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दुख

 "मम्मी, आपने सब जगह मेरी कितनी बेइज्जती कर रखी है, मोहल्ले में मेरी कोई इज्जत नहीं रह गई,"

अभिषेक अपनी मम्मी से लड़ाई के मूड में था।

"ऐसा क्या कर दिया मैंने? मैं तो बिस्तर से उठ भी नहीं सकती, 15 दिन पहले ही तो घुटनों का ऑपरेशन हुआ है। मैं तो चल-फिर भी नहीं सकती,"
आशा जी, अभिषेक की बात से बहुत परेशान थीं। एक तो शरीर का दुख, ऊपर से संतान का दिया मानसिक तनाव।

"आप और पापा टिफ़िन सर्विस से खाना मंगा कर खाते हो। सब यही कह रहे हैं कि कैसे बेटा-बहू हैं, मां-बाप को खाना भी नहीं दे सकते,"
अभिषेक चिल्ला रहा था।

"बेटा, मैं इस बारे में कुछ नहीं जानती। तेरे पापा ही मुझे खाना देते हैं, मुझे नहीं पता कि खाना किसने बनाया,"
आशा जी उसे शांत करती हुई बोलीं।

"बेटा, तुम्हें जो बात करनी है मुझसे करो, मैं तुम्हारी सारी बातों के जवाब दूंगा। अपनी बीमार मां को क्यों परेशान कर रहा है?"
पीछे से कमरे में आते हुए शैलेश जी ने दोनों की बात सुन ली थी।

"आपसे क्या बात करूं, आपको तो हमेशा मेरी ही गलती दिखती है,"
अभिषेक माथे पर बाल डालते हुए बोला।

"अपनी इज्जत की इतनी ही फिक्र है, तो दिखावा क्यों कर रहे हो मां को साथ रखकर? बीमार मां की सेवा करो,"
शैलेश जी ने सच्चाई पर प्रहार किया।
"अपनी मां को चार बातें सुनने बैठ जाते हो, क्योंकि तुम्हें पता है वो तुम्हारा पक्ष लेंगी, तुम्हें कभी गलत नहीं कहेंगी।"

"तो अब मैंने कौन सी गलती कर दी, जो पूरे मोहल्ले में मेरी बेइज्जती की जा रही है?"
"जो कुछ है, तुम्हारे अपने कर्म ही हैं। तुम्हारी मां का ऑपरेशन हुए 15 दिन हो गए, लेकिन तुम और बहू एक बार भी पूछने नहीं आए कि मम्मी, आपकी हालत कैसी है? इतने दिन से रिया हमारे साथ रह रही थी, उसने घर को संभाल रखा था। वह भी कितने दिन रहती, उसकी भी गृहस्थी है। उसके जाने के बाद क्या हम भूखे मरते? इसलिए उसने जाने से पहले ही टिफ़िन सर्विस सेंटर पर बात कर ली थी, जो हमें दोनों समय का टिफ़िन दे जाते हैं। तो दीदी के जाने के बाद तुम मुझसे भी कह सकते थे कि बेटा, हमारा खाना बनवा देना।"

"लेकिन हमें बेटा-बहू समझता ही कौन है? तुम्हारी लाडली तो तुम्हारी बहन है न, थोड़ा जुबान संभलकर बोलो,"
अभिषेक।

"ऑपरेशन से एक महीने पहले ही जब डॉक्टर ने ऑपरेशन की तारीख बताई थी, तुम्हारी मां ने बहुत बार तुमसे कहा कि दो महीने घर का काम कैसे होगा, खाना कैसे बनेगा, कोई कुक भी नहीं मिल रही। उस समय तुमने एक बार भी यह नहीं कहा कि मम्मी, आप चिंता मत करो, हम हैं न, सब संभाल लेंगे। तुम तो यह कहकर एक तरफ हो गए कि अभी तो बहुत समय है, कोई न कोई कुक मिल ही जाएगी। जब तुम्हारी तरफ से निराशा मिली तो रिया को बुलाया। रिया के आने पर तो तुम बिल्कुल बेफिक्र हो गए कि मम्मी का हालचाल पूछने भी नहीं आए। अरे, कौन सा तुम्हें मीलों दूर से आना था, ऊपर से उतर कर नीचे आना था, एक ही मकान के ऊपर के हिस्से में रहते हुए तुम और बहू हमारा ख्याल नहीं रख सकते, तब तो तुम्हें मोहल्ले वाले याद नहीं आए, क्योंकि सब कुछ घर के अंदर हो रहा था, किसी को कुछ पता नहीं लग रहा था। आज जब मोहल्ले वालों ने टिफ़िन आते देख लिया, तो तुम्हें अपनी इज्जत याद आ गई।"

"मां-बाप भूखे हैं या उनका पेट भरा है, तुम्हें कोई फिक्र नहीं। तुम्हें फिक्र है तो बस अपनी इज्जत की। बेटा, ये मत भूलो कि सच्चाई कभी छुपती नहीं, लोग खुद ही सब जान जाते हैं। क्या तुम्हें समझ नहीं आता कि जो नौकरानी तुम्हारे घर के काम करती है, वह मोहल्ले के चार घरों में भी काम करती है, और वो सबकी बातें दूसरी जगह जाकर बताती है।"

"तुमने एक बार भी मम्मी या मुझसे पूछा, मम्मी-पापा, आपको भूख लगी होगी, आप खाने में क्या खाओगे? लेकिन तुम गलती मानने की बजाय उल्टा हमसे लड़ने चले आए। बेटा, इतनी सालों से भी तुम्हारी मां बीमार है, फिर भी तुमने अपनी रसोई अलग कर ली। कभी हमने तुम्हारे मुंह से यह नहीं सुना कि मम्मी-पापा, भले ही मैं घर की शांति के लिए अलग हुआ, लेकिन आप चिंता मत करो, मैं हमेशा आपके साथ हूं। तो बताओ, क्या हम तुमसे भीख मांगकर खाएंगे? अभी इतना स्वाभिमान बचा है हमारा, हम अपना ख्याल खुद रख सकते हैं। अब बेटा, पेट तो हमें अपना भरना ही था, जहां स्वाभिमान पर चोट ना लगे, वहीं तो खाएंगे ना।"

पिता ने जब सच्चाई का आईना दिखाया तो अभिषेक चुपचाप वहां से चला गया।

आशा जी की आंखों में आंसू थे। शैलेश जी ने आशा जी का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा,
"आशा, तुम चिंता मत करो, मैं सब संभाल लूंगा। देखो, मैंने हमारा घर कितने अच्छे तरीके से मैनेज कर रखा है। जब तुम चलने-फिरने लगोगी, तुम्हें तुम्हारा घर वैसे ही मिलेगा जैसा तुम रखती थी। और हां, मुझे यह टिफ़िन का खाना थोड़ा कम पसंद आ रहा है, जल्दी से ठीक हो जाओ, फिर तुम्हारे हाथ की आलू-पूरी खानी है मुझे,"
कहकर शैलेश जी हंसने लगे तो आशा जी भी रोते-रोते हंस दीं।

दोनों पति-पत्नी गले मिलकर जन्म-जन्मांतर तक एक दूसरे का साथ निभाने का वादा कर रहे थे।

चेतना अग्रवाल 


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