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नेकी कर दरिया में डाल

 “पापा, आप थोड़ा खुद को बदलें। कोई भी आपको लूट कर चला जाता है,” बेटे ने एक ग्राहक का सामान पैक किया।

“बेटा उस बेचारे ने कुछ नहीं कहा था, मैंने खुद ही उसे रुपये दिये थे,” विनोद ने समझाया।

“हाँ, सही है… आ बैल मुझे मार!” बेट ने व्यंग्य किया।

सही ही तो कह रहा है बेटा, विनोद ने मन ही मन सोचा। जब से चंदू को ढाई हजार रुपये दिए थे, वह गायब ही हो गया था। वरना रोज अपना पेठे का ठेला लेकर आता था  और आधा घंटा दुकान के सामने ही खड़ा होता था। उस दिन जाने क्यों विनोद ने उससे बात की। दुकान पर पानी पीने आया था चंदू, सत्रह-अठारह साल का लड़का; तो विनोद ने उसे समझाया था—

“खाने-पीने का सामान ऐसे खुला नहीं रखना चाहिए। देखो! कितनी मिट्टी-धूल बैठती है सामान पर, और मक्खियाँ भी! तुम इतना अच्छा पेठा सजाते हो, मगर खुले सामान की वजह से बिक्री नहीं हो पाती तुम्हारी"।

“क्या करूँ, बाऊजी?” उसने भोलेपन पूछा।

“एक शीशे का बक्सा बनवा लो, और पेठा उसमें रखो,” विनोद ने सलाह दी।

“बड़ी मुश्किल से गुज़ारा हो रहा है, चार महीने पहले बापू गुजर गए; पैसे हैं नहीं मेरे पास," वह मायूसी से बोला।

बस, भावुक हो गया विनोद। जेब में ढाई हजार रुपये थे, निकाल कर पकड़ा दिए। रुपये लेते हुए चंदू की आँखों में आँसू थे।

वो दिन और आज का दिन, दिखा ही नहीं चंदू। आज उसके बेटे ने भी सुना दिया, आ बैल मुझको मार। लेकिन विनोद को बस कहावत याद थी, ‘नेकी कर दरिया में डाल’। बस उसके दिमाग में आते ही मुस्कुरा कर उठा—

“बता क्या-क्या सामान लाना है? मैं ले आता हूँ,” विनोद ने खुदरा बाज़ार जाना था।

तभी चंदू अंदर आया और उसके पैर छूने लगा। विनोद हैरान रह गया।

“बड़ी लंबी उम्र है तेरी चंदू, अभी तुझे ही याद कर रहे थे हम,” विनोद ने बेटे की तरफ देखा, जो आश्चर्य से चंदू को पापा के पैर छूते देख रहा था।

“मुझे पता है, आपको लग रहा होगा कि मैं आपसे पैसे लेकर भाग गया। लेकिन ऐसा नहीं है, आइए देखिए”।

वह बड़े ही स्नेह से विनोद का हाथ पकड़ कर दुकान से बाहर ले आया। बाहर उसका ठेला खड़ा था, साफ-सुथरा, पेठा शीशे के बाक्स में सजा हुआ था, और ठेले पर पैक्ड-डिब्बे भी थे। कायाकल्प कर दिया था उसने।

“बाऊजी, एक-दो दिन तो शीशे का बाक्स बनवाने में लग गए। फिर तो जहाँ मैं खड़ा होता हूँ, छोटा बाजार में, मेरा पेठा वहीं बिकने लगा। इधर आने में तो चक्कर भी उल्टा लेना पड़ता है। आज तो बस आपके पैसे वापस करने आया हूँ,” उसने जेब से 2500 रुपये निकाल कर पकड़ा दिए।

“चंदू, तूने तो कमाल कर दिया भई, मैं बहुत खुश हूँ,” विनोद ने भरे गले और भरी आँखों से कहा।

“ये आपके लिए लाया हूँ मैं, आगरा का स्पेशल पेठा,” उसने एक गिफ्ट-पैक विनोद को पकड़ाया, तो उसकी आँखों में भी खुशी के आँसू झलके।

दुकान पर खड़ा विनोद का बेटा, ज़िंदगी की खुशी का ये 'बेहतरीन सबक' भी सीख रहा था।


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