमेंट के बाद एक दिन—
"बहू, ये तुमने क्या बनाया है? मटर की सब्जी? अब इस उम्र में ये सब नहीं खाया जाता। मटर-गोभी और अरबी बढ़िया लगती है, लेकिन तुम सुनती ही नहीं, तुम्हें अपनी पसंद का खाना बनाना है। अरे, हम बूढ़े-बूढ़िया कहाँ जाएँगे?"
"मम्मी जी, अब मुझसे भी दो-दो सब्जी नहीं बनती, एक खाना बनाने वाली रखवा लो जो आपको जो पसंद होगा बना दिया करेगी," अलका बोली।
"अब क्या यही दिन देखने को रह गए हैं कि हम नौकरानी के हाथ का खाना खाएँ!?"
फिर फ्रिज खोलकर देखने लगीं—"कितना गंदा पड़ा है, कितने दिन की सब्ज़ियाँ सड़ रही हैं!" इस पर हल्का सा मुंह बनाकर कमरे में चली गईं।
थोड़ी देर बाद सुनीता जी अपना और अपने पति का खाना लेकर कमरे में गईं—
"सुनिए जी, आज मटर की सब्जी से काम चला लीजिए, बहू को कितनी बार कह चुकी हूँ, फिर भी वो यही सब बनाती है।"
"सुनीता, मैं सोच रहा हूँ कि कोई खाना बनाने वाली बुला ही लें। इससे हमें भी मनपसंद खाना मिल जाएगा और तुम्हारा सिरदर्द भी कम होगा, जिससे बहू के साथ तुम्हारी रोज़ की बहस भी नहीं होगी, फिर तुम भी खुश रह सकोगी मेरी तरह," कहकर बालकृष्ण जी हँसने लगे।
"आपको तो हर बात मजाक लगती है! खाना बनाने वाली रख लें, जिससे ये बहुएँ हमारे हाथ से बिल्कुल निकल जाएँ? जितना घर में रुकी हैं, उतना भी नहीं दिखेंगी। क्या इनका फर्ज़ नहीं है सास-ससुर को उनके हिसाब का खाना बनाकर दें?"
"क्यों नहीं है? उनका भी फर्ज़ है, लेकिन तुम उनको थोड़ी सी आज़ादी देकर तो देखो। अभी तो लगता है तुम हिटलर की तरह उनके सिर पर नाचती हो, इसलिए वो जान-बूझकर कुछ न कुछ हरकत करती हैं। ये जो तुम उनसे बहस करती हो, उससे तुम्हारा सम्मान भी कम हो रहा है और तुम्हारा सिरदर्द भी बढ़ता जा रहा है। बहुओं के आने के बाद से तुम्हारे चेहरे का ग्लो खत्म हो गया है, अभी से 80 साल की लगने लगी हो, बीमार भी बहुत रहने लगी हो। पिछले महीने ही तुम्हारी परेशानी इतनी बढ़ गई थी कि तुम्हें हॉस्पिटल में एडमिट करना पड़ा था, तब बहुओं ने ही तुम्हारी रात-दिन सेवा की थी। हमारी बहुएँ दिल की बुरी नहीं हैं, उन्हें बस तुम्हारी टोका-टाकी से थोड़ी आज़ादी चाहिए।"
"तुम भूल क्यों गई, तुम भी तो अपनी पसंद से काम करके खुश रहती थी। अम्मा कितना समझती थी, तुम कमरे में आकर कितना बड़बड़ाती थी। आज ज़माना बदल गया है, अब बहुएँ मुँह पर ही बोल देती हैं। तुम्हें तो खुश रहना चाहिए, तुम्हारी दो-दो बहुएँ हैं, अपनी जिम्मेदारी उन पर छोड़कर आराम करो और अपनी उम्र से कम दिखने की कोशिश करो, न कि ज्यादा। और जिम्मेदारी के साथ उन्हें अधिकार भी दो, फिर देखना तुम कितनी खुश रह सकोगी। लेकिन इन सबके लिए तुम्हें खुद से प्यार करना होगा। अगर तुम्हें खुद से प्यार होगा तो तुम खुद इन परेशानियों से खुद को अलग कर पाओगी। अगले साल हमारी शादी की 50वीं सालगिरह है, अगर ऐसे ही रही तो ऐसा न हो कि हमारा साथ बीच में ही छूट जाए। मैं तुम्हें उस दिन पुरानी सुनीता के रूप में देखना चाहता हूँ। अब हमारे पास समय है, हमें यह समय एक-दूसरे को देना चाहिए, न कि घर-गृहस्थी में ही उलझे रहना।"
बालकृष्ण जी की बातों ने सुनीता जी को सोचने पर मजबूर कर दिया। सही तो कह रहे थे वो—अभी से कितनी उम्र लगने लगी है उनकी, शायद हर समय सोचने की वजह से। कभी दर्द की समस्या, तो कभी शुगर! सही में, जिंदगी उनकी है, तो अपने बारे में खुद ही सोचना पड़ेगा। दूसरे लोग तो आपको समझा ही सकते हैं।
उनके मन में अपराधबोध पैदा हो गया—अपनी बहू के लिए भी, क्योंकि उनकी मंशा बहू का दिल दुखाने की नहीं थी, वो तो यही सोचती थीं कि घर की बड़ी हैं, तो सारी जिम्मेदारी और अधिकार अपने पास रखने चाहिए। अपराधबोध अपने पति के लिए भी, जिन खूबसूरत पलों को ये दोनों पूरी जिंदगी न जी पाए, वो पल जिंदगी के इस मोड़ पर दोबारा मिले तो भी, एक-दूसरे के साथ समय ना बिता सके, बस घर-गृहस्थी में ही उलझे रहे। यहाँ भी उनकी मंशा पति की भावनाओं को ठेस पहुंचाने की नहीं थी, वो तो बस घर को संभालने में ही सब कुछ भूल चुकी थीं।
उस दिन से सुनीता जी ने बहू के साथ टोका-टाकी बंद कर दी और अपने आप को टहलने, बालकृष्ण जी के साथ बात करने में व्यस्त कर लिया। पूरी जिंदगी जिन पलों को जीने की इच्छा मन में दबाए रखी, अब उन पलों को जीने लगीं। बहू भी टोका-टाकी बंद होने से खुद को आजाद महसूस करने लगी। अब वो सास-ससुर की पसंद पूछ लेती।
आज इन दोनों की शादी की 50वीं सालगिरह थी। आज सुनीता जी का रूप बहुत बदला हुआ था। जिन रिश्तेदारों और मेहमानों ने उन्हें काफी समय से नहीं देखा था, वे उनके नए रूप की तारीफ कर रहे थे। सुनीता जी मन ही मन अपने पति को धन्यवाद दे रही थीं।
शादी की सालगिरह एक ऐसा मौका होता है, जिस पर हर औरत सुंदर दिखना चाहती है, चाहे उसकी उम्र कितनी भी हो। आज सारी बातों से एक तरफ होकर सुनीता जी का चेहरा चमक रहा था और वह भी क्यों न, उन्हें खुद से प्यार जो हो गया था—वह भी अपने पति की समझदारी की वजह से।
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