वो साधारण नहीं होती,
जो हर बात पर सिर हिलाए,
ना ही हर निर्णय में बस तुम्हारी हाँ में हाँ मिलाए।
वो झुकती है,
पर केवल प्रेम के सम्मुख,
जहाँ सम्मान हो, साझेदारी हो —
वहाँ ही वह समर्पित होती है।
वो नहीं रचती मीठे झूठ की रंगीन कथाएँ,
न चेहरे पर लगाती है मुखौटे।
जो सोचती है,
वो कह देती है — स्पष्ट, निडर, निर्भीक।
वो बहस नहीं करती केवल बोलने के लिए,
पर जब कुछ कहना होता है,
तो तर्क और तटस्थता से कहती है —
धैर्य से, पर पूरी ताकत के साथ।
उसे चाहिए नहीं रोज़ गहनों की चमक,
वो खुद को सजाती है
अपने आत्मविश्वास की आभा से,
और अपनी सहज मुस्कान से।
तुम्हारे रास्ते की गलतियाँ वो दिखाती है,
पर तुम्हारे दुःख की राह में
तुम्हारा संबल भी बनती है।
वो जानती है
कैसे घर को सम्हालना है —
पर उसके सपनों की उड़ान भी उतनी ही ऊँची होती है।
वो नहीं मानती हर वह बात
जो उसे उसकी जगह भूल जाने पर मजबूर करे।
वो सिर झुकाती है,
पर तुम्हारे प्रेम के आगे,
जहाँ कोई दिखावा नहीं,
बस समर्पण हो, सच्चाई हो।
वो दे सकती है
अपना सब कुछ,
अपने पूरे अस्तित्व को प्रेम में ढाल सकती है —
बशर्ते तुम उसे पूरी तरह स्वीकार करो।
लेकिन ध्यान रखना —
वो टूटती है झूठ से, छल से,
और सबसे अधिक —
पुरुष के झूठे अहंकार से।
और अगर एक बार टूट गई,
तो फिर वो पहले जैसी कभी नहीं हो पाती।
तो हिम्मत हो तो ही करना ऐसी स्त्री से प्रेम,
वरना बस उसके सम्मान में दूर से सर झुकाना।
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