"ये क्या बहू तुम बिना सिर पर पल्ला रखे बाहर से आ रही हो.मोहल्ले वाले देखेगे तो क्या बोलेगे.हमारी इज्ज़त का बिलकुल भी ख्याल नही है तुम्हें.हमारे खानदान में बहूएं बिना घूंघट बाहर नही निकलती.हमने तो तुम्हें सिर्फ सिर पर पल्ला रखने को बोला था वो भी तुमसे नही किया जाता."नीला के बाहर से आते ही सासूमाँ कविता जी ने तानों की बौछार करने लगी.
नीला की शादी सालभर पहले तरूण से हुई थी.उसके ससुराल में सास ससुर दो देवर और पति तरुण थे.ससुराल में नीला के लिए बहू वाले सारे नियम कायदे लागू थे. सुबह जल्दी उठना,रात को सारा काम निपटा कर सोना,सास,ससुर की आवाज पर दौड़े आना,देवरों की खाने पीने की फरमाईशें बिना देर किये पूरी करना.नीला ससुराल में सामंजस्य बैठानी की पूरी कोशिश करती.लेकिन उससे जरा सी भी गलती हो जाती तो कविता जी बातें सुनाने लगती.उस समय वो गुस्से में नीला को कुछ भी कह देती.नीला अपने संस्कारों की वजह से चुप रहती और हमेशा कोशिश करती कि सासूमाँ को शिकायत का मौका न दे.
नीला के मम्मी पापा की शादी की सालगिरह थी.इसलिए नीला सासूमाँ से कुछ दिन रहने की इजाजत ले कर मायके आई थी.बहुत दिनों बाद नीला ने खुली हवा में सासं ली थी.मायके आ कर उसकी बहू की बेड़ियां टूट कर बेटी की पायल की रुनझुन में बदल जाती थी.
कुछ दिनों बाद तरूण नीला को लेने गया. उस वक्त नीला मार्केट गई थी.तरुण नीला का इन्तजार करने लगा.इतने में कविता जी का फोन आया.
"तरुण कितनी देर में घर पहुंचोगे."
"वो मम्मी नीला मार्केट गई है थोड़ी देर में आती होगी.फिर आते है."
इतना सुनना था कि कविता जी ने तरुण को न जाने क्या क्या बोला कि उसके चेहरे पर गुस्सा और नाराजगी झलकने लगी.
नीला के घर आते ही तरूण उसे भला बुरा कहने लगा जब नीला के मम्मी पापा ने उसे समझाना चाह तो गुस्से में उसने उनको भी बहुत सुना दिया.तरूण को अपने मम्मी पापा का अपमान करते देख नीला के आंसू बहने लगे.वो तरुण को कुछ कहना चाह रही थी लेकिन नीला की मम्मी ने उसे चुप रहने का इशारा किया.मजबूरी में नीला चुपचाप सब सुनती रही.
पूरे रास्ते दोनों ने आपस में बात नही की.
घर में कदम रखते ही कविता जी ने नीला को फटकार शुरू कर दिया."तुम्हें कहा था कि तरुण लेने आ रहा है फिर तुम मार्केट क्यों गई.क्या मायके जा कर तुम अपनी मनमानी करने लगोगी. तुम्हारी माँ ने सिखाया नही कि बहू को कैसे रहना चाहिए."
नीला पहले ही तरुण के व्यवहार के कारण दुखी थी.आते ही सास के ताने सुन कर उसका सब्र का बांध टूट गया.
"मम्मी जी मैं आप लोगो के लिए ही गिफ्ट लेने गई थी.मार्केट में भीड़ थी इसलिए आने में देर हो गई और मेरी माँ ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है इसलिए मैं आज तक चुप थी लेकिन आप ने अपने बेटे को कुछ नही सिखाया.मुझे लगता है कि कुछ चीजे आपको अपने बेटे को भी सिखानी चाहिए थी. क्योंकि संस्कारों की जरूरत बहू को ही नही बेटे को भी होती है.बहू बनते ही लड़की के पांव में सस्कारों, रिवाजो, शर्म हया की न जाने कितनी बेड़ियां पहना दी जाती है. लेकिन बेटा शादी के बाद भी वैसा ही रहता है वो भी किसी का पति, किसी का दामाद ,किसी का जीजा बनता है पर उसके लिए कोई नियम नही.बहू को मुंह खोलने की मनाही है लेकिन दामाद अपने सास ससुर को कुछ भी बोल सकता है.
मैं आप का पूरा सम्मान करती हूँ और आगे भी करती रहूँगी लेकिन अब में बेडियों में नही बंधूगी.मेरी अपनी इच्छाएं और ख्वाहिश है.जिनको बहू होने के नाते मुझसे छीन लिया गया है पर अब मैं आजादी से रहना चाहती हूँ खुल कर सासं लेना चाहती हूँ.इस घर के दकियानूसी रिवाजों को तोडंना चाहती हूँ ताकि आगे आने वाली बहुएं इस घर में खुल कर सासं ले सके. अपने को बेचारी बना कर मैं खुद को अपनी और उनकी नजरों में नही गिराना चाहती."
कविता जी और तरुण नीला को हैरानी से देखते रहे.नीला ऐसे जवाब देगी उन्हें उम्मीद नही थी.दोनों ने चुप रहना ही उचित समझा. शायद ऐसी गलती वो फिर कभी नही करेगें.
शशि ध्यानी
दिल्ली
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