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जलील

 70 वर्ष की राधा देवी जी रसोई में एक गिलास दूध लेकर अपने कमरे की तरफ जा रही थीं। तभी बाथरूम में कपड़े धो रही बड़ी बहू की नजर राधा देवी जी पर पड़ी। वह बाथरूम से भागकर आई और राधा देवी जी के हाथ से दूध का गिलास छीनते हुए बोली, "अरे, हद हो गई! बुढ़ापे में कुछ तो शर्म करो। घर में बच्चों के लिए थोड़ा सा दूध आता है, उस पर भी नजर गड़ाए रहती हो। इस उम्र में दूध पीकर और कितनी ताकत बढ़ाना चाहती हो? 70 बरस की हो गई हो पूरी, लेकिन जुबान पर अभी भी लगाम नहीं है। तुम्हारे पति यहाँ खजाना नहीं छोड़कर गए हैं हमारे लिए, जो तुम्हें बैठाकर दूध पिलाएंगे हम लोग!"

बहू की बातें राधा देवी जी से बर्दाश्त नहीं हो रही थीं, लेकिन जैसे-तैसे वह अपने आप पर काबू किए हुए थीं। दरअसल, अभी कुछ देर पहले बड़ी बहू ने राधा देवी जी के लिए सुबह की दो ठंडी रोटियाँ और रात की बची सब्जी बेटे के हाथ से भिजवाई थी। राधा देवी जी के दाँतों में इतना दर्द था कि रोटी चबाने में उन्हें बहुत मुश्किल हो रही थी और ऊपर से सुबह की ठंडी, कड़क रोटी थी। तो उन्होंने सोचा, अगर बहू से कहूँगी तो न जाने मुझे कितनी बातें सुनाएगी, इससे अच्छा है कि इन रोटियों को थोड़े से दूध में भिगो दूँ, तो खाने में आसानी होगी। यही सोचकर वह रसोई में दूध लेने चली गई थीं। उन्होंने पतीले से एक गिलास दूध लिया और अपने कमरे की तरफ जाने लगीं, तो बहू ने रास्ते में ही उनके हाथ से दूध का गिलास छीन लिया और एक गिलास दूध के ऊपर उन्हें खूब जलील किया।

राधा देवी जी ने एक गहरी साँस ली और अपने पड़ोस की सहेली के संग सत्संग के लिए निकल गईं। आज उनका दिल बहुत ही उदास था। मंदिर की सीढ़ियों पर बैठे-बैठे अपने स्वर्गवासी पति को याद करने लगीं। अपनी सहेली से बातें करते-करते अपने अतीत की यादों में खो गईं। उनके पति एक बैंक में मैनेजर थे। उनके दो बेटे हैं, योगेश और आलोक। दोनों ही बेटे शादीशुदा हैं। राधा देवी जी ज्यादा पढ़ी-लिखी तो नहीं थीं, लेकिन उन्होंने अपने दोनों बच्चों को बहुत ही अच्छी परवरिश दी थी और अपने पति के संग अपनी गृहस्थी को संचालन किया था। रिश्ते कैसे निभाए जाते हैं, यह राधा देवी जी ने अपने पति से सीखा। महीने के अंत में उनके पति पूरी पगार लाकर उनके हाथ में रख देते थे और खुद निश्चिंत हो जाते थे। घर के मामलों में वह कभी भी नहीं बोलते थे, पर राधा देवी जी को जब भी उनके पति की सलाह की जरूरत होती थी, तो वह हर कदम पर उनके साथ होते थे।

समय के साथ उनकी उम्र बढ़ती गई और बच्चे भी अच्छी शिक्षा प्राप्त कर चुके थे। जब उनके पति सुंदरलाल जी जीवित थे, तब उन्होंने शहर के सबसे बड़े कॉलोनी में अपना घर बनवाया था। सुंदरलाल जी बैंक में जॉब करते थे, इसलिए उन्हें लोन भी आसानी से मिल गया और उन्होंने अपनी पत्नी के सपने को पूरा करने के लिए वह घर बनवाया था। पहले मकान एक मंजिला था। जब बच्चे बड़े हो गए तो उन्होंने एक मंजिला और बनवा दिया। एक-एक करके उनके दोनों बेटों की शादी भी हो गई और दोनों बच्चों के दो-दो बच्चे भी हो गए थे। अब राधा देवी जी और उनके पति सबसे नीचे रहते थे। जब तक सुंदरलाल जी जीवित थे, बेटे और बहुएँ राधा देवी जी की खूब सेवा-सत्कार करती थीं। राधा देवी जी भी मेहनती महिला थीं, जो उम्र के इस दौर में भी चुस्त और दुरुस्त थीं। सारा दिन कुछ न कुछ करती रहना उनकी आदत थी। इसी कारण काम को लेकर बहुएँ भी उन पर निर्भर थीं।

राधा देवी जी जब भी अपने पति के साथ चाय पीने बैठती थीं, तो उनके पति कहते थे, "अब हमें किसी प्रकार की चिंता नहीं है, राधा। भगवान ने चाहा तो बुढ़ापा बहुत ही अच्छा कटेगा। अब हर महीने पेंशन तो आएगी, बस आराम से गुजारा हो जाएगा। जवानी में जो सपने मैं तुम्हारे पूरे नहीं कर पाया, अब पूरे करूंगा।"
राधा जी बोलीं, "आपने तो मेरी सारी इच्छाएँ पूरी की हैं। आप जैसा पति पाकर तो मैं धन्य हो गई।"

धीरे-धीरे समय बीतने लगा। एक दिन उनके पति के अचानक सीने में तेज दर्द होने की वजह से मृत्यु हो गई। राधा जी की तो जैसे दुनिया ही उजड़ गई थी। पति के जाने के बाद बेटे और बहू का रवैया खराब होता चला गया। बहुओं और बेटों को विधवा माँ की दो रोटियाँ भी भारी होने लगीं। राधा देवी जी सब कुछ समझ रही थीं, पर उम्र के इस दौर में अपने आप को असहाय महसूस करने लगी थीं।

दो दिन पहले की ही बात है। अचानक घर में घुसी तो उन्हें बेटे और बहू की आवाज सुनाई दी। कौतूहलवश वह चुपचाप खड़ी हो गईं और उनके दुख का ठिकाना नहीं रहा, जब उन्होंने सुना कि दोनों बेटों ने पूरे महीने के लिए उन्हें बाँट लिया है। अब राधा देवी जी दो हिस्सों में बँट गई थीं। दो महीने कभी एक बेटे के पास, फिर दूसरे बेटे के पास। जिस भी बेटे के पास रहतीं, वही बेटा उनकी पेंशन को घर खर्चे में इस्तेमाल करता। पूरी पेंशन खर्च करने के बाद भी बहू-बेटे माँ को रात की सूखी, ठंडी, बासी रोटी खिलाते और साथ ही साथ जलील भी करते।

आज राधा देवी जी के सब्र का बाँध टूट गया था। उन्हें मंदिर की सीढ़ियों पर बैठे-बैठे काफी देर हो चुकी थी। सुबह से कुछ खाया भी नहीं था। बहू की जली-कटी बातें सुनकर उस दिन उन्होंने शाम को भी खाना नहीं खाया। अगले दिन से छोटे बेटे के यहाँ रहने की बारी थी। उन्होंने अपनी छोटी बहू को मीठा दलिया बनाने के लिए कहा, तो छोटी बहू का जवाब था, "मैं अभी खाली नहीं हूँ। आपको कुछ और तो सूझता नहीं है सिवाय खाने के! इस उम्र में भी खाने की पड़ी है, आपकी जीभ तो चटोरी हो गई है। चुपचाप जाकर अपने कमरे में बैठ जाओ, मैं किटी पार्टी के लिए लेट हो रही हूँ, यहाँ खड़ी-खड़ी मेरा मूड ऑफ मत करो।"

राधा देवी जी के सब्र का पैमाना छलक गया और वह अपनी पड़ोस की सहेली शांता के पास चली गईं। उनकी सहेली शांता, शिक्षा प्राप्ति से लेकर शादी तक दोनों साथ रही थी। शांता जी हमेशा दिल से नहीं, दिमाग से सोचती थीं। उन्होंने राधा जी को कई बार समझाया था, "थोड़ा रोब रखा करो, किस बात की तुम्हें कमी है? मकान अभी तुम्हारे नाम पर है, बहू जब भी सिर पर बैठने की कोशिश करे तो धमकी दे दिया करो कि किसी को भी हिस्सा नहीं दूँगी।"

मगर राधा देवी जी को यह बात मंजूर नहीं थी। उनका कहना था, "जब मकान बनवाया ही बच्चों के लिए है तो ऐसा सोचना ही किस लिए?" लेकिन आज उन्हें लग रहा था कि अब कुछ करने का समय आ गया है। शांता देवी जी से सलाह मशवरा करके राधा देवी जी घर जाकर पति की तस्वीर के सामने खड़ी हो गईं, जैसे मन ही मन उनसे विचार-विमर्श कर रही हों। एक दृढ़ निश्चय उनके चेहरे पर आ गया और वह भूखे पेट ही सो गईं।

अगले दिन दोनों बेटे अपनी पत्नियों के साथ 15 दिन के लिए यूरोप ट्रिप पर जाने वाले थे। बेटे-बहू खुशी-खुशी बैग पैकिंग कर रहे थे। राधा देवी जी भी बैठी-बैठी सब कुछ देख रही थीं। उन्हें अपनी योजना को अंतिम रूप देने का एक अवसर मिल रहा था। वह चुपचाप शांत भाव से बैठकर सबकी तैयारी देख रही थीं। वैसे भी उनका मानना था कि जब बेटे माँ-बाप को नहीं पूछते, तो बहू से क्या उम्मीद रखना? बहुएँ तो चाहती ही हैं कि किसी की सेवा न करनी पड़े। वे तो पति और बच्चों में ही अपना परिवार देखती हैं, सास-ससुर उन्हें बोझ लगने लगते हैं।

राधा देवी जी अपनी सहेली शांता जी के साथ प्रॉपर्टी डीलर के पास गईं। प्रॉपर्टी डीलर शांता देवी जी के बेटे का खास दोस्त था। उससे मिलकर अपनी सारी कहानी सुनाई, सलाह-मशवरा किया और वापस घर आ गईं।

15 दिनों के बाद जब बेटे-बहू खुश होकर घर लौटे, तो मकान पर ताला लगा देखकर उनका पारा चढ़ गया। "हद हो गई, लापरवाही की। पता था कि हम आज आ रहे हैं, फिर घर पर नहीं बैठ सकती थी? पता नहीं कहाँ सैर-सपाटा करने निकल गई," दोनों बहुएँ गुस्से में बोलीं।
काफी देर इंतजार करने के बाद योगेश और आलोक शांता जी के घर की तरफ चल दिए। उनके पैरों तले जमीन खिसक गई जब उन्हें पता चला कि उनकी माँ ने मकान को 80 लाख में बेच दिया है और अब वह कहाँ हैं, किसी को पता नहीं था। दोनों बहू-बेटों को समझ में नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो गया। उन्हें लग रहा था कि यह एक भद्दा मजाक है जो माँ ने उनके साथ किया है। गुस्से में दोनों भाई उबल रहे थे, "माँ ऐसा कैसे कर सकती हैं? हम लोगों के साथ मकान की कीमत 1 करोड़ थी, फिर माँ ने 20 लाख का घाटा क्यों उठाया?" कोई चारा न देख सब अपने-अपने ससुराल चले गए।

अगले दिन बड़े बेटे के पास शांता जी का फोन आया। फिर दोनों बेटों को अपने पास आने के लिए कहा, "कुछ आवश्यक सूचना देनी है, शाम तक आ जाना।"
उन लोगों को शाम तक का भी इंतजार भारी पड़ रहा था। शांता जी के पास से जो सूचना मिली, उसे सुनकर दोनों की जुबान पर ताला लग गया। सोचने-समझने की शक्ति जैसे साथ छोड़ गई थी।

शांता जी के अनुसार, राधा देवी जी वृंदावन चली गई हैं और उन्होंने वहाँ पर एक घर ले लिया है और अब वह वहीं रहेंगी। यह समाचार पूरे परिवार पर एक भारी प्रहार की तरह था। बहुत अनुनय-विनय करने पर शांता जी से वह माँ का पता प्राप्त कर सके और वृंदावन की ओर उड़ चले। यह कदम उनकी समझ से बाहर था।

वृंदावन पहुँचकर माँ को देखकर एक और झटका लगा। माँ बहुत ही खुश और स्वस्थ लग रही थीं। बेटे और बहू को देख उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई। खुशी-खुशी उन सबका स्वागत किया और "सुंदर" कहकर किसी को आवाज दी। आवाज सुनते ही एक लड़का सामने खड़ा हो गया। सबने बड़े ही आश्चर्य से उसे देखा।
राधा देवी जी ने सबकी नजरों को नजरअंदाज किया और सुंदर को चार गिलास गरम-गरम दूध लाने को कहा। इसी बीच राधा देवी जी सबसे बच्चों की कुशलता के बारे में जानने की कोशिश कर रही थीं। दोनों बेटे एक-दूसरे की तरफ देख रहे थे कि कौन पहल करे, पर किसी की हिम्मत नहीं हो पा रही थी, कुछ भी पूछने की।

इतने में सुंदर एक ट्रे में चार गिलास दूध लेकर आ गया। चारों में से किसी ने भी दूध को हाथ तक नहीं लगाया। किसी के बोलते न देखकर राधा जी ने कमान अपने हाथ में ले ली और बोलने लगीं, "तुम सबको हैरानी हो रही होगी और गुस्सा भी आ रहा होगा कि माँ को यह क्या सनक सवार हो गई। लेकिन कारण भी तुम लोग ही हो। मैं और तुम्हारे बाबूजी ने तुम लोगों को कभी भी किसी प्रकार की कमी नहीं आने दी। तुम्हारे बाबूजी की तनख्वाह से कितनी कुशलता से घर को चलाया, यह बात मुझे सबको बताने की जरूरत नहीं है। और आज मुझे यह कहने में भी शर्म नहीं है कि तुम्हारे बाबूजी ने अपनी छोटी सी इनकम में तुम सबको पढ़ाया-लिखाया, मेरी खुशी के लिए यह घर भी बनाया। अपने पिता के जाते ही तुमने अपनी माँ को दो हिस्सों में बाँट दिया। अरे, पूरे महीने की पेंशन मेरी तुम लोग अपने घर खर्चे में इस्तेमाल करते थे और मुझे खाने के लिए सूखी रोटी देते थे। और तो और, खूब जलील भी करते। मेरी दो रोटियाँ भी तुम सब पर भारी पड़ रही थीं।"

"तुम सब अधिकार के लिए मेरे पास दौड़े चले आए, लेकिन कर्तव्य उसका क्या? वह तो तुम में से किसी ने भी नहीं निभाया!"

"माँ, हम तुम्हारे बेटे-बहू हैं, तुम हमारे साथ ऐसा कैसे कर सकती हो?" दोनों बेटे आँखों में आँसू लाते हुए बोले।

"क्यों बेटा, क्यों नहीं कर सकती मैं ऐसा? जब तुम लोगों ने बुढ़ापे में मेरे साथ बुरा करने में कसर नहीं छोड़ी, मुझे खाने-पीने से भी मोहताज कर दिया, राधा देवी ने बड़ी बहू की तरफ देखते हुए बोली, क्यों बहू, याद है तुम्हें, वह दिन? या भूल गई जब तुमने मेरे हाथ से दूध तक छीन लिया था और एक गिलास दूध के ऊपर तुमने मेरा कितना अपमान किया था? तुम भूल गई होगी, लेकिन मुझे अच्छे से याद है। और छोटी बहू, कसर तो तुमने भी नहीं छोड़ी। एक दिन तुमसे दलिया बनाने को क्या कह दिया, तुमने भी न जाने मुझे कितना भला-बुरा कहा। किटी पार्टी में जाने के लिए तुम्हारे पास समय था, मुझे पता है। तुम्हें मेरा यह फैसला पसंद नहीं आया होगा, पर इसके जिम्मेदार तुम लोग खुद हो। तुमने ही मुझे यह सब करने को मजबूर किया।"

"मैंने अपने घर को 80 लाख में बेचा है, उन पैसों से ही मैंने यह घर खरीदा है। मैंने इसके लिए आश्रम को 25 लाख दे दिए हैं। मेरे मरने के बाद यह घर आश्रम की संपत्ति हो जाएगा। अभी-अभी जिस लड़के को तुमने देखा, वह एक अनाथ लड़का है, जो मेरे साथ ही रहता है। मैंने एक स्कूल में उसका नाम लिखवा दिया है। पढ़ता भी है और मेरी सेवा भी करता है। पाँच लाख रुपए मैंने उसके नाम पर भी जमा कर दिए हैं और बाकी का जितना भी पैसा बचा, वह सब मैंने अपने अकाउंट में जमा कर दिया है। बैंक से जो इंटरेस्ट आएगा और मेरे पति की पेंशन से मेरा और सुंदर का खर्चा आराम से चल जाएगा।"

बेटे और बहू बहुत ही आश्चर्य से माँ के चेहरे को देख रहे थे। बेटे रोनी सूरत में बोले, "इतना कठोर कदम उठा लिया आपने, माँ? कुछ तो सोचा होता हमारे बारे में भी!"

"बेटा, यह तुम्हारे कर्मों का तमाचा है, जो आज तुम्हारे गाल पर पड़ा है। जैसी करनी, वैसी भरनी! जब तुम लोगों ने ही इस बूढ़ी विधवा माँ के साथ गलत करने में कसर नहीं छोड़ी, तो फिर मैं क्यों तुम लोगों के बारे में सोचती?"

"माँ, हमसे गलती हो गई, एक बार हमें माफ कर दो। आगे से फिर कभी ऐसा नहीं करेंगे। तुम्हें खाने-पीने की किसी चीज की कमी नहीं रखेंगे।"

"नहीं बेटा, मैंने अपना इंतजाम कर लिया है। मुझे तुम लोगों की सेवा पाने की कोई जरूरत नहीं है और न ही मुझे तुमसे कोई लेना-देना है।"
राधा देवी जी इतना कहकर आराम से अपनी कुर्सी पर बैठ गईं। कई बार माफी माँगने के बाद भी राधा देवी जी ने बेटे-बहुओं को माफ नहीं किया और फिर दोनों बेटे और बहुएँ खाली हाथ, मुँह लटकाए वापस चली गईं।


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