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दहेज से तौबा

 "विनय बहुत ही अच्छा लड़का है, अच्छी नौकरी है, उनके पिता घनश्याम प्रसाद जी का भी काफी रुतबा है, मुझे तो अपनी अर्पिता के लिए ये रिश्ता बहुत सही लग रहा है" केशव दास जी  अपनी धर्मपत्नी जानकी देवी के साथ बैठ कर अपनी बिटिया अर्पिता की शादी की चर्चा कर रहे थे। उनकी बेटी अर्पिता एक अच्छी नौकरी पर और अच्छी तनख्वा पर पदस्थ है। वैसे रिश्ता अर्पिता के लिए खुद लड़के वालों की तरफ से आया था, घनश्याम प्रसाद जी को ऐसी बहु चाहिए जो उनके बेटे विनय के साथ कदम से कदम मिला कर चले। अर्पिता के गुण, व्यवहार, संस्कार और शायद नौकरी देख के ही उन्होंने उसे अपने विनय के लिए चुना था। विनय भी उच्च पद पर पदस्थ था, स्वभाव से भी सीधा व सरल था। इसीलिए केशव दास जी को भी विनय भा गया। वैसे तो अर्पिता को विनय पसंद था, पर उसके पिता द्वारा की गई दहेज की मांग उसे अच्छी नही लगी। विनय अपने पिता की तरह धन प्रेमी नही था लेकिन वह अपने पिता के आदेश का विरोध भी नही कर सकता था। घनश्याम प्रसाद जी ने बड़ी भारी डिमांड रखी थी दहेज की, इकलौती बेटी थी अर्पिता इसलिए दहेज की उम्मीद ज्यादा ही लगा बैठे थे।  केशव जी इतना अच्छा रिश्ता हाथ से जाने नही देना चाहते थे इस लिए इस समस्या का हल निकालने की कोशिश कर रहे थे।

जानकी देवी ने भी कहा कि अर्पिता इतना कमाती है शादी के बाद तो उसकी तनख्वा उन्ही की तो होगी और उनके पास धन- दौलत की भी कमी नही है फिर क्यों दहेज के लोभ दिखा रहे है?

केशवदास जी ने समझाया -"आदमी चाहे जितना भी धन-दौलत से सम्पन्न रहे वो और अधिक पैसो का भूखा होता है, और आज कल तो दहेज लेना परंपरा हो गई है, लड़के वाले इसी दिन के लिए तो अपने बेटे को पढ़ाते लिखाते है। जितनी ज्यादा पढ़ाई लिखाई और अच्छी नौकरी उतनी ज्यादा दहेज की मांग। खैर अब क्या कर सकते है पैसो का इंतज़ाम तो करना ही पड़ेगा ना।" दोनो पति-पत्नी दिन रात दहेज के पैसों के इंतेज़ाम के बारे में ही सोचते रहते। गहने, जमीन बेच कर भी दहेज की रकम पूरी नही हो पायेगी, घर बेचेंगे तो रहेंगे कहा? चलो मान लो किराए से भी घर ले लिए तो हर महीने का किराया कहा से लाएंगे, पेंशन से खाने पीने का खर्चा तो निकल आता था दवाई-दारू की भी व्यवस्था हो जाती थी पर कुछ जमा-पूंजी भी तो रखना था भविष्य के लिए, शादी के बाद अर्पिता की सैलरी भी पूरी की पूरी ससुराल वालों की हो जाएगी। सोच-विचार करते-करते दिन निकलते गया। अर्पिता से दोनों की हालत छुपी नही थी, वो अपने रहते माँ-बाप को दुखी नही देख सकती थी। आखिर आज वो जो है उनकी वजह से ही तो है।

अगले दिन ऑफिस से आ कर अर्पिता ने अपने पिता के हाथ मे पैसे रख कर कहा-"पापा आपको मुझ पर भरोसा है ना कि मैं कभी कुछ गलत नही करुँगी, आप प्लीज ये पैसे बिना कुछ पूछे रख लीजिए।" इतने सारे पैसे देख कर केशवदास और जानकी देवी को बहुत आश्चर्य हुआ पर बेटी ने कुछ भी बताने से इंकार कर दिया था।

शादी का दिन भी आ गया, घनश्याम प्रसाद जी आज फुले नही समा रहे थे, आज तो जैसे माता लक्ष्मी की कृपा हुई है उन पर। शादी ब्याह धूम-धाम से सम्पन्न हो गया। अर्पिता और विनय भी कुछ दिनों बाद अपनी-अपनी नौकरी में लौट गए।

सैलरी वाले दिन घनश्याम दास जी ने देखा कि अर्पिता की जितनी सैलरी बताई गई थी ये सैलरी तो उसकी आधी भी नही है। दो-तीन महीने कुछ ना बोले लेकिन जब देखे की ऐसा ही चलता रहा तब एक दिन अर्पिता से उन्होंने पूछ ही लिया-"बहु तुम्हारे पिताजी ने तुम्हारी सैलरी जितनी बताई थी ये तो उसकी आधी भी नही है, ऐसा क्यों???"

अर्पिता ने शांति से जवाब दिया-"पिता जी मेरे पापा ने हर संभव कोशिश की दहेज के रुपयों का इंतज़ाम करने की पर पैसो की व्यवस्था नही हो पाई, इसलिए मैंने लोन पर अपने ऑफिस से पैसे उठाये है जो की मेरी सैलरी से कट रहे है और तब तक कटेंगे जब तक लोन की रकम पूरी नही हो जाती।"

घनश्याम दास जी की काटो तो खून नही ऐसी स्तिथि बन गई थी, कुछ बोलते भी नही बन रहा था... आखिर क्या बोलते, दहेज तो उन्होंने ही मांगा था ना। हाथ जोड़ कर बोले-"बेटा मुझे माफ़ कर दो मैं ही अंधा हो गया था पैसों के लालच में आज से मैं दहेज से तौबा करता हूं, ये लो चेक और जितने पैसों का लोन लिया था जमा कर दो...."


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