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पूंजी

 पता नहीं क्या कहूं, मन बड़ा खिन्न हो गया है। भगवान से यही प्रार्थना कर रही हूं कि मम्मी जल्दी ठीक हो जाएं। मगर मन तो मम्मी पर ही लगा है। जरूर ध्यान से चलती नहीं होंगी, तभी तो सीढ़ियों से गिर गईं। बेचारी मेरी मम्मी... मम्मी की हालत को याद करते ही आंसू निकलने लगे। कितनी बार तो कहा था कि आ जाओ मेरे पास, मगर मम्मी भी कम जिद्दी नहीं हैं। अरे, जमाना बदल गया है, अब माता-पिता भी अपने दामाद के साथ रह सकते हैं। ऊपर से आपको तो हीरा जैसा दामाद मिला है।

अचानक ही फोन घनघनाया, मां का फोन था।
"हेलो मां, प्रणाम।"
लेकिन मां के आशीर्वाद में ही उनका सारा दर्द छलक गया।
"क्या हुआ?" मैं चिंतित हो गई।
"गिर गई... कमर में दर्द हो रहा है क्या?"
"तुमसे कल कहा था ना कि रेस्ट करो, बिना बात ज्यादा इधर-उधर मत चलो। बहुत दर्द हो रहा है क्या?"
"हां, बहुत।"
"राकेश भैया को बताया?"
"आज राकेश के ऑफिस जाने के बाद गिरी और भाभी को..." मां फिर चुप हो गई। बेटी भी चुप हो गई। कुछ बातों के जवाब चुप्पी में ज्यादा पारदर्शी और मुखर हो जाते हैं।
"अच्छा, तुम सीधी लेटी रहो, मैं कुछ करती हूं," कहकर बेटी ने फोन रख दिया।

पल भर बाद उसने भाई को ऑफिस फोन किया।
"हेलो भैया, मां गिर गई।"
"हां, मुझे मालूम है।"
"नहीं, आज सुबह आपके ऑफिस जाने के बाद फिर गिर गई।"
"ओह..." भाई के स्वर में चिंता के बजाय एक खिन्नता थी।
"अब मैं तो 7 बजे से पहले ऑफिस से नहीं निकल पाऊंगा।"
भाभी का जिक्र दोनों ही नहीं कर रहे थे। भाभी सदस्य थीं घर की, पर उनकी उपयोगिता परिवार के लिए कितनी है, यह वे खुद तय करती थीं।
"मैं नहीं निकल पाऊंगी भैया, इनकी हालत आप जानते ही हो।"
राकेश भी इस बात को जानता था।
"ठीक है, मैं कोशिश करता हूं, एक्सरे करवाना पड़ेगा, कहीं फैक्चर ना हो गया हो।"
मोबाइल बंद कर राशि बैठी ही रह गई। मन गुस्से और क्षोभ से भर रहा था। कौन कहता है मां को कि जबरदस्ती इधर-उधर चलती रहें? घर में सारी सुविधाएं हैं, काम करने वाली हैं। भाभी की तटस्थता को छोड़ दें, तो किसी बात की कमी नहीं है। लेकिन कमी तो है।

पापा को गए भी दो साल ही हुए हैं। पति के जाने के बाद तन, मन, दिल-दिमाग और अपने कमरे में शून्यता का पत्थर जम जाना उन्हें कमजोर कर रहा है। बिस्तर पर बगल में बैठे या लेटे पति की बूढ़ी और रुग्ण काया भी उन्हें सुरक्षा का एहसास दिलाती थी। घर में उनके अधिकारों के प्रति आश्वस्त करती थी।
बेटे-बहू उनके साथ रह रहे हैं, वे बेटे-बहू के साथ नहीं। खामोशी से यह जतला देती थी। खाना तो तब भी मेड ही बनाती थी, काम तब भी नौकर ही करते थे, लेकिन अंदर से लेकर बाहर तक फैला उनका एकछत्र अधिकार उन्हें कई बातों से बचाता था।
पति के जाते ही घर का भूगोल बदल गया, साथ ही शोलवी और उस शोल में समाहित उनका व्यक्तित्व भी।

"बहू, नमक और गरम मसाले के डिब्बे कहां गए?"
पापा के जाने के बाद, उस दिन वह किचन में कुछ बना रही थी। निगाह उठाकर देखा तो किचन का पूरा नक्शा ही बदल गया था।
"इधर रखे हैं," बहू डिब्बी दिखाती हुई बोली।
मां के चेहरे की तरफ देखा, कई परतों की सीवन हल्की सी उधड़ गई थी।
ऐसा नहीं है कि इस परिवर्तन से कोई गिला है—उसे या मां को। पर यह घर पहले भी तो भाभी का था। कई बार यह जताने का, बताने का प्रयत्न सबकी तरफ से किया गया, पर उन्होंने इसे कभी अपना समझा ही नहीं।
ऑफिस से आकर अपनी चाय बनाई और अपने कमरे में बंद हो गईं। कई बार मां, पापा और भाभी की चाय एक साथ गैस के अलग-अलग चूल्हों पर बनती थी।
मेड खाना बनाती तो घर के तीन सदस्यों का—भाभी अपना पका खाकर आठ बजे ही ऊपर अपने कमरे में समा जातीं।
कैसे कोई इंसान सबके बीच रहकर इतना अलग-थलग रह सकता है!
भाभी की बातें सुनकर उसे आश्चर्य होता—कैसे वे घर की किसी भी समस्या से इतनी अलग रह पाती हैं। वह अक्सर यह सवाल खुद से पूछती, लेकिन जवाब ना मिलता।
भाभी को अपनी नौकरी, अपने बच्चों और अपने मायके से मतलब था।
"बहू तुम्हारी है, मां, उससे खुशी मिले या ग़म तुम्हें ही सहना है। फिर तुम्हारे बेटे की ज़िंदगी है, जो शब्द तुम अपनी बहू के लिए बोलोगी, वह सास होने के नाते ब्रह्मवाक्य बन जाएंगे। मैं जानती हूं, अच्छा नहीं बोला जाएगा, पर बुरा बोलकर अपना तमाशा मत बनाना कभी भी।"
मां ने उसकी बात गांठ बांध ली। "तेरे पापा के जाने के बाद, तेरी माई तक कितनी मीठी बात करती रही सबके सामने..." चाय पीते हुए उस दिन मां के मन की किसी परत की सीवन फिर उधड़ गई थी।

"तुम ध्यान मत दिया करो मां, वह तो पहले भी ऐसी ही थी। घर तुम्हारा है, बेटा तुम्हारा ध्यान रखता है। मैं भी आती रहती हूं। रुपए-पैसे का इंतजाम पापा तुम्हारे लिए काफी कर गए हैं। इसलिए कमी के बजाय चार खूबियों में मन लगाया करो।"
बेटी ने उधड़ी परत की फिर मरम्मत कर दी।

पर पापा के जाने के बाद तेरहवीं तक के दृश्य उसके सामने भी साकार हो उठे। भाभी की तटस्थता ने उसका दिल भी न जाने कितनी बार तोड़ा था। राकेश भैया के सामने यह सार्वजनिक रूप से उनका व्यवहार बदल जाता, लेकिन अकेले में किसी का तिरस्कार करने के लिए उन्हें शब्दों की भी जरूरत कब पड़ती थी!
शब्द तो वे अपनी आंखों और तटस्थ मुख मुद्रा से ही कर देतीं। प्रणाम भी ऐसे लेतीं जैसे चाबुक मार रही हों। वह सहम सी जाती।
पापा के जाने के बाद भाभी का मां पर बिखरता-छलकता प्यार देखकर पूरी रिशेदारी प्रभावित हो गई। सभी की जुबान पर बस एक ही वाक्य था—"बहू हो तो ऐसी! कैसे संभाल लिया सब कुछ?"
वह खुद अंदर तक पिघल गई थी। साथ ही निश्चिंत हो गई—चलो, मां का बुढ़ापा चैन से कट जाएगा।
लेकिन तेरहवीं खत्म होते ही मीठी मुस्कान, मीठी बातें सब ऐसे गायब हो गईं, जैसे कभी थीं ही नहीं।

एक दिन वह मां को मिलने गई थी। जब घर लौटने को हुई, बाहर बूंदाबांदी शुरू हो गई। टेबल पर लंच लग रहा था।
भैया बोले, "राशि, खाना खाकर जाओ। वैसे भी बाहर बारिश शुरू हो गई है।"
भाभी के शब्द उसके कानों में पिघले शीशे की तरह उतर गए, "ऐसी भी बारिश नहीं हो रही है। जब तक तेज होगी, तब तक घर पहुंच जाओगी।"
"नहीं भैया, चलती हूं," कहकर वह घर से बाहर निकल गई। लेकिन आंखें छलकने को व्याकुल हो गईं।
उसे अपनी चिंता नहीं थी, पर मां का बुढ़ापा एकाएक आंखों के सामने तैर गया।
राकेश भैया का एक बेटे का स्वाभिमान मां को उसके पास रहने नहीं देगा, और भाभी की चालाकियों के साथ मां कैसे जी पाएंगी? जिनकी बातों को नकारना मुश्किल हो जाता है, लेकिन फांस की तरह अंदर तक धंस जाती हैं।

पैसों की कमी नहीं थी मां को, पर बुढ़ापा अगर पैसों के साथ बीत पाता तो शानदार फ्लैट्स में बंद बुजुर्गों की लाशें नहीं मिलतीं, बड़े घरों में नौकर बुजुर्गों की हत्या नहीं करते, फाइव स्टार वृद्धा आश्रम ना खुलते।
दो-चार कद्दू और लौकी किसी को देने में ही हल्ला मचा देती हैं। वर्षों सब्जियां बांटी हैं—"मेरा घर नहीं है क्या?"
मां फिर उधड़ गई। पढ़ी-लिखी भाभी की निम्न स्तर की सोच पर वह मन ही मन ऐसे शर्मिंदा हो गई जैसे यह उसकी खुद की सोच हो।
लेकिन मां को और उधेड़ना उसे उचित नहीं लगा, इसलिए बात टाल दी।
"कोई बात नहीं मां, तुम्हें जब बांटनी थी खूब बाटी, कौन नहीं जानता इस बात को?"

लेकिन जब बाद में घर की स्थाई तौर पर रहने वाली मेड से पूछा, तो उसने बताया, "माताजी ने किचन गार्डन से थोड़ी सी कद्दू और लौकी निकलवाई थी, भाभी खूब गुस्सा हुई थीं। किसके लिए निकलवाई थी? अपने छोटे भाई के लिए, राजू मामा आए थे मिलने।"
दिल खराब हो गया—राशि का मां इस सब की मालकिन है भी? भाभी की सोच छोटी सही, पर इस छोटी सी बात को भैया से कहकर कलह कौन करना चाहेगा?
और भाभी की यह कारगुजारियां-चालाकियां जो मां के लिए बेहद अपमानजनक व मानसिक तौर पर पीड़ादायक होती हैं, कभी भैया के सामने नहीं आ पाती हैं।
लेकिन सार्वजनिक रूप से भाभी का व्यवहार जब इस कदर बदल जाता है, तो भैया से वे क्या कुछ नहीं कहती होंगी।

एक बार भैया को अपनी नौकरी से विदेश जाने की संभावना बन रही थी, तो चाचा जी बोले थे, "बहुत बढ़िया मौका है राकेश, पर भाभी को तो अपनी जॉब छोड़नी पड़ेगी।"
"मैं कहां जा पाऊंगी चाचा जी, बुजुर्गों की जिम्मेदारी है मेरे ऊपर," भाभी तुरंत बोली थीं, जबकि सच तो यह था कि वह अपनी जॉब नहीं छोड़ना चाहती थीं।
वह मंथन करती हुई भाभी का चेहरा देखती रह गई थी।
पापा की जिंदगी तक एक सुरक्षात्मक छत मां के ऊपर थी, जो अब उड़ गई थी, और भाभी का मुंह खुल गया था।
शांतिप्रिय भैया कभी मां का पक्ष लेकर बीवी को समझाते, तो कभी बीवी का पक्ष लेकर मां को।
भाभी को मां के लिए एक कप चाय बनाने में भी कष्ट है। एक पैसा भी मां पर उनका खर्च नहीं होता है, फिर भी वे मां की उपस्थिति बर्दाश्त नहीं कर पाती हैं।
लेकिन पापा की करोड़ों की प्रॉपर्टी से उन्हें कोई परहेज नहीं है।

शाम को राकेश भैया मां का एक्सरे करवा लाए। फैक्चर नहीं था, मांसपेशियों की चोट थी। जानकर भैया और उसे दोनों को चैन मिला। उसने मां को फोन करके लेटे रहकर आराम करने की सलाह दी।
भले ही पूरे परिवार में मां एकदम अकेली हो गई थी। मां का उसके पास ज्यादा रहना भैया को गवारा नहीं होता क्योंकि यह बात उनकी सामाजिक छवि खराब करती है।
लोग या रिश्तेदार क्या कहेंगे कि बेटे-बहू के पास मन नहीं लगता, इसलिए बेटी के पास ज्यादा रहती हैं।
मां भी इस बात से मन ही मन आतंकित रहती हैं कि कहीं बेटा बुरा ना मान जाए।
फलस्वरूप मां बेहद अकेली हो जाती हैं।
मां की मन:स्थिति बेटी अच्छी तरह जानती है, लेकिन चाहकर भी वह कुछ बोल नहीं पाती।

अगले दिन रविवार को राशि मां को देखने चली गई। मां अपने कमरे में आंखें मुंदे अकेली लेटी थी। वह मां के पास बैठी, तो मां ने आंखें खोल दीं।
"अरे, तू कब आई?"
मां की उदास, अकेली, सुनी सी आंखों में असंख्य दीप जल उठे थे। वे उठने का उपक्रम करने लगीं।
"मां, तुम लेटी रहो। आज भैया-भाभी घर पर हैं क्या?"
"नहीं, दोनों गांव गए हैं। सुबह निकल गए थे, परसों तक आ जाएंगे।"
मां के सुर में अभी भी दर्द था।
"लेकिन तुम्हें इस हालत में किसके भरोसे छोड़ गए?" राशि आश्चर्य से बोली।
"मां, अगर बाथरूम जाते समय तुम फिर गिर जाओ तो कौन है यहां पर देखने वाला? भैया ने मुझे फोन करना भी उचित नहीं समझा?"
राशि को अंदर ही अंदर बेचैनी का उबाल सा आया।
"लेकिन गांव गए किस लिए हैं?"
इससे पहले, पिताजी ने कई बार चाहा था कि उनके बेटे-बहू कभी गांव जाकर वहां की देखरेख कर लिया करें, तब तो कभी नहीं गए।
वह आश्चर्य से बोली, "गांव में एक मकान और जमीन-जायदाद थी अभी, लेकिन दोनों में से किसी ने कभी ध्यान नहीं दिया। और आज गांव जाना इतना जरूरी हो गया कि भाभी भी चली गईं और भैया मां को इस हालत में छोड़कर चले गए।"
लेकिन खुद को गांव जाने की बात ना बताने का कारण जैसे समझ रही थी—कहीं पुरखों की संपत्ति पर ननद अपना अधिकार ना मांग बैठे।

भाभी की सोच से उसे कोई लेना-देना नहीं, पर भैया को तो उसकी नीयत पर भरोसा होना चाहिए था।
लेकिन गांव की जमीन-जायदाद में भैया का रुचि लेना तो वह समझ सकती थी, पर घर की हर खुशी और ग़म से अलग भाभी का जाना जहां उसे हैरान कर रहा था, वहीं हल्का सा सुकून भी दे रहा था।
इसलिए बोली, "चलो अच्छा है, भाभी भी गई हैं, भैया के साथ तो खड़ी होकर रहेंगी, अपनी नौकरी छोड़कर गांव में कुछ काम करना चाहती हैं।"

एकाएक मां बोलने लगीं, "गांव की महिलाओं के साथ मिलकर इसलिए सोच रही हैं कि गांव का घर ठीक करा लें और गांव के वरिष्ठ लोगों से, खासकर प्रधान से अपनी जान-पहचान अच्छी कर लें, जिससे उसे अपने काम में मदद मिल सके। रसीले फलों के लिए वहां का मौसम बहुत अच्छा है, इसलिए वहां रसीले फल बहुत तादाद में होते हैं। शायद उसी को लेकर कुछ काम करना चाह रही हैं। ऐसा क्या करने का सोच रही हैं, पता नहीं। दोनों कल रात मेरे पास आए थे। जो कुछ बता रहे थे, मैं ज्यादा समझ नहीं पाई। कह रहे थे, पापा के नाम से शुरू करेंगे, इसलिए पापा की जमा पूंजी की जरूरत पड़ेगी।"

राशि हतप्रभ रह गई।
भैया, भाभी के प्रभाव में आकर चाहे कुछ भी कर लें, पर मां की देखभाल को लेकर उसे उनकी मंशा पर जरा भी शक नहीं रहता।
पर भाभी जिस तरह से उनका कभी-कभी ब्रेनवॉश कर देती हैं, पता नहीं क्या इरादा है उनका।
अब कहीं मां की जमा पूंजी पापा के नाम पर भाभी ने मां और भैया को बहला-फुसलाकर निकलवा ली, तो भावनात्मक और मानसिक स्तर पर अकेलापन भोग रही मां कहीं आर्थिक रूप से भी अकेली ना पड़ जाएं।
भैया भले ही उनके लिए सब कुछ करेंगे, पर दबदबा भाभी का ही रहेगा।
अभी जब मां अपने दम पर रह रही हैं, तब भाभी उनसे बात तक नहीं करती हैं, मतलब नहीं रखती हैं।
फिर जब आर्थिक रूप से भैया पर निर्भर हो जाएंगी, तब का नजारा क्या होगा? सोचकर ही राशि को सिहरन सी महसूस हुई।

घर और शहर की बाकी संपत्ति भले ही अभी मां के नाम है, पर 80 साल की मां इसका उपयोग तो नहीं कर सकतीं, ना ही किसी अन्याय के प्रतिकार स्वरूप अपने बच्चों को घर से बाहर निकाल सकती हैं।
राशि जानती थी, तब मां कुछ और उधड़ेंगी—बार-बार उधड़ेंगी और उसे लगातार मरम्मत करते रहना पड़ेगा, ताकि मां की आगे की जिंदगी कुछ ठीक-ठाक निकल सके, क्योंकि कर तो वह भी कुछ नहीं पाएगी।

"मां, तुम अपना पैसा मत देना। पापा के नाम पर काम शुरू करना चाहती हैं तो वे खुद कर लें। पापा का जो कुछ भी तुम्हारे बाद बचेगा, उन्हीं का ही तो होगा। फिर अभी क्यों दे रही हो?"
उसने मां को समझाने की एक कमजोर सी कोशिश की।

मां ने एक मजबूर, खामोश सी दृष्टि उस पर डाली। वह महसूस कर गई उन खामोश निगाहों की मुखर भाषा को—क्योंकि मौन में कुछ प्रश्नों के जवाब बहुत पारदर्शी व स्पष्ट हो जाते हैं।

मां को मेरी बात कहीं न कहीं समझ आ गई। उन्होंने तुरंत भैया को फोन लगाया,
"बेटा, सुनो, जो कुछ देखना है देख लो, आखिरी फैसला तो मुझे ही करना है। जहां तक मेरा ख्याल है, तुम्हारे पापा का मान-सम्मान वैसे भी बहुत है। मुझे लगता है, यह फिजूल चीजें करने की कोई जरूरत नहीं है। जब तक मैं हूं, तब तक तुम्हें कुछ बेचने नहीं दूंगी, ना ही कोई जमा पूंजी दूंगी। अब फैसला तुम दोनों का है।"

आज मां की एकटक बातें सुनकर मुझे इस बात की तसल्ली तो हो गई कि पापा की प्रॉपर्टी आपके लिए एक मजबूत दीवार है, जिसका तो भाभी भी कुछ करने की हिम्मत नहीं कर पाएंगी। नहीं तो मैं हूं ही आपके साथ।


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