माँ, मोहन भैया अभी तक नहीं आये, राखी का मुर्हुत निकला जा रहा है?"
"जरा सब्र कर आता होगा, आज तक कभी लेट हुआ है?"
"वो तो है| "
मोहन भैया, मेरे राखी भाई| वह मेरे भाई अंश के बचपन के दोस्त हैं| अक्सर हमारे घर आते रहते थे, एक बार राखी वाले दिन वह हमारे घर आये, उन्हें भैया से कुछ काम था| वो कुछ उदास लग रहे थे मैंने उसकी उदासी का कारण पूछा तो बोले उसकी बहन नहीं है राखी बांधने के लिए|
"बस इतनी सी बात? मैं हूं न आपकी बहन" और मैंने उन्हें भी राखी बांध दी| उस दिन से यह सिलसिला चला आ रहा है, उन्होंने आज तक इसे मिस नहीं किया|
"सॉरी सॉरी देर हो गई" उन्होंने आते ही बोला| मीरा अपने ख्यालों से बाहर आई|
"कहाँ थे अब तक?" मीरा ने झूठमूठ का गुस्सा दिखाते हुए बोला |
"क्या करूं? ट्रैफिक ही इतना था| चल चल राखी बांध, अंश कहाँ है?"
मीरा ने दोनों को राखी बांधी "लाओ मेरा गिफ्ट" हाथ आगे करते हुए बोली|
दोनों भाईयों से गिफ्ट लेकर वह अपने कमरे में चली गई|
कुछ समय बाद मीरा की शादी तय हो गई| मीरा की शादी में मोहन ने भाई होने का पूरा फर्ज निभाया| कुछ समय बाद मोहन और अंश की भी शादी हो गई| मोहन शादी के बाद भी बराबर अपनी पत्नी को साथ ले कर राखी बधंवाने आता रहा| आपनी भाभी से ज्यादा उसकी मोहन की पत्नी रावी से पटती | रावी भी उसे अपनी छोटी बहन मानती | अंश और उसकी पत्नी पूजा से ज्यादा मोहन और रावी उसके ज्यादा करीब आ गए| मीरा के बच्चों को भी वह बहुत प्यार करते|
"मोहन भैया जल्दी सिटी होस्पिटल आ जाओ इनका एक्सिडेंट हो गया" रोते हुए मीरा ने बोला|
न जाने क्यों उसकी उगलियों ने अंश का नम्बर न मिलाकर मोहन का नम्बर दबा दिया|
मोहन और रीवा थोड़ी देर में पहुंच गए|
"मीरा क्या हुआ?" मोहन ने पूछा|
मीरा बस रोये जा रही थी, उसके मुंह से आवाज नहीं निकल रही| मोहन ने रीवा को इशारा किया| रीवा ने मीरा को सभांला और मोहन डॉक्टर के पास गया|
"डॉक्टर साहब अब रोहित कैसे हैं?"
"खतरे से बाहर हैं, लेकिन उन्हें दो हफ्ते तक होस्पिटल में रहना पड़ेगा| "
तब तक अंश और उसकी पत्नी पूजा भी आ गये| शायद मोहन ने फोन किया था|
थोड़ी देर खाना पूर्ति करके अंश और पूजा ने बच्चों को अपने साथ ले जाने के लिए कहा पर मोहन ने यह कहा कि तुम दोनों ऑफिस जाते हो और अकंल आंटी की तबियत ठीक नहीं रहती मना कर दिया| इसलिए बच्चों को हम ले जाते है| रीवा को बच्चों को अपने घर ले जाने को कहा और खुद मीरा के साथ रहा|
मीरा को कुछ होश ही नहीं था मोहन ही दवाइयों, डॉक्टर से बात, बिल आदि काम कर रहा था| दो हफ्ते बाद मोहन और मीरा रोहित को घर लाये| रोहित काफी अच्छा हो गया | फिर भी चलने के लिए उसे सहारे की जरूर थी| रावी बच्चों को घर ले आई | बच्चे अपने पापा को देख कर बहुत खुश हुए|
मोहन और रावी रोज उनसे मिलने आते साथ में जरूर का सामान ले आते| रावी शाम का खाना भी बना जाती| कभी कभी अंश और पूजा भी आते पर नाम के लिए|
एक दिन रोहित ने मोहन से कहा'" भैया मीरा बता रही थी आपका बहुत खर्चा हो गया है आप मुझे बता दीजिये हम दे देगें
"मीरा तू बहुत बड़ी हो गई है अगर अंश होता तो भी ऐसा करती ?शायद तूने मुझे दिल से अपना भाई नहीं माना| "
मीरा रोते हुए बोली "ऐसा मत बोलो भैया, आप तो अपनों से भी अपने हो | अपने अंश भैया से ज्यादा मेरा ख्याल रखा| मेरे सुख दुख में हमेशा साथ खड़े रहे| अपने भाई के सारे फर्ज निभाने आपका और भाभी का एहसान तो हम कभी चुका ही नहीं सकते" मोहन के गले लगते हुए "आप नहीं होते तो पता नहीं मैं क्या करती| "
मोहन अपने आसूं छुपाते हुए "अच्छा जा हम सब के लिए चाय बना कर ला| "
चाय बनाते हुए मीरा सोचने लगी ऐसा बन्धन जो मजाक में बना था आज मेरे लिए सबसे खास है| सच में दिल से मानो तो खून के रिश्तों से बढ़ कर भी रिश्ते होते हैं|
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