कल रात से ही बहुत तेज बारिश हो रही थी| ममता के मन के अंदर भी कुछ था जो बरसने के लिए तैयार बैठा था, पर ममता उसे बाहर आने देना नहीं चाहती थी | खिड़की के पास खड़े होकर बाहर बारिश की बूंदों को देखते हुए न जाने क्या सोच रही थी, तभी उसकी छोटी बहन पीछे से आकर कंधे पर धप से मारते हुए खिलखिला कर हंस पड़ी.. क्या सोच रही हो दीदी? तुम्हें तो खुश होना चाहिए, तुम्हारी शादी ऐसे घर में हो रही है जहां पर सास ही नहीं है| सोचो कितना मजा आएगा.. ससुराल जाते ही तुम्हारा हुकुम चलेगा और जीजाजी तुम्हारे गुलाम बने रहेंगे हा हा हा हा| लेकिन ममता कुछ बोली नहीं बस धीरे से मुस्कुरा दी|
बस 15 दिन ही तो बचे थे उसकी शादी को| ससुराल में बस पति , ससुर और एक ननंद थी,जिसकी अभी शादी नहीं हुई थी| वह कभी नहीं चाहती थी कि उसकी शादी ऐसे घर में हो जहां पर मां के आंचल की छाया ही ना हो| लेकिन उसके पति जब ग्रेजुएशन में थे तभी उसकी सास का देहांत हो गया था| उस समय उसकी ननद बस 15 साल की थी|
ममता जब शादी करके ससुराल आई तो उसने अपनी ननद को एक भाभी के साथ-साथ मां का प्यार देने की भी कोशिश की| लेकिन उसकी ननद रुचि ये सब के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थी| कमसिन उम्र में ही मां को खो देने वाली रुचि का अब तक अपने घर में एकाधिकार था| वह अपने घर में किसी और का अस्तित्व स्वीकार ही नहीं कर पा रही थी| आज तक सब कुछ उसके हिसाब से होता चला आ रहा था| उसे सब कुछ अपने हिसाब से ही देखना पसंद था|
बस इसी चक्कर में वह अपने भाभी को अपना ही नहीं पाई और वह सब कुछ करने लगी जो एक बुरी सास अपनी बहू के साथ करती है| ममता के काम में नुक्स निकालना हो या उसे नीचा दिखाना या उसके मायके वालों की बुराई करनी हो, किसी भी चीज़ में वह कमी नहीं करती| कमी थी तो बस दो मीठे बोल की जो ममता रूचि से सुनना चाहती थी| ममता का दिल तो दुखता लेकिन बिन मां की बेटी का वह दिल नहीं दुखाना चाहती थी| वह सब कुछ वैसे ही करती जैसा रूचि चाहती| उसके पति और ससुर सब कुछ देख समझ रहे थे | उन्होंने रुचि को समझाना भी चाहा लेकिन वह कुछ समझने को तैयार ही नहीं थी|
धीरे-धीरे दिन इसी तरह बीतते रहे और रूचि की शादी का दिन भी आ गया| भैया-भाभी ने मां-बाप की तरह सारे रस्म अदा किए| रुचि अपने ससुराल चली गई| विदाई में सब खुब रोए| रूचि के जाने के बाद ममता को उसकी कमी बहुत खलती थी| उसे रुचि की हिदायतें सुनने की आदत जो हो गई थी |
ममता ने फोन पर बात करने की कोशिश भी की लेकिन रूचि बस अपने पापा और भैया से ही बात करती| वो भी हालचाल लेकर फोन रख देते| ममता एक मां की तरह रूचि से सब कुछ पूछना चाहती थी.. कि वह अपने ससुराल में खुश है या नहीं...? सब उसकी इच्छा का आदर करते हैं या नहीं…? एक भाभी की तरह उसे छेड़ना चाहती थी कि उसका पति उसे ज्यादा सताता तो नहीं…? लेकिन रूचि, ममता के फोन पर आते ही फोन काट देती|
आज एक महीने बाद रूचि अपने ससुराल से वापस मायके आने वाली थी| उसके भैया लिवाने गए थे| ममता तो बहुत खुश थी| आरती की थाल सजाए उसका इंतजार कर रही थी तभी दरवाजे पर गाड़ी के हॉर्न का आवाज सुनाई दिया| ममता और उसके ससुर दोनों दरवाजे तक आ गए, आरती का थाल हाथ में ही था|
रुचि जैसी दरवाजे पर आई ममता ने उस की आरती उतारने चाही लेकिन यह क्या... रुचि सब कुछ अनदेखा करते हुए बस ममता के गले से लिपट गई और फूट-फूट कर रोने लगी| ममता के ससुर जी तो डर गए, आखिर क्या हो गया| वह पूछने लगे क्या हुआ रुचि बता तो सही, लेकिन रुचि तो बस आज अपने मन का सारा लावा बहा देना चाहती थी|
भाभी प्लीज मुझे माफ कर दीजिए मैं आज तक आपको समझ ही नहीं पाई जब ससुराल में मेरे साथ वैसा ही व्यवहार होने लगा तब मुझे अपना व्यवहार समझ में आया| मैंने आपको कितना सताया था न भाभी|
ममता बोली मत रो रूचि, मैंने तुम्हारी बात का कभी बुरा नहीं माना | मैं तो तुझे अपनी छोटी बहन जैसा ही समझती थी | लेकिन यह सब बात भुला कर क्या मेरी ननद अपनी भाभी की दोस्त बनेगी... सच्ची दोस्त? रुचि ने रोते-रोते हां में सर हिलाया और ममता से लिपट गई| ममता ने भी झट से उसे गले से लगा लिया| आज दोनों के बीच सच्ची दोस्ती हो गई थी, जिन्दगी भर के लिए|
- प्रियंका दुबे
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