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अपशब्द

 "बहुत हुआ, सरला। अब मैं अपने स्वाभिमान के साथ समझौता नहीं कर सकता और इस घर में एक पल भी नहीं रह सकता," महेश जी सीमा और विशाल के काँटों भरे तानों से आहत होकर बोले।

"बिल्कुल सही कह रहे हैं आप। अब मैं भी ऐसे घर में रहना नहीं चाहती। अभी तक मैं यही सोच रही थी कि शायद एक दिन परिस्थितियाँ सही हो जाएँगी, लेकिन अब पानी सिर से ऊपर गुजर चुका है," सरला भी अपने आँसुओं को पोंछते हुए बोली।

"दादू-दादी, आप लोग रो क्यों रहे हैं?" सात साल की चुनमुन उन दोनों के आँसुओं को अपने नन्हे-नन्हे हाथों से पोंछते हुए बोली।

"कुछ नहीं बेटा, बस आँख में तानों का कंकड़ चला गया," महेश जी और सरला जी व्यथित होकर बोले।

"हमें मालूम है आपको मम्मी-पापा ने डाँटा है, इसलिए रो रहे हैं आप लोग," और वह दोनों भी रोते हुए दादू-दादी से चिपक गईं।

अभी थोड़ी देर पहले की घटना आँखों में चलचित्र की तरह घूम रही थी—

"मैंने जिंदगी भर इन दोनों को अपने पास रखने का ठेका नहीं ले रखा है। तुम्हारे बड़े भैया तो अपनी सारी जिम्मेदारियों से मुँह मोड़कर विदेश में रह रहे हैं और इन दोनों बुड्ढे-बुढ़िया को हमारे मत्थे मढ़ दिया। जब इन बुड्ढे-बुढ़िया को हमें कुछ देना ही नहीं है तो हम क्यों इनको अपने पास रखें?" सीमा का एक-एक शब्द ज़हर बुझे तीर की तरह दोनों के सीने को छलनी कर रहा था।

"बिल्कुल सही कह रही हो तुम, गलती तो मैंने भी की, इन दोनों को अपने पास रखकर। जैसे भैया ने छोड़ दिया था, वैसे ही हमें भी छोड़ देना चाहिए था। लेकिन अब बिल्कुल नहीं—जहाँ जी चाहे, जैसे जी चाहे, वैसे जिएँ।"
प्राणों से प्यारे बेटे ने बोल पड़ा, जिससे न जाने कितनी उम्मीदें थीं। उन दोनों ने ही भगवान से कहा, "यह दिन देखने से पहले हम लोग मर क्यों नहीं गए?"

बेटे-बहू के मुँह से शर्मनाक शब्द सुनकर दोनों के मुँह से एक साथ निकला, "काश! यह धरती फट जाए और हम लोग इसी में समा जाएँ।"

बहुत कुछ सहा है पर अपने बच्चों से ऐसी उम्मीद बिल्कुल नहीं थी।

महेश जी और सरला जी का हँसता-मुस्कुराता परिवार, दो बेटे, दोनों ही होनहार।
उन दोनों ने अपनी सारी जमा पूँजी बच्चों की पढ़ाई में लगा दी, बस गाँव का एक पुश्तैनी मकान छोड़कर, क्योंकि वो खुद को गाँव की जड़ों से अलग नहीं करना चाहते थे। उनकी सोच थी कि एक दिन जब बच्चे काबिल हो जाएँगे तो अपनी फिक्र करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।
ईश्वर की कृपा से दोनों बेटे पढ़-लिखकर इंजीनियर बन गए। बड़ा बेटा विदेश में सेटल हो गया, शादी करके वहीं की नागरिकता ले ली और हमेशा के लिए वहीं बस गया।
बहुत धक्का लगा, लेकिन छोटी बेटे से उम्मीद बाकी थी। लेकिन कहते हैं, एक बच्चा ऐसा करता है तो दूसरा भी उसके नक्शेकदम पर चल पड़ता है। विशाल ने भी अपने साथ काम करने वाली सीमा से शादी कर ली और अचानक दरवाजे पर लाकर दोनों के अरमानों को एक साथ ध्वस्त कर दिया।
खैर, बच्चों की खुशी में खुद को ही दोनों ने खुश कर लिया, लेकिन सीमा अपनी मस्ती में मस्त रहने वाली, उन दोनों से कोई खास मतलब नहीं रखती थी और जब देखो तब उन दोनों को अपने पास रखने का एहसान जताती रहती।

समय के साथ सीमा की गोद में दो जुड़वा बेटियाँ आईं। दोनों बेटियाँ अपने दादी-दादू से बहुत प्यार करती थीं।
सीमा जब भी बाहर जाती, यहाँ तक कि शहर से भी बाहर, तो वह दोनों बच्चियाँ अपने दादी-दादू के पास ही रहतीं।

समय के साथ विशाल और सीमा ने अपना घर खरीदना चाहा।
"पापा, बहुत दिन आपके घर में रह लिए, अब हम अपना घर खरीदना चाहते हैं। रुपये कम पड़ रहे हैं, तो आप गाँव वाला घर बेच दीजिए," विशाल ने आग्रह किया।

"बेटा, जब कभी हम लोगों का मन करता है, दो-चार दिन के लिए अपने लोगों के बीच चला जाता हूँ। अगर एक बार घर बेच दिया, तो हमेशा के लिए गाँव से दूर हो जाऊँगा। मैंने जीवन भर की कमाई, सारी जमा पूँजी, यहाँ तक कि सरला ने अपने गहने तक तुम लोगों पर न्यौछावर कर दिए, लेकिन अब वो घर नहीं बेचूँगा," महेश जी ने मना करते हुए कहा।
क्योंकि महेश जी अपने आप को पूरी तरह से खाली नहीं करना चाहते थे। विशाल और सीमा का व्यवहार देखकर, समय कब बदल जाए, इसका भरोसा नहीं था। कम से कम सिर छुपाने के लिए एक छत तो होनी चाहिए।

और वो दिन जल्दी आ गया—

"पापा, हम लोगों ने आपको इतने दिनों तक अपने पास इसलिए नहीं रखा कि आप मुझको वो घर बेचने से मना कर दें। मुझे तो वह घर बेचना ही है," अब तो विशाल तकरार करने लगा।

"और क्या, आप लोगों को हराम की रोटी इसलिए नहीं खिलाई थी कि समझ लीजिए, वो अगर इतनी दिनों तक रोटी खिलाई, उसका किराया है," सीमा भी तड़ाक से बोली।

"अच्छा तो अब इन लोगों की निगाह मेरी आखिरी जायदाद पर है, लेकिन मैं वो घर नहीं बेचूँगा, चाहे जो कुछ भी हो जाए," महेश जी और सरला जी ने कठोर फैसला ले लिया।
उसी दिन से सीमा और विशाल उल्टी-सीधी बातों से हर पल उनका सीना छलनी करते रहते, लेकिन वे दोनों सिर्फ चुनमुन के कारण ही रुके थे।

और आज तो उन दोनों ने सारी मर्यादा तोड़ दी, मम्मी-पापा की जगह बुड्ढा-बुढ़िया तक कह डाला।
वे दोनों गाँव जाने की तैयारी करने लगे।

"दादू-दादी, आप लोग कहाँ जा रहे हैं?" चुनमुन उन दोनों को घर से बाहर निकलते देख कर बोली।

"बेटा, हम लोग गाँव जा रहे हैं।"

"हम भी चलेंगे," और दोनों उनके पैरों से लिपट गईं।

"नहीं मेरे बच्चों, तुम लोग यहीं अपने पापा-मम्मी के पास रहो। हाँ, जब बड़ी हो जाओगी, तो अपने दादू-दादी से मिलने ज़रूर आना," दोनों ने रोते हुए बच्चियों को बेहद कठोर बनकर अपने से अलग किया और बाहर निकल गए।

आज तक वे दोनों सिर्फ मोह-ममता में ही फँसे थे। विशाल और सीमा दूर से देखते रहे, एक बार भी रोकने की कोशिश नहीं की।

वे दोनों गाँव चले गए, लेकिन इधर चुनमुन की तबीयत बहुत खराब हो गई। बुखार उतरने का नाम ही नहीं ले रहा था। डॉक्टर भी परेशान थे कि इतनी अच्छी दवाएँ देने के बाद भी बुखार क्यों नहीं उतर रहा।

समझ तो सीमा और विशाल भी रहे थे कि यह सब क्यों हो रहा है, लेकिन मानना नहीं चाह रहे थे। पंद्रह दिन बीत गए।
उधर महेश जी और सरला जी उन दोनों की याद में तड़प रहे थे और इधर बच्चियाँ बीमार।

"मिस्टर विशाल, मैंने हर संभव इलाज करके देख लिया, लेकिन बच्चियों की तबीयत में सुधार नहीं आ रहा। आखिर क्या कारण हो सकता है? कोई बीमारी भी नजर नहीं आ रही। क्या इन बच्चियों का कोई अपनापन, कोई अपनों से दूर हो गया है?" डॉक्टर साहब ने पूछा।

विशाल ने सारी बातें डॉक्टर को बता दीं।

"मिस्टर विशाल, अगर आप अपनी बच्चियों को स्वस्थ देखना चाहते हैं, तो आप तुरंत गाँव जाकर अपने माता-पिता को वापस ले आइए, वरना कुछ भी हो सकता है। क्योंकि कभी-कभी हर बीमारी का इलाज दवा नहीं होती, इन बच्चियों को दवा की नहीं, अपने बाबा-दादी के साथ की जरूरत है," डॉक्टर ने समझाया।

अब तो विशाल और सीमा बहुत परेशान हो गए—"हमने कैसे-कैसे शब्द मम्मी-पापा को बोले हैं! क्या वे हमें माफ करेंगे?"
लेकिन अगर बच्चियों की जान बचानी है तो वहाँ जाना ही पड़ेगा। "अगर दूध का भी देंगे, तब भी जबरदस्ती लेकर आऊँगा।" विशाल और सीमा चुनमुन को उसी हालत में लेकर महेश जी और सरला जी के पास पहुँच गए।

सरला जी अभी खाने की थाली लेकर बैठी थीं कि दरवाजे की कुंडी खटकी। "कौन आ गया?" दरवाजे पर विशाल और सीमा को देखकर चौंक गईं।
दोनों ने ही दोनों बच्चियों को गोद में उठा रखा था। चुनमुन तो सरला जी को देखते ही उनकी गोदी में लिपट गई, "दादी, दादी!"
आवाज़ सुनकर महेश जी भी बाहर आए, "अरे मेरी बच्ची! क्या हुआ तुम लोगों को? तुम्हारा चेहरा इतना निस्तेज कैसे हो गया?"

"मम्मी-पापा, हम लोगों को माफ कर दीजिए, हम लोगों से पाप हुआ है। आप लोग हमारे साथ वापस चलिए। आपके जाने के बाद इन दोनों की बहुत बुरी हालत हो गई है। आज पंद्रह दिन से दोनों बुखार से तड़प रही हैं, न खा रही हैं, न हँस-बोल रही हैं। आज आप लोगों को देखकर इनके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आई है। प्लीज़ मम्मी-पापा, हमारे लिए न सही, अपनी पोतियों के लिए हमें क्षमा कर दीजिए। हम वादा करते हैं कि भविष्य में कभी भी आपको किसी भी प्रकार का मानसिक कष्ट नहीं देंगे। अगर कभी आपको कुछ इस तरह का महसूस हो तो हम लोगों को ज़रूर छोड़ दीजिएगा," विशाल और सीमा ने उन दोनों के पैर पकड़ लिए।

"हाँ मम्मी-पापा, मेरी बच्चियों की जिंदगी मेरी झोली में डाल दीजिए। हमारी गलती माफी के लायक बिल्कुल भी नहीं है, लेकिन एक माँ दूसरी माँ से अपने बच्चों की जिंदगी माँग रही है," सीमा ने रोते हुए अपनी झोली सरला जी के आगे फैला दी।

"हाँ दादू-दादी, वापस घर चलिए, नहीं तो हम लोग भी आपके पास ही रहेंगे। हम लोग आपके बिना उस घर में नहीं रह सकते," दोनों फिर से रोते हुए सरला जी और महेश जी से लिपट गईं।

लेकिन कहते हैं न, माँ की ममता—मूल से ज्यादा प्यारा होता है। महेश जी और सरला जी का दिल बच्चियों की मासूमियत में पिघल गया और वे दोनों फिर से चुनमुन के लिए विशाल और सीमा के साथ वापस आ गए।
अब तो चुनमुन बहुत ज्यादा खुश हो गई और कुछ ही दिनों में वह पहले की तरह फिर से चहकने लगी, क्योंकि उन दोनों को दवा नहीं, दादू-दादी का साथ चाहिए था।


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