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हिम्मत

 "ना देखो ना, मैंने भाभी से कहा था कि आज खाने में छोले-कुलचे बनाना। लेकिन भाभी ने सीधे मुंह जवाब दे दिया कि दीदी, रोज-रोज ऑयली खाना खाना सेहत के लिए ठीक नहीं है, आज खाने में कुछ हल्का बना लेते हैं।"

"भाभी तो आप सबके सामने जवाब देने लगी हैं।"
अंजलि ने अपनी भाभी राखी की शिकायत करते हुए कहा।

तभी अंजलि की मां विमला जी ने बौखलाते हुए बहू राखी को आवाज़ लगाई,
"राखी!… और राखी!"
राखी सासु मां की आवाज़ सुनते ही बाहर आई,
"क्या हुआ मांजी?"
राखी ने पूछा।

"तू अपने आप को समझती क्या है? तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरी बेटी को सीधे मुंह जवाब देने की? अब तू हमें सिखाएगी कि हमें क्या खाना चाहिए, क्या नहीं? तू इस घर की सिर्फ बहू है और तेरा काम है हम सबकी फरमाइश को पूरा करना, ना कि हमें ये बताना कि हमारे लिए क्या सही है, क्या नहीं,"
राखी को डांटते हुए कहा।

राखी ने भी हिम्मत दिखाते हुए जवाब दिया,
"आखिर मैंने दीदी से ऐसा क्या कह दिया मांजी, जो आप मुझे सुबह-सुबह प्रवचन सुना रही हैं? मैंने दीदी से कोई गलत बात तो नहीं कही। रोज-रोज ऑयली खाना खाना हम सबकी सेहत के लिए हानिकारक है, कभी-कभी तो समझ आता है, लेकिन दीदी को तो रोज ही कभी मटर-पनीर, कभी पुलाव, कभी छोले-कुलचे, और पता नहीं क्या-क्या खाना होता है।"

"तो क्या हुआ, मेरी बेटी है, सब खाती है। यहां उसका मायका है, उसका हक है यहां आकर अपनी इच्छाओं को पूरा करना। ससुराल में तो बेचारी अपनी इच्छा को दबा जाती है, इसलिए तुम्हारा फर्ज बनता है कि तुम अपनी ननद की इच्छाओं का ख्याल रखो, समझी?"
सासु जी ने रौब से कहा।

"वाह मांजी, क्या बात कही आपने! अंजलि दीदी महीने में 15 दिन तो यहां रहती हैं, ससुराल में टिकती ही कितनी हैं। टिकेंगी भी कैसे, क्योंकि आप जो हैं दीदी का पक्ष लेने के लिए! दीदी ने तो अपने ससुराल वालों के नाक में दम कर रखा है, तो बस उसी बात का दीदी फायदा उठाती हैं। कभी ऐसा ना हो कि दीदी की आदतें कभी खुद को ही भारी पड़ जाएं। क्योंकि जब भी अंजलि दीदी की ननद या उनके कोई रिश्तेदार कुछ दिन के लिए रुकने आते हैं, तो वो झट से यहां आ जाती हैं ताकि ननदों के नखरे न झेलने पड़े। क्या अंजलि दीदी की ननद की इच्छा नहीं होती कि वो भी अपनी भाभी के हाथ का बना खाना खाए? जैसे आपकी बेटी का मायका है, तो उनका भी तो मायका है ना! फिर दीदी अपनी ननदों के प्रति अपनी जिम्मेदारी क्यों नहीं निभाती हैं? और मांजी, मैं भी चाहती तो दीदी के आते ही अपने मायके चली जाती, और तब तक नहीं आती जब तक दीदी न चली जाए, लेकिन मुझे अपनी जिम्मेदारी निभाना आता है, ना कि जिम्मेदारी से भागना। दीदी को ये सोचना-समझना चाहिए, बल्कि यहां आकर दीदी मेरे ऊपर हुक्म चलाती हैं।"

राखी की बातें सुनकर विमला जी के तन-बदन में आग लग गई थी। उन्होंने राखी को सुनाते हुए कहा,
"बहुत बोल रही है, जरा अपने शब्दों को विराम दे, यह घर मेरा है, मेरी बेटी का है। तू बस पराई है, और मेरी बेटी को मत सिखा कि उसकी अपने ससुराल के प्रति क्या जिम्मेदारी है।"

सास विमला ने कहा,
"ठीक है मांजी, अगर आपको मेरी बातें बुरी लगी हैं, तो मैं आपसे और दीदी से क्षमा मांगती हूं, क्योंकि सच हमेशा कड़वा होता है। जब से दीदी की शादी हुई है, तभी से ही मैं दीदी का यह रवैया देख रही हूं और जो दीदी ने बोला, हमेशा उनकी फरमाइश पूरी भी की है। कभी मैंने दीदी को भला-बुरा नहीं कहा, बल्कि सम्मान ही दिया है। लेकिन कल जब पुष्पेंद्र जीजू का फोन आया, तब उन्होंने बताया कि अंजलि दीदी अपनी जिम्मेदारियों के प्रति समर्पित नहीं हैं, ऐसा ना हो कभी अंजलि दीदी को हमेशा के लिए अपने घर बैठना पड़ जाए। पुष्पेंद्र जीजू की ये बात सुनकर मैं बहुत डर गई थी, इसलिए आज हिम्मत करके अपनी बात बोल पाई हूं। मांजी, जानती हूं यहां अंजलि दीदी का मायका है, लेकिन अंजलि दीदी का ससुराल वालों के प्रति तो फर्ज बनता है कि वह अपनी गृहस्थी संभालें, घर आए मेहमानों का आदर-सम्मान करें, और आपसी रिश्तों को प्रेम से मजबूत बनाएं।"

अपनी भाभी राखी की बात सुनकर अंजलि को अपनी गलती का एहसास हो गया था। उसने अपनी भाभी से कहा,
"भाभी, आप सही कह रही हो, मैं सदा ही अपनी जिम्मेदारियों से भागती रही हूं। कभी भी अपनी ननदों का आदर-सत्कार नहीं किया, बल्कि यहां आकर आप पर हुक्म चलाती रही। मैं भाभी और बहू होने का कौन सा फर्ज निभा रही हूं! शायद इसी वजह से ससुराल वालों से मेरा रिश्ता मजबूत नहीं बन पाया। मुझे माफ कर दो भाभी, आपने मेरी आंखें खोल दीं। मैं अब हमेशा अपनी जिम्मेदारियों को दिल से निभाऊंगी।"
अंजलि ने राखी के गले लगते हुए कहा।

"मुझे भी माफ कर दो बहू, मैंने तुम्हें कितना भला-बुरा कहा,"
विमला जी ने हाथ जोड़ते हुए कहा।

"ये क्या मांजी! अगर आप साथ नहीं देतीं तो मैं यहां सब कैसे कर पाती,"
राखी ने कहा।

सास-बहू की बातें सुनकर अंजलि ने आश्चर्यचकित होकर पूछा,
"ये सब क्या है, मतलब?"

"मतलब ये कि जब सीधी उंगली से घी नहीं निकले तो उंगली टेढ़ी करनी पड़ती है। ससुराल के प्रति तुम्हें अपनी जिम्मेदारियों का एहसास करवाने के लिए हम सास-बहू ने ये खेल रचा था। अगर मैं तुमसे सीधी मुंह कहती कि बिटिया, तू रोज-रोज यहां मत आया कर, तो शायद तुझे बुरा लगता कि मांजी भी ऐसा बोलने लगी हैं। देख बिटिया, शादी हो जाने के बाद जिम्मेदारियों से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। अब तुझे अपनी जिम्मेदारियों का एहसास हो गया, मेरे लिए इतना ही काफी है।"

अंजलि ने अपनी मांजी और भाभी को धन्यवाद दिया और अपने ससुराल जाकर अपनी जिम्मेदारियों को पूरे दिल से निभाने लगी।


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