दो दिन पहले मयंक एक शादी में सम्मिलित होने के लिए घर आया तो लुधियाना से डैडी के लिए एक जैकेट लेता आया।
मयंक ने नई जैकेट डैडी को देते हुए कहा - डैडी जी, आप सर्दी में सुबह 5 बजे से काम करने लगते हैं। ये जैकेट पहन लिया करो।
सलिल - पर बेटे मेरे पास तो हैं न!
मयंक - नई पहनिए न आप!
कुछ सोच कर सलिल हँसने लगा। मयंक हतप्रभ था कि कौन सा परिहास हो गया जो डैडी जी हँस पड़े। उसने पूछा - डैडी जी, नई जैकेट पहनने में हँसने की क्या बात हुई?
सलिल - क्या सचमुच जानना चाहते हो?
मयंक - अवश्य डैडी जी।
सलिल - तो सुनो। एक बार मैंने भी इसी प्रकार एक जैकेट अपने पिताजी के लिए खरीदा था। उन्हें देते समय .....
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सलिल - पिता जी, यह जैकेट आप के लिए लाया हूँ। आप सर्दी में सुबह पाँच बजे से काम करने लगते हैं।
पिताजी - लेकिन मैं तो पहने हुए हैं बहुत से कपडे.. ये देखो सबसे नीचे गर्म बनियान, उसके ऊपर गर्म कुर्ता और सबसे ऊपर यह कोट। सिर पर गर्म टोपी - मफलर और पैरों में गर्म मोजे व जूते।
सलिल - पर ये तो पुराने हैं औऱ हम भाई बहनों के पहने हुए भी हैं। लोग क्या कहते होंगे कि तीन तीन बेटे कमाते हैं और उनके पिताजी पुराने कपडे पहन रहे हैं।
पिता जी ने सलिल की तरफ देखा और कहा - लोग बेवकूफ हैं जो ऐसा सोचते हैं। मुझसे धनवान है कोई तो बताओ। सुनो, यह गर्म बनियान तुम्हारी उतरी हुई है, यह गर्म कुर्ता मंझिले गगन का है और यह लम्बा कोट सबसे छोटे पवन का है। टोपी बड़ी बिटिया धरा दे गई थी और मफलर छुटकी वह्नि ने। जब मैं इन्हें पहनता हूँ न तो मुझे तुम सबकी दूरी का आभास नहीं होता। लगता है कि सब बच्चे मेरे समीप हैं। इन वस्त्रों में तुम सभी की छुवन को मैं महसूस करता रहता हूँ। इनमें समाहित तुम सब की ऊर्जा को मैं इकट्ठे पाँच गुनी मात्रा में अपने अंदर महसूस करता हूँ। बेटे, मेरे साथी कहते हैं मैं इस आयु मेंभी कैसे इतना फिट रहता हूँ। अब यह राज़ तो नहीं बताया जा सकता न! लगाते रहें कयास अपना अपना। तुम लोग जो अपने पुराने कपड़े छोड़ जाते हो गरीबों के लिए उन्हें मैं पहन लेता हूँ और जो नये कपड़े मेरे लिए लाते हो उन्हें सभी जरूरतमंद लोगों को दे देता हूँ। समझ गए न।
कहकर पिता जी ने अपने आँसू पोंछ लिए।
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अपनी जैकेट उतार कर सलिल को पहनाते हुए मयंक ने कहा - डैडी जी, आप अपने पिताजी जितना धनवान तो नहीं हैं किंतु इकलौता होते हुए भी मैं आपको निर्धन तो नहीं बनने दूँगा।
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