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प्रचलन

 गृह प्रवेश के बाद माँ ने बिंद्रा को आराम करने बैठक में बैठा दिया। दादा दादी की इच्छा थी कि वो अपने पोते की शादी गांव में करें और पिता जी ने उनकी बात मान भी ली। अमन अपनी शादी धूम धाम से बड़े होटल में करना चाहता था। बिंद्रा के पिता भी ये ही चाहते थे पर दादा दादी की जिद्द के आगे सब को झुकना पड़ा। मन मार कर अमन गांव के सारे रीति रिवाजों को बेमन से निभाता रहा।

बिंद्रा को अकेला देख बैठक में जा पहुँचा। बिंद्रा के पास बैठ बात करने ही वाला था कि दादी आ गई बोली," बेटा थोड़ा सब्र रख ले बहु को कुछ रस्में और करनी है।" अमन चुपचाप चला गया और पैर पटकता घर की छत पर जा पहुंचा।

शाम तक सभी रस्में पूरी हो गई। अमन और बिंद्रा को एकांत में मिलने का अवसर प्राप्त हुआ। अमन बोला," क्या यार तुम्हारे पापा ने किस बात का बदला लिया। दादा जी की बात मान कर। यार दोस्तों के बिना क्या मज़ा आया यहाँ। सब शिकायत करेंगें।"

बिंद्रा ने लपक कर अपना फ़ोन उठाया और अमन को दिखाने लगी, " देखो पूरे सोशल मीडिया पर हमारी शादी धूम मचा रही है। यू ट्यूब पर पूरी शादी लाइव देखी लोगों ने। फेसबुक, इंस्टाग्राम पर तुम्हारे और मेरे दोस्तों ने कैसे कमेंट्स भेजे हैं देखो देखो मुझे तो बहुत मज़ा आया। बिंद्रा बोली, "अब हम एक दूसरे के साथ इतने समय से हैं शादी में कोई नयापन भी तो चाहिए था बस यही सोंच कर सब प्लान किया।

अमन बिंद्रा की बात सुन हैरान रह गया।," तो तुमने मुझे ये सब बताया क्यों नहीं।

बिंद्रा बोली, " इसमें बताने वाली क्या बात है तुम्हें ये तोहफा दिया है मैंनें शादी का और अपनी बांहे गले में डाल दी।"

तभी दादी वहां आ पहुँची और बोली, "बेटा अब से तू ऐसे तोहफे लेने के लियें ख़ुद को तैयार कर ले। तेरी बहु बहुत खुश रखेगी तुझे। दोनों फलों फूलों।"

दादी तो कह कर और शादी करा कर निश्चित हुई पर अमन भौचका सा बिंद्रा को देख रहा था। सोशल मीडिया से मुझे सबसे अधिक चिढ़ है, बिंद्रा ने यह जानते हुए भी मुझे एक तरह से धोखा दिया है। तिलमिला कर रह गया अमन क्योंकि अब बात उसके हाथ से निकल चुकी थी। दादा, दादी, मां पापा सब को इसने अपने खेल में कितनी चतुराई से शामिल कर लिया। बिंद्रा को नए सिरे से समझना होगा। सोशल मीडिया का भूत बिंद्रा के सर से उतारना होगा।

शादी के बाद प्रेमी प्रेमिका में तो बेहतर सामंजस्य होना चाहिए परन्तु अमन को शुरुआत से ही कुछ डर लगने लगा।

मन ही मन अमन बिंद्रा के इस व्यवहार पर विचार करने लगा। इस ग़लती को वह माफ़ भी कर देता परन्तु आज की घटना से तो वो बहुत परेशान हुआ।

माँ व पापा और उस को बताए बिना बिंद्रा ने अपने दोस्तों को घर डिनर पर बुला लिया। माँ से पूछे बिना नॉनवेज खाना होटल से मंगा लिया। अमन के माता पिता भले ही अमीर हैं ऊंची सोसायटी में गिने जाते हैं पर वे बहु के इस व्यवहार को सह नहीं पाए, नॉनवेज खाना हमारे घर में ज़रूर माँ को बहुत बुरा लगा होगा तभी तो दोनों अपने कमरे का दरवाज़ा बंद कर बैठ गए।

पार्टी में अमन चेहरे पर झूठी हँसी लिए शामिल हुआ क्योंकि उसे अपने सम्मान की चिंता थी। पार्टी ख़त्म होते ही गुस्से में बिंद्रा से पूछा, "आज की पार्टी का भी सरप्राइज़ तोहफा दिया तुमने।"

"नहीं ये तो मेरे दोस्त पीछे पड़े थे तो बुला लिया उन्हें।" सहज भाव से जबाब देते हुए बिंद्रा अमन की ओर बढ़ी।

अमन ने उसे दूर धकेलते हुए कहा, "बिंद्रा शादी के बाद क्या पति पत्नी को आपसी सहमति से काम नहीं करने चाहिये।"

"हाँ बिल्कुल करने चाहिए पर तुम ऐसा क्यों बोल रहे हो।" बिंद्रा बोली।

"तो आज के प्रोग्राम के लियें मुझ से पूछना तो दूर पहले बताने की भी ज़रूरत नहीं समझी। शादी भी तुमने अपने तरीके से करा ली।" अमन ने गुस्सा दबाते हुए पूछा।

"ओहोहो ! मेरी ख़ुशी में तुम ने खुश होना छोड़ दिया अमन, शादी से पहले तो तुम्हें मेरी सभी बातें बड़ी अच्छी लगती थीं पर अब..."

"अब क्या बिंद्रा अब हमें एक साथ जिंदगी बितानी है। एक दूसरे का साथ पूरी जिंदगी देना है। शादी से पहले कुछ समय ही साथ होतें थे अब तुम्हें समझना होगा। माँ पापा का भी ख़्याल रखना होगा।" अमन की आवाज़ तेज़ होने लगी।

बिंद्रा पैर पटकती अपने कमरे में चली गई। माँ पापा कमरे में बैठे सब सुनते रहे। निराश अमन दूसरे कमरे में जा सोने का प्रयास करने लगा।

बिंद्रा एक बड़ी कंपनी में ऊंची पोस्ट पर थी उसका अपना समाजिक रुतवा था। उस की सोंच बहुत मॉर्डन थी। वो अमन के आगे झुकने वाली नहीं थी। शादी से पहले कोई भी लड़का लड़की एक दूसरे की असलियत समझ ही नहीं पाते भले रोज मिलें पर एक औपचारिकता तो रहती ही है।

सुबह माँ चाय ले बिंद्रा के पास आई और बहुत स्नेह से समझाने लगीं, " बेटा शादी एक बंधन होता है पति पत्नी के बीच ऐसा सम्बंध होना चाहिए जिसमें एक दूसरे को अपमान महसूस न हो कुछ तुम अपनी करो कुछ पति की मानों।

परन्तु बिंद्रा बोली, "मैं कोई ना समझ नहीं हूँ माँ आपको हमारे बीच आने की ज़रूरत नहीं और जो समझाना है वो अमन को समझाओ।

अपना सा मुँह ले माँ वापिस जा रही थी तभी अमन ने रोक कर माफ़ी मांगी बोला," माँ शायद मुझ से ग़लती हुई बिंद्रा को ठीक से समझ नहीं पाया।"

"तो फिर अभी क्या बिगड़ा है, तलाक लो मुझ से।"

बिंद्रा बोली। अमन अब बिंद्रा को मनाने लगा और माँ नाश्ता बनवाने लगी।

माँ और पापा ने कुछ दिन बाद ही अपने दूसरे घर में शिफ़्ट करने का फैसला अमन को सुनाया। अमन बहुत दुःखी था पर कुछ कह ही नहीं पाया। अपना और बिंद्रा का रिश्ता बनाये रखने के लियें चुप रह गया। तीन महीने भी नहीं बीते कि आज डाक से बिंद्रा ने तलाक के पेपर भेज ही दिये। अब अमन चुप नहीं रह पाया। दोनों दफ़्तर जाने को तैयार हो रहे थे। अमन ने पेपर साइन कर बिंद्रा को पकड़ा दिये।

वहाँ से निकल अपने माँ पापा के पास जा ख़ूब रोया। अपनी ग़लती पर शायद पछता रहा था तभी माँ ने बोला, "बेटा आजकल की आधुनिक सोंच वाले युवा तलाक जैसी छोटी सी बात पर उदास नहीं होते ये तो आज का प्रचलन हो गया है।" निराश अमन माँ के सीने से चिपट गया उसे लगा बचपन लौट आया है जब ग़लती हो जाने पर माँ से चिपट जाता था और माँ उसे माफ़ कर देती थी।


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