Skip to main content

आह

 पलंग से नीचे पैर रखते ही वसुधा घुटनों पर हाथ रखकर कराह उठी. “अब तो लगता है, जल्दी ही काठी का मोहताज होना पड़ेगा. घुटने तो बिल्कुल ही काम से गए.

अच्छी-भली चलती-फिरती थी, पता नहीं क्या हो गया है?”

“अरे, पिछली बार आई थी, तब तो तुझे घुटने की कोई परेशानी नहीं थी. डेढ़ साल में अचानक क्या हो गया? आदित्य की शादी में तो तूने कितनी भागदौड़ की थी.” जया ने वसुधा की हालत देखकर दुख और अफ़सोस से कहा.

“हां, उम्रभर तो अच्छी रही, पर बस पिछले डेढ़ साल में ही पता नहीं क्या हो गया है. आदित्य की शादी के बाद से ही घुटनों में दर्द रहने लगा और अब तो पलंग से उठकर बाथरूम तक जाना भी मुश्किल हो गया है. दर्द के मारे जान निकल जाती है. इस डर से तो मैंने पानी पीना भी बहुत कम कर दिया है.” वसुधा जैसे-तैसे बाथरूम तक जाकर आई और फिर से पलंग पर बैठ गई. तब तक जया लहसुन डाला हुआ गरम तेल लेकर आई और वसुधा के घुटनों की मालिश करने लगी.

“अरे, जीजी ये क्या कर रही हो? तुम तो बड़ी हो, सेवा तो मुझे तुम्हारी करनी चाहिए.” वसुधा संकोच से भरकर बोली.

“तो क्या हुआ. जब मेरे घुटनों में दर्द होगा तो तुम तेल लगा देना. तकलीफ़ में क्या छोटा और क्या बड़ा.” कहकर जया ने वसुधा के घुटनों की मालिश कर दी.

वसुधा के बेटे आदित्य की शादी में दोनों बहनें मिली थीं, तब से डेढ़ साल हो गया. अब वसुधा ने बड़े आग्रह से जया को 4-5 दिन के लिए अपने घर रहने बुलाया था. जया कल रात में ही आई थी. दोनों बहनें देर रात तक बातें करती रही थीं.

सुबह के सात-साढ़े सात बजे थे. जया चाय बनाने किचन में जाने लगी, तो वसुधा ने उसे रोका कि बहू उठकर बना देगी, लेकिन जया आनन-फानन में अपनी, वसुधा की और वसुधा के पति सुरेश की चाय बना लाई.

“साढ़े सात हो गया है, लेकिन बहू के उठने का पता नहीं है. यह नहीं कि तुम आई हो, तो जल्दी उठकर चाय बना दे. रोज़ सुबह की चाय के लिए सात-साढ़े सात बजे तक राह देखते रहो.” वसुधा ने उलाहने के साथ कहा.

“आज आदित्य की छुट्टी है.

दस-बीस मिनट देर से भी उठ गए, तो क्या हुआ. और भई सुबह मुझे जल्दी चाय पीने की आदत है, तो मैं तो किसी के भरोसे नहीं रहती. अपनी और उनकी चाय ख़ुद बना लेती हूं और पेपर पढ़ते हुए या बगीचे का काम करते हुए गरम-गरम चाय का मज़ा लेती हूं.” जया ने कहा. “हमें अगर सुबह पांच बजे या और किसी ऐसे समय चाय पीने की आदत हो, जो आदत दूसरे के लिए सुविधाजनक ना हो, तो फिर हमें ये काम ख़ुद कर लेना चाहिए, बजाय दूसरे के बनाने का इंतज़ार करने और उस पर चिढ़ने के.” जया ने गंभीर स्वर में कहा.

पंद्रह मिनट बाद ही बहू यानी अनु रसोईघर में आई, तो चाय के बर्तन देखकर झेंप-सी गई.

“कोई बात नहीं अनु, चाय पी चुके तो क्या, तुम्हारे हाथ की बनी हुई फिर से पी लेंगे. अब बताओ सब्ज़ी क्या बनानी है.” जया ने कहा और अनु के मना करने पर भी फटाफट सब्ज़ियां निकालकर धोकर काटने लगी. तभी आदित्य भी किचन में आ गया. सुरेश भी वहां आ गए. अनु वसुधा को कमरे में ही चाय दे आई. बाकी सबने किचन में बैठकर साथ में चाय पी. जया नाश्ता और खाना बनाने में समान रूप से अनु की मदद कर रही थी, साथ ही पुरानी बातों का दौर और हंसी-मज़ाक भी चल रहा था. अनु भी खुलकर हंस रही थी. वसुधा के कमरे तक सबके हंसने-बोलने की आवाज़ें जा रही थीं. अनु की आवाज़ सुनकर वसुधा को आश्चर्य हो रहा था. अनु वसुधा से तो कभी इतनी बातचीत नहीं करती. महीनों से तो उसने उसे हंसते-मुस्कुराते भी नहीं देखा था.

जब सबके खाने का समय हुआ, तब वसुधा ने नहाने जाने की बात की. अनु ने सबका खाना परोसकर वसुधा के लिए नहाने का पानी रखा. कपड़े बाथरूम में रख दिए. नहाने के बाद वसुधा पूजा करने बैठी. अनु सबको खाना भी परोसती जा रही थी और वसुधा के लिए पूजा की तैयारी भी करती जा रही थी. कभी पानी देना, फूल लाकर देना, चंदन घिस देना, भगवान का चरणामृत, तुलसी चौरे में डालकर आना. पूजा के बाद भगवानजी का तौलिया धोकर सूखने डालना. फिर वसुधा को खाना खिलाकर तब अनु ने खाना खाया. खाने के बरतन आदि

समेटते हुए अनु को ढाई-तीन बज गए.

शाम को जया ने अनु और आदित्य को बाहर घूमने भेज दिया. दोनों का चेहरा खिल गया. महीनों के बाद वे घूमने जा पाए थे. हमेशा तो खाना बनाने, सुरेश और वसुधा को परोसने तक में ही इतनी देर हो जाती कि अनु मायूस होकर जाने से ही मना कर देती. अब भला रात में नौ बजे घूमने का समय ही कहां रह जाता. आज जया ने कहा, रात में वह कुछ भी बना लेगी और वसुधा तथा सुरेश को खिला देगी. जया ने देखा वसुधा को अनु का जाना अच्छा नहीं लगा.

“घर में मेहमान आए हैं और बहू यूं घूमने निकल गई.” वसुधा के स्वर में नाराज़गी थी.

“मैंने ही उन्हें भेजा है. वह तो जाने को तैयार भी नहीं थी और मैं कोई मेहमान थोड़े ही हूं.” जया ने कहा.

दूसरे दिन जया ने वसुधा को जल्दी नहाने और पूजा करने को कहा, ताकि वह भी सबके साथ बैठकर खाना खा सके. बड़ी अनिच्छा से वसुधा नहाने गई. उस दिन अनु काम से डेढ़ बजे ही फ्री हो गई, तो जया ने उन दोनों को पिक्चर देखने भेज दिया. दोपहर में आराम करने वसुधा और जया पलंग पर लेट गईं. वसुधा फिर घुटनों पर हाथ फेरते हुए कराहने लगी.

“पता नहीं, क्या जानलेवा बीमारी हो गई है. मैं तो अपनी ज़िंदगी से तंग आ गई हूं. न चल पाती हूं, न ही कहीं आ-जा पाती हूं. बस, इस कमरे में कैद होकर रह गई हूं.” वसुधा फिर अपने घुटनों का रोना लेकर बैठ गई.

“तुझे ‘सास’ नामक बीमारी हो गई है वसुधा. और कुछ नहीं.” अचानक जया बोल उठी.

“क्या?” वसुधा चौंक गई.

“हां, और यह बड़ी भयानक बीमारी है. एक बार यह रोग लग जाए, तो उम्रभर पीछा नहीं छोड़ती.” जया के स्वर में हल्का-सा व्यंग्य था.

“क्या कह रही हो दीदी? तुम भी न.” वसुधा चिढ़कर बोली.

“मैं ठीक कह रही हूं. तुझे कुछ नहीं हुआ है. मध्यमवर्गीय भारतीय घरों की सासों के साथ यही होता है. उम्रभर वे घर का सारा काम करती हैं, लेकिन जैसे ही बहू घर में आती है, सारा काम उसे सौंपकर पलंग पर बैठ जाती हैं और बीमारियों को न्योता देती हैं. अरे, मेनोपा़ॅज के समय हार्मोनल चेंजेस होते हैं, इस समय तो शरीर को व्यायाम की ज़्यादा ज़रूरत होती है, ताकि वह स्वस्थ रहे, लेकिन तुमने तो पलंग पकड़कर बीमारियों को न्योता दे दिया. उम्रभर घर का काम करने के बाद अचानक शरीर एकदम निठल्ला होकर बैठ जाए, तो क्या होगा. मशीन को भी बंद करके रख दो, तो उसमें भी ज़ंग लग जाती है, फिर यह तो शरीर है. पिछले डेढ़ साल में अपने शरीर की हालत देखी है, वज़न कम से कम पच्चीस किलो बढ़ गया है. अब घुटनों पर यह अतिरिक्त भार पड़ेगा, तो दर्द तो होगा ही. मोटापे से घुटने ख़राब और आगे मधुमेह को आमंत्रण और फिर कोसती हैं बेचारी बहू को कि इसके आने से ये सब हुआ.” जया ने खरी बात आख़िर बोल ही दी.

“सारी उम्र तो काम में पिस गई. अब इस उम्र में थोड़ा आराम कर लिया तो…?”

“अरे, अपनी गृहस्थी, अपने ही पति-बच्चों के लिए काम किया ना? सब करते हैं और तुमने कोई एहसान नहीं किया है. किसी दूसरे के घर का काम तो नहीं किया ना.” जया ने उसे डांट लगाई.

“हमारी सास भी तो बैठी रहती थी. हम भी तो अकेले ही सारा काम करते थे तो…” वसुधा कुछ और कहना चाहती थी, मगर जया ने बीच ही में उसे रोककर कहा.

“बस-बस. मैं तेरी मंशा समझ गई. वो ज़माना और था. कुछ लोगों की सोच संकुचित होती है, लेकिन हम भी वैसा ही नज़रिया रखें, तो उनमें और हममें फ़र्क़ ही क्या रह जाएगा. तेरी सास ने तुझसे काम करवाया, इसलिए तू भी अपनी बहू से बदला लेगी. यह ओछी प्रवृत्ति छोड़ दे. मैं तुझसे चार साल बड़ी हूं, लेकिन मेरा शरीर एकदम स्वस्थ है, क्योंकि मैं घर का काम करती रहती हूं. बहू को मदद भी हो जाती है और गृहस्थी संचालन में मेरी सशक्त भूमिका भी बरक़रार है. लेकिन तुम्हारे जैसी सास काम में मदद तो करेंगी नहीं, हां पलंग पर बैठे-बैठे गृहस्थी पर अपना आधिपत्य जताकर व्यर्थ विवाद और खीझ को बढ़ावा देंगी. सच है ‘खाली दिमाग़ शैतान का घर’ काम तो कुछ है नहीं, तो बहू को परेशान करने की व्यर्थ ख़ुराफ़ातें दिमाग़ में पैदा होती रहती हैं.”

“पर मैंने बहू को क्या परेशान किया?” वसुधा हैरानी से बोली.

“ये जो देर से नहाना है, देर से खाना खाने बैठना है, इसके पीछे की चालाकी मैं सब समझ रही हूं.” जया ने कहा तो वसुधा ने सकपकाकर सिर झुका लिया.

“देख, बहू के भी अपने सपने हैं. खाली बैठकर तेरा दिमाग़ उल्टी दिशा में चलने लगा है. तू जान-बूझकर उसे काम में उलझाए रखती है, ताकि वह आदित्य के साथ बाहर न जा पाए. तू अपने दिनों की कुंठा अब उस पर निकाल रही है. यह ठीक नहीं है. किसी दिन अगर वो दोनों अलग हो जाएं, तो फिर ये घुटनों का दर्द लेकर भी सारी गृहस्थी तुझे अकेले ही खींचनी पड़ेगी, तब उसे मत कोसना. शरीर तो काम करने के लिए ही होता है. रवींद्रनाथ टैगोर ने भी सत्तर वर्ष की उम्र में जाकर चित्रकारी सीखी और चित्र बनाना प्रारंभ किया. वे अगर उम्र की सोचते तो इतना नाम नहीं कमाते.” अंतिम बात करने तक जया का स्वर काफ़ी हद तक संयत हो चुका था.

वसुधा सोच में पड़ गई. जया दूसरी ओर मुंह करके सो गई. थोड़ी देर बाद वसुधा पानी लेने किचन में गई. जया ने चुपचाप देखा वसुधा बड़े आराम से चल रही थी. वह मुस्कुरा दी.

जया को सुबह सैर करने की आदत थी. दूसरे दिन वह सुबह उठी, तो देखा वसुधा उससे पहले ही उठकर बाहर जाने को तैयार थी. यह देखकर जया सुखद आश्चर्य से भर गई.

थोड़ी दूर ही सही, पर वसुधा जया के साथ पैदल घूमने गई. इतने दिनों से उसके पैर बैठे-बैठे अकड़ गए थे. अब जोड़ खुलने में थोड़ा व़क्त तो लगेगा. लेकिन जया को तसल्ली थी कि कम से कम वसुधा की बुद्धि पलटी तो.

घर जाकर चाय भी वसुधा ने ही बनाई. बर्तनों की खटपट सुनकर अनु दौड़ी-दौड़ी किचन में आई, तो वसुधा को काम करते देख आश्चर्यचकित रह गई. वह चाय बनाने जा ही रही थी कि जया ने इशारे से उसे मना कर दिया. आदित्य और सुरेश भी किचन में चले आए.

वसुधा ने सबकी चाय टेबल पर रखी. आज पूरा परिवार एक साथ बैठा था.

“लो अनु, तुम्हारी सास अब एकदम स्वस्थ हो गई है. अब वह सब काम कर सकती है. बस, अब तुम उस पर एक नई ज़िम्मेदारी डालने के लिए फटाफट उसे दादी बनाने की तैयारी शुरू कर दो.” जया ने कहा तो अनु शरमा गई और सब खिलखिलाकर हंस दिए.


Comments

Popular posts from this blog

दामाज बेटा बन जाता है पर बहू पराये घर की रहती है

  "अरे भाईसाहब (ननदोई) इतनी सुबह सुबह ?" "मम्मी पापा ने बुलाया था.कुछ जरूरी काम है." प्रमोद ने रश्मि को रूखा सा उत्तर दिया. "आ गये बेटे. बहू खड़े खड़े क्या बातें कर रही हो जाओ चाय बना लाओ." "जी मम्मी जी" रश्मि चाय बनाते हुए सोच रही थी ऐसी क्या बात हो सकती है जो भाईसाहब को सुबह बुलाया.कल रात उसे सास ससुर के कमरे से खुसुरफुसुर की आवाजें आ रही थी.मन में उठी किसी अनहोनी की आशंका को झटक कर वह चाय ले कर ड्रॉइंग रूम में गई. "बहू नाश्ता जल्दी बना देना.हमें काम से जाना है." "मम्मी जी कहाँ जाना है ?" "आकर बताते है तुम नाश्ते की तैयारी करो." रश्मि ने सास ससुर और प्रमोद को नाश्ता दिया.कुछ देर में तीनो तैयार हो कर चले गये और रश्मि घर के काम निपटाने लगी. ये थी रश्मि. शर्मा परिवार की इकलौती बहू.रश्मि की शादी रूपेश से हुए एक साल हो गया था.रूपेश की एक बड़ी शादीशुदा बहन कंचन और एक छोटी बहन काजल  जो कॉलेज में पढ़ती है.रूपेश दूसरे शहर में नौकरी करता था.उसकी इच्छा थी कि रश्मि  मम्मी पापा की देखभाल के लिए उनके साथ रहे.रश्मि ने भी रूपेश की इच्...

घर के लक्ष्मी का सम्मान

  "रवि... सुनिए ना... मुझे आपसे कुछ ज़रूरी बात करनी थी। वो मेरे पैरों में बहुत सूजन आ रही है और कमर में भी..." सुमन ने रात के सन्नाटे में, करवट बदलते हुए अपने पति रवि से कहने की कोशिश की। उसकी आवाज़ में एक दबी हुई कराह थी। रवि ने झल्लाहट में अपनी आँखों से बांह हटाई और मोबाइल की स्क्रीन पर समय देखा। रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे। "सुमन, प्लीज यार! अभी ऑफिस की टेंशन कम नहीं है जो तुम घर की रामायण शुरू कर देती हो? सुबह से शाम तक घर पर रहती हो, आराम ही तो करती हो। माँ बता रही थीं कि आजकल तुम दोपहर में दो-तीन घंटे सोती हो। फिर भी थकान? और ये पैरों में सूजन वूजन सब वहम है, थोड़ा वॉक किया करो। अब सोने दो, कल मेरी बहुत बड़ी प्रेजेंटेशन है।" रवि ने कंबल मुंह तक खींच लिया और दूसरी तरफ करवट ले ली। सुमन की आँखों में आए आंसू अँधेरे में ही जज़्ब हो गए। वह क्या बताती कि जिसे उसकी सास 'दोपहर की नींद' कहती हैं, वह असल में छत पर पापड़ और अचार सुखाने की चिलचिलाती धूप वाली मेहनत होती है। रवि को सच सुनना ही नहीं था, क्योंकि उसके लिए माँ का कहा पत्थर की लकीर था। सुमन ने चुपचाप एक दर्द न...

हकीकत

  सुमन के हाथों से शादी की मेहंदी भी नहीं उतरी थी कि उसके साथ सुधा जी ने उसे पूरी तरह से काम में झोंक दिया। सुबह से शाम हो जाती, लेकिन सुधा जी के काम तो मानो पूरे ही नहीं होते थे। जैसे ही सुमन आराम करने के लिए अपने कमरे में जाती, वैसे ही सुधा जी कहतीं, "बहू, जरा मेरे सिर में तेल की मालिश कर दो" या "कपड़े प्रेस कर दो"। कोई न कोई बहाना बनाकर पहले से ही तैयार रखतीं। सुमन कुछ भी नहीं बोल पाती और झट से काम पर लग जाती—आखिर नई-नई बहू जो ठहरी! सुमन के पति रोहित दूसरे शहर में नौकरी करते थे। शादी के लिए भी कम ही छुट्टियाँ मिली थीं, इसलिए शादी के आठ दिन बाद ही अपने काम पर लौट गए। तभी एक दिन… "अरे बहू, कब तक सोती रहेगी? कितना समय हो गया है, आज तुम्हारे ससुर जी ऑफिस के लिए भी निकल गए और तूने चाय तक नहीं बनाई। आगे से ध्यान रखना, समझ गई? ठीक चार बजे उठ जाना, क्योंकि तेरे ससुर जी सुबह छह बजे ही निकल जाते हैं। बहुएं तो काम के लिए ही तो लाई जाती हैं, एक लौटी बहू हो, नहीं बताएंगे तो कैसे सीखोगी? बड़े-बूढ़ों की कदर करना सीखो," सुधा जी नसीहत देतीं। "मुझसे गलती हो गई मांजी...