इस बार जब मैं घर लौटा तो बाबू जी थोड़े बूझे बूझे लगें मुझे,बस यह सोचकर कि उम्र का प्रभाव हो सकता है चरण वंदन किया और घर के अंदर प्रवेश कर गया.! पत्नी हमेशा की तरह हाथ में तौलिया लिए बरामदे में पानी के साथ खड़ी थी,हाथ मुह धोया और वहीं पास बिछी चारपाई पर बैठ गया.! पर बार बार मेरी नजर बाबू जी के ही तरफ चली जा रही थी जो व्हीलर पर बैठे जाने किस सोच में डूबे थे.! सच कहूँ तो अब एक अजीब सी बेचैनी और चिंता मुझ पर और मेरे मन मस्तिष्क में हावी हो रही थी,ऐसा कभी भी नहीं हुआ था कि मैं घर लौटा हूँ और बाबू जी ने मेरा हाल चाल या मुझसे कुछ पूछा न हो पर इसबार वो बिल्कुल शांत थे.! मुझसे रहा नहीं गया मैं उठकर बाबू जी के पास गया और उनके पास बैठ उनका पैर दबाने लगा.! अपने ही ख्यालों में गुम बाबूजी मेरा स्पर्श पा कर एका एक चौंक गयें..!!
मैंने उनसे पूछा क्या बात है बाबा आप इतने बेचैन से क्यूँ दिख रहें हैं ? तबीयत ठीक है न कोई परेशानी तो नहीं ?
बाबू जी ने कहा नहीं बेटा कोई परेशानी की बात नहीं.!
मैंने फिर पूछा - कहीं बहू ने तो कुछ नहीं कह दिया या फिर बच्चें ?
अरे नहीं ऐसी कोई बात नहीं...!!
तो फिर आप इतने परेशान और मायूस क्यों हैं ?
मेरे कई बार पूछने पर और दवाब देने पर हार कर उन्होंने जवाब दिया कि कुछ नहीं बेटा तेरी माँ के बारे में सोच जाने क्यूँ आज कल मन हर पल भारी रहता है.! जबसे गयी है सब कुछ सूना सूना सा लगने लगा है,सोचता हूँ वक्त भी कितना निष्ठुर होता है कि इंसान को जिस उम्र में एक अदद साथी की आवश्यकता होती है उसे अकेला कर देता है या फिर मैं स्वयं कितना अभागा हूँ कि जिस साथी को मैं ख़ुद इस घर में उसके पिता के घर से डोली में बिठा विदा कर ले कर आया उसे स्वयं इस घर से विदा कर दिया,मेरा शक सही निकला मेरी माँ जो अभी कुछ साल पहले ही इस दुनिया को अलविदा कह पंचतत्व में विलीन हो गई थी.! उसके जाने के बाद बाबूजी बिल्कुल अकेले हो गयें थे और रह रह कर माँ की कमी बाबूजी को खाऐ जा रही थी, एकदम से टूट से गए थे वो,माँ थी तो फौलाद से दिखते थे मगर आज उनके चेहरे पर एक अजीब सा जर्जरापन एवं तड़प देख रहा था मैं,पलकें नम किए वो कहे जा रहे थे मानो आज उन्हें मौका मिल गया हो अपने मन में छुपे अनगिनत भावनाओं को बाहर करने का,तेरी माँ- उसकी एक विदाई वह थी जब वो अपने पिता के घर से विदा होकर मेरे घर आयी थी,जिसने आते ही मेरे सूने मन,वीरान से पड़े घर में या यूँ कहो बेरंग से जीवन में कई रंग भर दिए थे,जब वो इस घर में आई घर और जीवन में खुशियां ही खुशियां भर गई,पहली वार भी वह सज धजकर दुल्हन बन कर मेरी ज़िंदगी में आयी थी,इस वार भी वह सज धज कर सोलह श्रृंगार कर मेरे घर से,मेरी ज़िंदगी से विदा ले लिया उसने,जब वो थी हमने मिलकर जिंदगी के कई सुख,अनगिनत दुख बांटे पर एक दूसरे को कभी टूटने नहीं दिया पर उसकी इस दूसरी विदाई ने इस घर को तो छोड़,मेरे जीवन को सूना कर दिया,तोड़ डाला मुझे मानो उसके बिना मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं,उसकी कमी हर पल काटती है, हर क्षण दर्द देती है,मानो गम और दर्द के सिवा कुछ नहीं बचा हो जीवन में,बचा है तो बस एकाकीपन और कांटों सा चुभता सूनापन,ऐसा लगता है ज़िंदगी तो है पर इक बोझ सी बन गयी हो जैसे ,साँसें तो हैं पर धड़कनों को उनकी अब चाह नहीं रही.! वो कह रहे थे और उनके आँखों से आँसू ढलकते या यूँ कहें विदा हो रहे थे,और मैं शांत चुप चाप सब सुनता अपने आँसू रोके बाबूजी का हाथ पकड़े उन्हें देखे जा रहा था पर सच कहूँ तो ये सब सुन कर और बाबूजी की हालत देख कर मैं दहल सा गया था,रोम रोम सिहर रहा था मेरा और मन ही मन सोच रहा था कि कितनी विचित्र होती है ये "विदाई" भी कभी किसी को किसी से मिला देती है तो कभी पल भर में किसी को किसी से जुदा करवा देती है,जो अभी है जाने कब पलक झपकते ही सब कुछ छोड़ हमारी ज़िंदगी से विदा हो जाता है कभी न मिलने वाला एक अतीत छोड़कर.! बचपन से लेकर जवानी तक,जवानी से लेकर बुढ़ापे तक पता नहीं कितनी बार हमें "विदाई" शब्द से रूबरू होना पड़ता है.! आज इस घर तो कल उस घर,अभी यहाँ तो दूसरे क्षण वहाँ,एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश,एक शहर से दूसरे शहर.! पर इन सबसे ऊपर होती है "अंतिम विदाई" आत्मा की… जब वह दुल्हन बन चिता की अग्नि के फेरे लेते हुए चल पड़ती है परमात्मा के साथ जिसके पीछे छूट जाते हैं जाने कितने रिश्ते-नाते,अपने-पराये पर-परिवार,रिश्तेदार रोते बिलखते बच्चे आँखों में आँसू लिए.!
सच "विदाई" कैसी भी हो,कभी भी हो,किसी की भी हो इंसान को अंदर से तोड़ देती है जैसे माँ की अंतिम "विदाई" ने बाबूजी को तोड़ डाला था.!.पर यह भी उतना ही सच है कि "विदाई" चाहे कितनी भी पीडादायक क्यों न हो पर यही सत्य है,भरे ह्रदय से ही सही हम सभी को विदाई की इस रस्म को निभानी ही पड़ती है जो शाश्वत भी है और अटल सत्य भी..!!
और फिर जाने क्या सोचकर बाहर बरामदे में खेलती बेटी को दौड़ कर मैंने सीने से लगा लिया,आखिर कर मेरी आँखों से भी अश्रू की धारा बह ही निकली जिसे मेरी गोद में नन्हीं कोमल किसी मेमने सी दुबकी हुई मेरी बेटी बड़ी ही मासूमियत से अपनी नन्हीं नन्हीं हथेलियों से बिना कुछ समझे पोछे जा रही थी और दूर दरवाजे पर खड़ी मेरी पत्नी नम आंखों से कभी मुझे तो कभी बाबूजी को देख रही थी शायद उसने भी दरवाजे के ओंट से "अंतिम विदाई" की बातें सुन ली थी.!!
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