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न्याय

 "मम्मी, शालू के पापा का फोन आया था। उसकी मम्मी की तबीयत अचानक खराब हो गई है, हॉस्पिटल लेकर गए हैं, तो मैं और शालू निकल रहे हैं। शालू तैयार हो रही है, तब तक दीदी, आप केवल रोटियां सेक दीजिए, उसने सुबह से कुछ नहीं खाया है, थोड़ा खा लेगी तो सही रहेगा।" अपनी मम्मी के कमरे में आकर राहुल ने बहन लीला से कहा।

"अरे बेटा, हॉस्पिटल लेकर गए हैं ना, तो ठीक हो जाएंगी। तुम लोगों को जाने की क्या जरूरत है? और वैसे भी तुझे तो पता है, उसकी मम्मी की तबीयत तो अब खराब हुई है, लेकिन मेरे ऑपरेशन को भी ज्यादा समय नहीं हुआ है। तो फिर वह चली जाएगी, तो कौन संभालेगा? ऊपर से नीला भी आई हुई है, भाई उसके बिना यहां पर तो मैनेज नहीं हो पाएगा, इसलिए फिलहाल रहने दो, इतनी भी जरूरत नहीं है जाने की।" अपनी और अपनी बेटी की जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ते हुए सालों से प्रेमलता जी ने शालू के मायके जाने पर रोक लगाने की कोशिश की।

दूसरी तरफ, अंदर तैयार होती शालू के कानों में जब ये शब्द पड़े तो ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके कानों में गर्म सीसा घोल दिया हो। "ऐसे कैसे हो सकता है, जब मेरी मम्मी अस्पताल में भर्ती है, तब मुझे जाने से कोई कैसे रोक सकता है? कोई कैसे एक बीमार मां से मिलने के लिए उसकी बेटी को रोक सकता है, वो भी सिर्फ इसलिए कि उसकी सास के ऑपरेशन को 20 दिन हुए हैं और ननद मायके में घूमने आई है? यह कैसा न्याय है!" लेकिन नहीं, इस बार मुझे आवाज़ उठानी ही पड़ेगी, क्योंकि इस बार बात मेरी मां की तबीयत की है। बस यही सोचकर वह भी अपनी सास के कमरे में आ गई।

लेकिन वह कुछ कहती उससे पहले ही उनका बेटा उन्हें समझाने की कोशिश कर रहा था, "मम्मी, कैसी बातें कर रही हो? शालू की मम्मी की तबीयत खराब है, वह हॉस्पिटल में है। क्या ऐसे में एक बेटी को अपनी मां से मिलने की इजाजत भी नहीं है? तो फिर तुम्हारे ऑपरेशन के बाद दीदी क्यों आई थीं? जब दीदी अपनी बीमार मां से मिलने आ सकती हैं तो फिर शालू क्यों नहीं जा सकती?" राहुल ने मां को समझाने की कोशिश की।

"हां बेटा, अपनी बीवी के लिए तो हमसे लड़ने आ गया, और तो और, तेरी इकलौती बहन जब मायके आई है तो उसे भी तूने ताना दे दिया! सही है बेटा, सही शिक्षा मिल रही है तुझे, सही पढ़ा रही है तेरी बीवी!" प्रेमलता जी ने गुस्से में कहा।

"माफ कीजिएगा मम्मी जी, लेकिन न मुझे कुछ पढ़ाने की जरूरत है और न ही मैंने कुछ पढ़ाया है, जो सच है वही कह रहे हैं। और रही बात मेरे जाने की तो मैं तो जाऊंगी, मुझे कोई नहीं रोक सकता। और हां, जो आप कह रही हैं ना कि आपकी सेवा कौन करेगा, तो दीदी हैं ना, वह करेंगी आपकी सेवा। जब मैं अपनी मां के पास उनकी सेवा करने जा सकती हूं, तो फिर क्या दीदी इतना भी नहीं कर सकतीं? वैसे आपको याद दिला दूं, मम्मी जी, कि जब मेरी बिट्टू पैदा हुई थी, तब मेरी सिजेरियन डिलीवरी हुई थी और 20 दिन बाद दीदी की नॉर्मल डिलीवरी हुई थी। तब आप अपनी बड़ी बहू को छोड़कर अपनी बेटी के पास सेवा करने के लिए चली गई थीं, जबकि उनके ससुराल में उनके सास-ससुर, देवर-ननद सब मौजूद थे, भरा-पूरा परिवार है। लेकिन आपको लग रहा था कि आपकी बेटी की सेवा अच्छे से नहीं होगी, इसलिए आप चली गई थीं। तब तो आपने मेरे बारे में नहीं सोचा था, तब तो आप दीदी की सेवा करना चाहती थीं। केवल 20 दिन हुए थे मुझे ऑपरेशन को और घर का पूरा काम मैं कर रही थी, बच्चे को भी संभालती थी। इतनी छोटी बच्ची को नहलाना, मालिश करवाना, उसके सारे काम करना, सब कुछ किया है मैंने। और जल्दी-जल्दी सारा काम करने की वजह से मेरे शरीर को कितना नुकसान हुआ है, ये मैं ही जानती हूं, लेकिन इन सब बातों से आपको कोई फर्क नहीं पड़ा था। तो फिर जब मेरी बारी आई है तो आप क्यों पीछे हट रही हैं? और वैसे भी, जब आप दीदी की सेवा करने गई थीं तो अब दीदी ही आपकी सेवा करेंगी।"

"यह क्या बात हुई भला भाभी, मैंने थोड़े न कहा था मम्मी को कि आओ, आकर मेरी सेवा करो, और वैसे भी, सास मेरी सेवा कर भी रही थी, भरा-पूरा ससुराल है मेरा, उन्होंने क्या किया था? तो मैं भी क्यों करूं! आप जाओ या न जाओ अपने मायके, लेकिन मैं तो चलूंगी अपने ससुराल, मैं नहीं करने वाली यहां पर रहकर मम्मी की सेवा। वैसे भी 20-22 दिन हो चुके हैं ऑपरेशन को, अब मम्मी अपना काम खुद कर सकती हैं। बाकी काम के लिए माला आंटी हैं ना, थोड़े ज्यादा पैसे दे दीजिए उनको, तो खाना भी बना देंगी मम्मी और भाई के लिए।" बड़े ही भद्दे तरीके से लीला ने भी अपना पल्ला झाड़ लिया, जिसे देखकर अब प्रेमलता जी की आंखें भर आई थीं, क्योंकि जिस बेटी के लिए बहू को छोड़कर गई थीं, आज वही बेटी मुश्किल समय में जरूरत पड़ने पर इस तरीके का व्यवहार कर रही थी।

"बहुत अच्छा, तो चली जा, तेरा वहां जाना जरूरी है, मुझे 20-22 दिन हो चुके हैं, अपना काम कर लूंगी, और सही बात है, पैसे देकर बाकी का काम भी हो जाएगा। रही बात किसी अपने के पास होने की, तो जब मुसीबत में मेरी अपनी बेटी ने पल्ला झाड़ लिया, तो फिर तुम्हें क्या दोष दूं। बल्कि तुमसे इतना जरूर कहूंगी कि माता-पिता से बढ़कर कोई नहीं होता, जाओ, तुम उनके प्रति अपने फर्ज को निभाओ, कहीं ऐसा न हो कि आज लीला ने शर्मिंदा करके मुझे दर्द दिया है, दिल के किसी कोने में वही दर्द तुम्हारे संबंधी को भी न सहना पड़े। इसलिए तुम जा सकती हो।" आंसू भरी आंखों से प्रेमलता जी ने कहा।

"अरे लीला, अब तो ज़रा सी शर्म कर ले, मैं तो ये बात पहले ही जानता था कि तू मुसीबत के समय काम आने वालों में से नहीं है, लेकिन सोचा था कि अपनी भाभी की न सही, कम से कम तू मां की तो सगी होगी, लेकिन नहीं, तुझसे तो ये उम्मीद करना भी बेकार है। मैं जा रहा हूं शालू को लेकर, और जाते-जाते माला आंटी को कह देंगे, वह एक्स्ट्रा पैसे लेकर सारा काम कर देंगी, और कल सुबह की तेरी भी टिकट बनवा दूंगा।"

इतना सुनने पर भी लीला को जरा भी शर्म नहीं आई, वह अपने फैसले पर अड़ी रही। लेकिन दूसरी तरफ, शालू एक बार फिर अपने दोनों परिवारों के बारे में सोचने लगी, "सुनिए, ऐसा करते हैं दीदी की कल दोपहर की टिकट बनवा दीजिए, और आप सुबह तक मुझे छोड़कर वापस आ जाइएगा। अगर मेरी मम्मी को मेरी जरूरत है, तो यहां पर मम्मी जी को भी आपकी जरूरत है। इसलिए बेहतर यही होगा कि हम दोनों ही अपने-अपने फर्ज निभाएं, बाकी जिसकी जो मर्जी।"

इतना कहकर शालू और राहुल दोनों ही चल पड़े अपना-अपना फर्ज पूरा करने।


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