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पत्नी

 तुम जल्दी से खाना बना दो।

आज कपड़े क्यों नहीं धोये?

तुम इतना-सा काम भी नहीं कर सकती हो।

इस तरह के सवाल लगभग सभी पति अपनी-अपनी पत्नियों से किये बिना नहीं रह सकते हैं और वे इन सबका पालन करती हैं। न चाहकर भी इनको ऐसे कई काम करने ही पड़ते हैं। इन सब कामों के प्रति इनका मन हो या न हो और किसी कारण से अक्षम हो। फिर भी ऐसा कोई नहीं, जो इनके कार्य में अपना हाथ बँटाये।

वह पास आकर कहती है, आपके लिए भोजन तैयार है। आज मेरा सिर बहुत दर्द कर रहा है। इसलिए आप स्वयं खाना खा लीजिए। तो पति का सिर चक्कर खाने लगता है, तुम्हारा सिर दर्द करने लगा है। यूं क्यों न कह देती है कि मैं अपना हाथ नहीं लगाना चाहती हूँ।

उसका सिर कब का दर्द के मारे फट्टा जा रहा था?परन्तु यह उसका दूसरी स्त्रियों की तरह प्रण है कि कुछ भी हो। चाहे सिर फट जाये या तेज बुखार आये। लेकिन खाना तो बनाना ही है। कौन है जो उसकी बात पर यकीन कर कहे कि तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं थी, तो रहने दो?

इसके विपरीत केवल यही सुनने को मिलता है कि यह रोज-रोज की बकवास है। जो कामचोर होते हैं, तो यही सबसे बड़ा बहाना ढूंढ लेते हैं।

वह पूरे दिन इस इन्तजार में थी कि वो जल्दी आ जाये, तो अच्छा होगा। जल्दी से अस्पताल जायेंगे। लेकिन उन्होंने तो आते ही झगड़ा करना शुरू कर दिया था। फिर यह कौन पूछे कि चलो कुछ दवा ले लो, कुछ आराम होगा। फिर हम खाना खाकर अस्पताल चलेंगे।

पति को गुस्से में देखकर वह सहम जाती है। बिना कुछ कहे चुपचाप अपने कमरे में चली जाती है। ऐसा लगता है कि अब एक कदम भी चला नहीं जा सकता है और ना ही खड़ा रहना संभव है।

गुस्से का भी अपना कुछ निश्चित समय होता है। इसके बाद खुद को ही इसका पश्चाताप भी होने लगता है। तो थोड़ी देर बाद पति का भी गुस्सा खत्म हो गया और दूसरे कमरे की तरफ देखा, तो वह बुखार से बेहाल होकर नीचे फर्श पर लेटी हुई थी। अब उसे यह महसूस होने लगा कि मुझे इसकी बात भी थोड़ी सुन लेनी चाहिए थी। वह कुछ भी कह नहीं पाया था, बस, अबोध बच्चे की तरह मूक बन खड़ा था। उसने मुँह दूसरी ओर होने पर भी महसूस कर लिया था कि वह अब पश्चाताप की अग्नि में जल रहे हैं। अब बहुत देर भी हो गयी है, अस्पताल भी बन्द हो गया होगा। यदि ये खुशी से मुझे ले जाना चाहेंगे, तो कल सुबह चले जायेंगे। रात वैसे भी कितनी बड़ी होती है?

उसने भी शायद यह सोच लिया था। जब तक पत्नी कुछ बात करेगी नहीं, तब तक मैं जगह से हिलूँगा नहीं। और उधर थी अर्द्धांग्नी। बिना कहे-सुने भी सब कुछ समझ गयी और बोली- अब सिर थोड़ा कम दर्द कर रहा है। अगर कोई और काम नहीं हो, तो कल सुबह चलेंगे। पर सच कह रही हूँ। पूरे दिन सिर फटा जा रहा था। और आप आते ही,

कहते-कहते वह रो पड़ी थी। पति का मन किया कि इसे सीने से लगा लूँ और कह दूँ कि अभी चलो अस्पताल। ज्यादा कुछ देर नहीं हुई है। पर अब इतना कह पाने की भी हिम्मत ना बची थी।

कुछ देर दोनों मौन रहे थे। फिर उसका इशारा पाकर वह अपने बिस्तर पर चला गया। थोड़ी देर बाद उसे लगा था कि उसे नींद आ गयी थी। पर उसे खुद को नींद नहीं आ रही थी। बहुत देर हो गयी थी बिस्तर पर लेटे हुए। उसे याद आने लगा था कि पत्नी पति या बच्चे के थोड़ा कुछ अस्वस्थ होने पर भी खुद अपने आप को भूलकर दौड़-धूप करने लगती है और जब कभी इसे कुछ हो जाता है, तो किसी को इसकी बात सुनने तक की फुर्सत नहीं होती है। यह सब पर जान लुटाती है और सब इसकी जान तक की भी परवाह नहीं करते हैं।


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