मुझे बारिश का मौसम बहुत सुहावना लगता है प्रायः चाय पीते हुए बारिश को देखने का लुप्त उठाया करती हूँ। । मिटटी की सोंधी खुशबु और बारिश की बूंदों की आवाज बहुत मधुर लगती हैं जब तेज बहाव के साथ पानी बालकॉनी में आता तो उस वर्षा के फुहार के छींटें , चेहरे पर पड़ते ही एक खुशनुमा सिरहन सी दौड़ पड़ती है।
लगभग तीन दिन से बरसात हो रही थी कभी मूसलाधार तो कभी बूंदा -बूंदी । अभी नाली और सड़कें सब लबालब बरसात के पानी से भरने लगी जो करीब 2 फुट था। गाड़ी ,दोपहिया वाहनों के टायर पानी में डूबे हुए थे। हवाएं ऐसी चल रही थी कि छाते को लोग सभांल नहीं पा रहे थे।
मैंने बालकॉनी में चेयर पर बैठते हुए अपनी घरेलू परिचारिकाओं को चाय बनाकर वहीँ पर देने को कहा।
जब सीमा ने चाय का कप पकड़ाया तो मैं थोड़ी उत्साहित होकर बोली --जाओ, तुमलोग भी यहीं चाय लेकर आ जाओ। जब हम इकठ्ठे बैठकर चाय पी रहे थे तो मैंने कहा -'सच में कितना अच्छा लगता है न !ऐसे चाय पीते हुए बारिश देखना ?'
दोनों एक -दूसरे का मुंह देखकर एक फीकी हंसी हंस कर बोली --'हाँ भाभी !
लेकिन मुझे उनकी हंसी कुछ खटक -सी गई। उत्सुकतावश दोनों से पूछा -ऐसे क्यों हंसी ?क्या हुआ तुमलोगों को बारिश का मौसम अच्छा नहीं लगता ?
तब नन्दनी बोली -भाभी ये बारिश का मौसम आप लोगों के लिए बहुत रोमांचकारी और सुहावना होता होगा पर हम गरीबों के लिए तो ये मौसम आफत का परकाला बनकर आता हैं। आपको तो पता है कि लोकल ट्रेनें सब बंद हैं। हम दोनों दो -दो बस बदलकर आपके यहां काम करने आतीं हैं। मेरा घर पक्का है तो क्या हुआ? कमरे और आंगन की छत बरसात में चूने लगती है। कमरे में एक ही पलंग है जिसपर बाप -बेटे सोते हैं ,वह भी पानी टपकने से भींग जाता है,मैं तो ऐसे ही जमीन पर गद्दा बिछाकर सो जाती थी लेकिन पानी टपकने से सारी जमीन पानी -पानी हो गई है। आंगन में एक कोने में पटरा बिछाकर रसोई का सामान रखा है तो टूटी खिड़की से पानी आकर सब समानों को पानी से तरबतर कर गया। ..
आंगन में इतना पानी भर जाता कि न तो खाना बना पाते है ना ही कोई सूखा कपड़ा बचा पाते है ,.. रात भर इधर से उधर खड़े रहकर टपकती छत से हम तीनों अपने को बचाते फिरते हैं। छत टपकती हे तो अपने को कैसे बचाएं ,भीगते रहने से ?.. भूख बहुत लगती है तब जैसे -तैसे अधकच्ची बनी खिचड़ी बनाकर खा लेते हैं यहां फिर यहां से मुड़ी सत्तू खरीदकर ले जाते हैं वहीं पेट भरने के लिए खा लेते हैं। हमारे मुहल्ले में घुटने भर पानी भर जाता है कैसे -करके आते हैं काम करने के लिए ये हमारा दिल ही जानता हैं। कहते हुए उसकी आंखें आंसुओं से भर गई थीं।
मैं उदास हो गई। तभी सीमा बोली -भाभी ,एक तो आप बिल्डिंग के चौथे माले पर रहती हैं ,दूसरे आपके यहां की सड़कों का पानी एक -दो घंटे में तुरंत निकल जाता है पर मेरे घर तो गोबरा जैसे कस्बे -देहात में है , जहां सबके घर कच्चे मिटटी के बने हुए हैं। गली में महीनों-महीनों भर बारिश का पानी भरा रहता है और उसमें बदबू भी मारने लगती हैं। उस गंदे पानी में लोग चलकर आते -जाते हैं। जिससे लोग बीमार भी पड़ जाते हैं.
मेरा तो नीचे का घर है ,जैसे ही बारिश होती है ,वैसे ही नाले का सारा गंदा पानी ,बरसात के पानी के साथ मिलकर मेरे मिटटी और खप्परैल से बने घर में घुस जाता है। वह भी घुटनों तक भर जाता है। घर का सारा सामान उस मटमैले ,बदबूदार गंदे पानी डूबने और तैरने लगता हैं। सारी रात ,सारा समय तो चीजों को यहां से वहां करने में ही बीत जाता हैं। एक तख्ता है,जिस पर हम सोते हैं , अब उस पर बचा -खुचा सामान रखे कि बैठें ? .. इसलिए न तो जमीन पर बैठ पाते है और ना ही खड़े। कोई सूखी जमीन ही नहीं बचती हमारे लिए ... खाने -पीने , बनाने ,पहनने ,बिछाने ओढ़ने का सारा सामान ,बर्तन ,कपड़े तो उस पानी में तैरने लगते हैं। कोई भी कपड़ा सूखा नहीं मिलता। ऊपर से खप्परैल का मकान नीचे कच्ची -गीली मिटटी का फर्श !... अब क्या तो खाएं ? क्या पहने ?.. कहां पर सोए ,और क्या ओढे क्या बिछाएं ?..और उसपर रात भर यह डर लगता है कि उस पानी में कहीं सांप या विषैले जीव -जंतु नहीं आ गया हैं ?.. घर के बाहर भी तालाब ही लगता है। आपके यहां तो कितना भी पानी जमा हो वो दो -तीन घंटे में निकल जाता है और सड़क सूख जाती है। हमारे यहां तो महीनों बीत जाते हैं। पानी भरा ही रहता है उसी घुटनों से ऊपरतक भरे पानी में लोग अपने कपड़े ,उठाकर काम पर आते -जाते हैं जिसके पास नाव है वह नाव से आता -जाता है अब तो लोग ऑटो की तरह नाव चलाने लगे हैं जिसका भाड़ा 10 तो कभी 20 रुपया लेते हैं
मैंने अफ़सोस भरे स्वर में पूछा -- 'तो फिर तुमलोग क्या खाते हो ?और सोते कैसे हो ?'
सीमा बोली --'खाने के लिए मुड़ी भी मिल जाए तो बहुत है और सोने के लिए ट्रेन के किनारे या अपनी नौका पर । आपको तो पता है मेरा आदमी(पति ) तालाब से मछली पकड़ने का काम करता है।इसलिए हमारे पास नाव है। नाव में बैठकर पहले स्टेशन आती हूं, फिर बस अड्डे जाकर दो -दो बस बदलकर ,कैसी -कैसी तकलीफ झेलते हुए काम करने आती हैं। इस पापी पेट की आग बुझाने के लिए हमें क्या -क्या नहीं करना पड़ता। अभी हमारी गली में पानी जमा हुआ है तो सभी नांव में बैठकर ही बस अड्डे तक आते -जाते हैं. अब मेरा आदमी भी मछली नहीं पकड़कर ,लोगों से भाड़ा लेकर स्टेशन या बस अड्डे तक पहुंचाने -लाने का काम करता हैं। पता नहीं पानी कब निकलेगा ? 'कहते हुए उसका गला भर्रा गया .वह अपने पल्लू से भर आई आंखों को पोंछने लगी।
यह सब सुनकर मेरे तो होश ही उड़ गए ,इतने दूर का और इस नजरिये से तो मैंने कभी सोचा ही नहीं था कि अमीरों के लिए जो मौसम चाय -पकोड़े खाते हुए बारिश का लुफ्त लेने का हैं वहीं मौसम गरीबों के लिए एक आफत ,विभीषिका का पर्याय बन जाता हैं !
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