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तृप्ति की चमक

 "मांजी बहुत तेज बारिश हो रही है आप खिड़की बंद कर दीजिए बारिश की बूंदे आपको बीमार कर सकती हैं।" प्रिशा अपनी सास मिथलेश जी से बोली।

" नहीं बहू बूंदे यहां नहीं आ रही। तुम्हारे बाबूजी को बहुत पसंद थी बारिश। घंटो बैठे रहते थे खिड़की पर हम दोनों। साथ में चलता था पकोड़े और चाय का दौर। सच क्या दिन थे वो भी अब तो ना उनका साथ रहा ना पकोड़े झेलने वाला जिस्म!" मिथलेश जी ठंडी आह भरकर बोली।

प्रिशा ने पकोडों की बात होने पर मिथलेश जी की आंखों में जो चमक देखी उससे प्रिशा की आंख भर आई। सच में बुढ़ापा ऐसा होता है जब जीभ तो बच्चों की तरह मचलती पर शरीर कुछ भी ऐसा वैसा खाने की इजाज़त नहीं देता है। मांजी को शूगर और ब्लड प्रेशर की बीमारी के कारण डाक्टर ने तला हुआ और मसालेदार खाना मना किया है।

मिथलेश जी अभी दो महीने पहले ही पति के मरने के बाद गांव का घर छोड़ बेटे बहु के पास आई है। यहां बहू प्रिशा बेटा तरुण पोता पोती सब हैं। बेटे बहू ने बाबूजी के ना रहने पर उन्हें अकेले नहीं रहने दिया तो मजबूरी में उन्हें शहर आना पड़ा था हालाकि उनके मन में शंका थी बहू कैसा व्यवहार करेगी पर बहू प्रिशा बहुत ध्यान रखती है सास का। पोते पोती भी आगे पीछे घूमते रहते तो मिथलेश जी का मन लगा रहता है। पर इस उम्र में जीवनसाथी की कमी कोई पूरी नहीं कर सकता क्योंकि इस उम्र में रिश्ता शरीर से नहीं दिल से बंधा होता है।

" तरुण मांजी बहुत उदास हो जाती हैं कभी कभी मुझे समझ नहीं आता उन्हें कैसे खुश रखूं!" प्रिशा अपने पति से बोली।

" प्रिशा अभी बाबूजी को गए ज्यादा वक़्त नहीं हुआ है उन्हें संभलने का मौका दो धीरे धीरे वो यहां के माहौल में रम जाएंगी!" तरुण बोला।

प्रिशा हर संभव कोशिश करती मांजी को खुश रखने की।

" मांजी चलिए पार्क चलते हैं!" एक दिन प्रिशा बोली।

" अरे नहीं बेटा मैं क्या करूंगी वहां जाओ तुम घूम आओ!" मिथलेश जी बोली।

" मांजी चलिए तो सही !" मिथलेश जी का हाथ पकड़ती हुई प्रिशा बोली।

पार्क में जा मिथलेश जी एक बेंच पर बैठ गई और बच्चों को खेलते देखने लगी।

" दादी आप भी खेलो ना हमारे साथ!" बैडमिंटन खेलती उनकी पोती पलक बोली।

" अरे मैं कहां ये खेल सकती!" मिथलेश जी बोली जबकि उनकी आंखों की चमक बता रही थी वो खेलना चाहती हैं पर माहौल को देख झिझक रही।

" आओ ना मांजी हम दोनों खेलते हैं मुझे भी नहीं आता ये खेल इसलिए बच्चों के साथ तो खेल नहीं सकती!" प्रिशा जानबूझ के झूठ बोल गई।

सास बहू ने खेलना शुरू किया। प्रिशा जान बूझ कर मांजी से हारने लगी जिससे मांजी खुश हो गई।

" अरे बहू तुझमें तो जान ही नहीं है एक चिड़िया( शटल कॉक) नहीं उछाल सकती!" मांजी हंसते हुए बोली।

"मांजी मुझे क्या पता था आपको इतना अच्छा खेलना आता है!" प्रिशा मुंह बना बोली।

"अच्छा अब घर चलो मैं थक गई और लगता है बारिश भी होने वाली है!" मिथलेश जी बोली।

सबके घर पहुंचते पहुंचते बारिश शुरू हो गई। तभी तरुण भी आ गए ।

"प्रिशा आज तो गरम चाय और पकोड़े हो जाएं देखो कितनी अच्छी बारिश है!" तरुण बोले।

पकोड़े का नाम सुन मिथलेश जी की आंखों में एक चमक आई पर तभी बूझ भी गई। प्रिशा जानती थी मांजी को एक - दो पकोड़ो से तसल्ली नहीं होगी और ज्यादा उनके लिए जहर हैं।

" लीजिए तरुण आपके पकोड़े और चाय और मांजी ये आपके!" प्रिशा प्लेट बढ़ाते हुए बोली।

" दिमाग खराब है प्रिशा जो मां को इतने सारे पकोड़े दे रही हो याद नहीं डॉक्टर ने कहा था तला इनके लिए जहर है!" तरुण भड़क कर बोले।

" मांजी आप खाइए पकोड़े वरना ठंडे हो जाएंगे और तरुण मैं मां की दुश्मन नहीं हूं ये पकोड़े मैने एयर फ्रायर में बनाए है बिन तेल के जो मैने कल ही ऑर्डर कर मंगवाया था क्योंकि मुझे पता है मांजी को पकोड़ो का कितना शौक है पर वो अपने शौक मारे हुए हैं!" प्रिशा बोली।

तरुण प्रिशा को प्रशंसा की दृष्टि से देखने लगा।

मांजी पकोड़े खाते हुए नम आंखों से बहू को देख रही थी। उनकी आंखों में खुशी के आंसू थे और दिल में बहू के लिए ढेरों दुआएं । बात मामूली से पकोड़ो की थी पर बहू ने सास के मन को जाना ये मामूली बात नहीं थी। आज मांजी के चेहरे पर तृप्ति देख प्रिशा को बहुत अच्छा लग रहा था।

दोस्तों काश हर बहू प्रिशा जैसी हो तो सास बहू का रिश्ता कभी बदनाम ना हो।

कैसी लगी आपको मेरी स्वरचित रचना?


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