Skip to main content

मुंह दिखाई

 चावल भरे कलश को आंगन में बिखेर कर कृतना ने दुल्हन के रूप में ससुराल में पहला कदम रखा था.चाची सास सन्ध्या देवी ने कृतना के दोनों पांव कुमकुम भरी थाल में रखवाए.कुमकुम रंगे पैरों से कदमो के निशान बनाती कृतना जैसे जैसे घर के अंदर आ रही थी वेसे वेसे सारे मेहमान तालिया बजा रहे थे.

ननद सुलोचना के दोनो बच्चों ने मामी के स्वागत के लिए पुष्प बरसाने का इंतजाम किया था.मामा मामी पर अचानक सुगन्धित फूलो की बारिश से एकदम उत्सव सा माहौल हो गया था.

पर घर की बड़ी बहू देवकी वहां क्यों नही थी?वो आखिर क्यों अपने कमरे के दरवाजे की ओट से ही देवरानी के गृह आगमन की रस्मों को देख आनन्दित हो रही थी?

देवकी परिवार की बड़ी बहू थी.घर के बड़े बेटे धर्म से ब्याह कर ऐसे ही करीब आठ साल पहले वो घर मे आयी थी.सासु मां तो थी नही .सन्ध्या चाची ने ही  धूमधाम से सारी रस्मे करवाई थी.

देवर और ननद- ननदोई कितना झूमे नाचे थे उस दिन.ससुराल में मिले प्यार दुलार से देवकी बेहद खुश थी. बड़ी बहु के रूप में उसने घर की सारी जिम्मेवारियों को जल्द ही सम्भाल लिया था. घर परिवार का ख्याल रखने के संग संग देवकी पति धर्म को कारोबार के हिसाब किताब में भी मदद करने लगी थी.

अभी सालभर ही तो हुए थे ब्याह को.सब कुछ कितना अच्छा चल रहा था.तभी वो मनहूस दिन आया था जब धर्म की जीप को रोडवेज़ की अनियंत्रित बस ने जोर से टक्कर मार दी थी.धर्म की मौके पर ही मौत हो गई थी.

परिवार और विशेषकर देवकी पर दुखो का पहाड़ टूट पड़ा था.देवकी के लिए पलभर में सबकुछ शून्य में बदल गया था.

पर देवकी को अहसास था कि धर्म की छोड़ी हुई जिम्मेवारियों का निर्वहन उसे ही करना है.पड़ोसी और रिश्तेदारों का आना जाना लगा हुआ था.तभी देवकी ने पहली बार अपने लिए अभागी शब्द किसी के मुंह से सुना था.

फिर तो समय के साथ न जाने कितने लोगों ने उसे अभागी कह दिया था. उसे भी अब धीरे धीरे लगने लगा था कि वो अशुभ है.इस घर के किसी भी मंगल कार्य मे उसकी उपस्थिति नुकसान दायक है.

गीत संगीत और सजने सँवरने की शौकीन देवकी ने अपनी सारी चंचलाहट को भस्म कर दिया था.रूखा सूखा भोजन,श्वेत वस्त्र और जमीन पर चटाई बिछाकर सोना.

बस किसी तरह देवर वीर के विवाह के साथ ही स्वर्गवासी पति धर्म की सबसे बड़ी इच्छा उसे पूरी करनी थी.देवकी ने तय किया था कि देवरानी को सारी जिम्मेवारियां सौप वो हमेशा के लिए किसी विधवा आश्रम में चली जायेगी ताकि घर से उसका अशुभ साया दूर हो जाये.

आज ये देख कितनी प्रसन्न थी वो कि वीर कृतना के रूप में प्यारी सी देवरानी और घर की नई मालकिन ले आया था.कृतना के गृह प्रवेश की शुभ घड़ी में वो उसके सामने अपनी सुनी मांग लेकर खड़ी नही होना चाहती थी.इसलिए कमरे के दरवाजे की ओट से ही वो अपने धर्म के सपने को पूरा होते देख बेहद खुश थी.

"भाभी आप थक गई होगी.कमरे में जाकर थोड़ा आराम कर लीजिये . शाम मोहल्ले की महिलाएं आएगी घर पर फिर देर तक बहुत सारी रस्मे पूरी करनी पड़ेगी."

ननद दिव्या ने भाभी कृतना के दोनों कंधो पर अपने हाथ रखकर कहा था.

रात भर मण्डप में बैठे बैठे थक कर चूर हो चुका वीर कमरें के बेड पर बेसुध पड़ गया था. पर कृतना तो एक अजीब सी बैचेनी से घिरी थी. जिस देवकी भाभी की तारीफ करते करते वीर थकता नही था वो कही नही दिखी थी उसे.

कॄतना को सबकुछ जानने में समय नही लगा और वो सीधे जेठानी जी के कमरे में चली गयी थी जिस के अंदर कदम रखना देवकी ने हर किसी के लिए वर्जित रखा हुआ था. कमरे की दीवारें अंदर से बदरंग हो चुकी थी. एक चटाई , कुछ पुराने चादर -कम्बल.लकड़ी की पुरानी सी आलमारी जिसमे उसके कपड़े ,पुरानी तस्वीरों वाली अल्बम और कुछ पुस्तके.बस यही सारा संसार बन गया था देवकी का.

आलीशान घर के उस कमरे को देख कृतना ने देवकी की दिनचर्या का अंदाजा लगा लिया था.

उसने वीर के फ़ोन की गैलरी में धर्म भैया और देवकी भाभी की विवाह की तस्वीरे देखी थी.बेहद चंचल और खूबसूरत दिखने वाली जेठानी का आज का रूप देख उसे अपनी आंखों में विश्वास नही हो रहा था.

"अरे तुम इस कमरे में क्यो आ गयी?किसी ने रोका नही तुम्हे कृतना?अभी अभी तुम्हारा घर मे दुल्हन के रूप में प्रवेश हुआ है.ऐसे में इस अशुभ कमरे में क्यो चली आयी."

देवकी की आवाज में नाराजगी के साथ साथ वात्सल्य का भाव था.मानो वो अपनी बेटी को डांट कर समझा रही हों.

कृतना  देवकी की बेबसी को बस महसूस कर रही थी.कैसे समाज और दुनिया के लोग एक बेकसूर महिला पर अभागन का टैग लगाकर उसकी जिंदगी को बर्बाद कर देते हैं.कई बार ये समाज पति के मृत शरीर के संग पत्नी की आत्मा को जला देता है.

वो बस आगे बढ़कर माँ,बहन और सखी के रूप में दिख रही जेठानी को गले से लगाना चाहती थी पर देवकी पीछे हट उसे उसके साये से दूर रहने का इशारा किये जा रही थी.कृतना की जिद्द के आगे देवकी का विरोध कमजोर पड़ चुका था.नई नवेली दुल्हन ने कमरे के कोने में दुबकी अपनी जेठानी को गले से लगाया तो उसे लगा जैसे देवकी कब से इस प्रेम और आत्मीयता की राह तक रही थी.

पता नही कब तक देवकी की आंखे अश्रु बर्षा करते रहें ...कृतना भी देवकी को जी भर कर रो लेने देना चाहती थी.

आहिस्ता आहिस्ता सारा परिवार देवकी के कमरे में आ चुका था.

"भाभी मैं आज आपको तैयार करूंगी अपने हाथों से....और इसी कमरें में आप मेरी मुंह दिखाई की रस्म पूरी करवाओगी मेरी माँ,सास और जेठानी बनकर.

सारे रिश्तेदार और समाज आज देख लेगा कि इस परिवार की मालकिन आप हो और आप अशुभ नही बल्कि इस परिवार की खुशियां आप मे निहित हैं."

कृतना के दृढ़ और आत्मविश्वास भरे शब्दो का असर देवकी के मुख मण्डल पर दिखने लगा था.मुरझायी पत्तियों में जैसे हरापन लौट आने को था.कृतना के पीछे अब पूरा परिवार खड़ा था.

शाम हुई तो पड़ोस की महिलाओं का आना शुरू हो गया था.देवकी के कमरे में मुंह दिखाई की रस्म अदायगी का इंतजाम देख सब दंग थे.

मुंह दिखाई जरूर छोटी बहू की थी पर सारा समाज  डरी सहमी और छुपी छुपी सी रहने वाली देवकी के लौटे आत्म विश्वास को देख रहा था और देवकी अपनी दृढ़ संकल्प देवरानी को निहारे जा रही थी.

"

चावल भरे कलश को आंगन में बिखेर कर कृतना ने दुल्हन के रूप में ससुराल में पहला कदम रखा था.चाची सास सन्ध्या देवी ने कृतना के दोनों पांव कुमकुम भरी थाल में रखवाए.कुमकुम रंगे पैरों से कदमो के निशान बनाती कृतना जैसे जैसे घर के अंदर आ रही थी वेसे वेसे सारे मेहमान तालिया बजा रहे थे.

ननद सुलोचना के दोनो बच्चों ने मामी के स्वागत के लिए पुष्प बरसाने का इंतजाम किया था.मामा मामी पर अचानक सुगन्धित फूलो की बारिश से एकदम उत्सव सा माहौल हो गया था.

पर घर की बड़ी बहू देवकी वहां क्यों नही थी?वो आखिर क्यों अपने कमरे के दरवाजे की ओट से ही देवरानी के गृह आगमन की रस्मों को देख आनन्दित हो रही थी?

देवकी परिवार की बड़ी बहू थी.घर के बड़े बेटे धर्म से ब्याह कर ऐसे ही करीब आठ साल पहले वो घर मे आयी थी.सासु मां तो थी नही .सन्ध्या चाची ने ही  धूमधाम से सारी रस्मे करवाई थी.

देवर और ननद- ननदोई कितना झूमे नाचे थे उस दिन.ससुराल में मिले प्यार दुलार से देवकी बेहद खुश थी. बड़ी बहु के रूप में उसने घर की सारी जिम्मेवारियों को जल्द ही सम्भाल लिया था. घर परिवार का ख्याल रखने के संग संग देवकी पति धर्म को कारोबार के हिसाब किताब में भी मदद करने लगी थी.

अभी सालभर ही तो हुए थे ब्याह को.सब कुछ कितना अच्छा चल रहा था.तभी वो मनहूस दिन आया था जब धर्म की जीप को रोडवेज़ की अनियंत्रित बस ने जोर से टक्कर मार दी थी.धर्म की मौके पर ही मौत हो गई थी.

परिवार और विशेषकर देवकी पर दुखो का पहाड़ टूट पड़ा था.देवकी के लिए पलभर में सबकुछ शून्य में बदल गया था.

पर देवकी को अहसास था कि धर्म की छोड़ी हुई जिम्मेवारियों का निर्वहन उसे ही करना है.पड़ोसी और रिश्तेदारों का आना जाना लगा हुआ था.तभी देवकी ने पहली बार अपने लिए अभागी शब्द किसी के मुंह से सुना था.

फिर तो समय के साथ न जाने कितने लोगों ने उसे अभागी कह दिया था. उसे भी अब धीरे धीरे लगने लगा था कि वो अशुभ है.इस घर के किसी भी मंगल कार्य मे उसकी उपस्थिति नुकसान दायक है.

गीत संगीत और सजने सँवरने की शौकीन देवकी ने अपनी सारी चंचलाहट को भस्म कर दिया था.रूखा सूखा भोजन,श्वेत वस्त्र और जमीन पर चटाई बिछाकर सोना.

बस किसी तरह देवर वीर के विवाह के साथ ही स्वर्गवासी पति धर्म की सबसे बड़ी इच्छा उसे पूरी करनी थी.देवकी ने तय किया था कि देवरानी को सारी जिम्मेवारियां सौप वो हमेशा के लिए किसी विधवा आश्रम में चली जायेगी ताकि घर से उसका अशुभ साया दूर हो जाये.

आज ये देख कितनी प्रसन्न थी वो कि वीर कृतना के रूप में प्यारी सी देवरानी और घर की नई मालकिन ले आया था.कृतना के गृह प्रवेश की शुभ घड़ी में वो उसके सामने अपनी सुनी मांग लेकर खड़ी नही होना चाहती थी.इसलिए कमरे के दरवाजे की ओट से ही वो अपने धर्म के सपने को पूरा होते देख बेहद खुश थी.

"भाभी आप थक गई होगी.कमरे में जाकर थोड़ा आराम कर लीजिये . शाम मोहल्ले की महिलाएं आएगी घर पर फिर देर तक बहुत सारी रस्मे पूरी करनी पड़ेगी."

ननद दिव्या ने भाभी कृतना के दोनों कंधो पर अपने हाथ रखकर कहा था.

रात भर मण्डप में बैठे बैठे थक कर चूर हो चुका वीर कमरें के बेड पर बेसुध पड़ गया था. पर कृतना तो एक अजीब सी बैचेनी से घिरी थी. जिस देवकी भाभी की तारीफ करते करते वीर थकता नही था वो कही नही दिखी थी उसे.

कॄतना को सबकुछ जानने में समय नही लगा और वो सीधे जेठानी जी के कमरे में चली गयी थी जिस के अंदर कदम रखना देवकी ने हर किसी के लिए वर्जित रखा हुआ था. कमरे की दीवारें अंदर से बदरंग हो चुकी थी. एक चटाई , कुछ पुराने चादर -कम्बल.लकड़ी की पुरानी सी आलमारी जिसमे उसके कपड़े ,पुरानी तश्वीरो वाली अल्बम और कुछ पुस्तके.बस यही सारा संसार बन गया था देवकी का.

आलीशान घर के उस कमरे को देख कृतना ने देवकी की दिनचर्या का अंदाजा लगा लिया था.

उसने वीर के फ़ोन की गैलरी में धर्म भैया और देवकी भाभी की विवाह की तश्वीरें देखी थी.बेहद चंचल और खूबसूरत दिखने वाली जेठानी का आज का रूप देख उसे अपनी आंखों में विश्वास नही हो रहा था.

"अरे तुम इस कमरे में क्यो आ गयी?किसी ने रोका नही तुम्हे कृतना?अभी अभी तुम्हारा घर मे दुल्हन के रूप में प्रवेश हुआ है.ऐसे में इस अशुभ कमरे में क्यो चली आयी."

देवकी की आवाज में नाराजगी के साथ साथ वात्सल्य का भाव था.मानो वो अपनी बेटी को डांट कर समझा रही हों.

कृतना  देवकी की बेबसी को बस महसूस कर रही थी.कैसे समाज और दुनिया के लोग एक बेकसूर महिला पर अभागन का टैग लगाकर उसकी जिंदगी को बर्बाद कर देते हैं.कई बार ये समाज पति के मृत शरीर के संग पत्नी की आत्मा को जला देता है.

वो बस आगे बढ़कर माँ,बहन और सखी के रूप में दिख रही जेठानी को गले से लगाना चाहती थी पर देवकी पीछे हट उसे उसके साये से दूर रहने का इशारा किये जा रही थी.कृतना की जिद्द के आगे देवकी का विरोध कमजोर पड़ चुका था.नई नवेली दुल्हन ने कमरे के कोने में दुबकी अपनी जेठानी को गले से लगाया तो उसे लगा जैसे देवकी कब से इस प्रेम और आत्मीयता की राह तक रही थी.

पता नही कब तक देवकी की आंखे अश्रु बर्षा करते रहें ...कृतना भी देवकी को जी भर कर रो लेने देना चाहती थी.

आहिस्ता आहिस्ता सारा परिवार देवकी के कमरे में आ चुका था.

"भाभी मैं आज आपको तैयार करूंगी अपने हाथों से....और इसी कमरें में आप मेरी मुंह दिखाई की रस्म पूरी करवाओगी मेरी माँ,सास और जेठानी बनकर.

सारे रिश्तेदार और समाज आज देख लेगा कि इस परिवार की मालकिन आप हो और आप अशुभ नही बल्कि इस परिवार की खुशियां आप मे निहित हैं."

कृतना के दृढ़ और आत्मविश्वास भरे शब्दो का असर देवकी के मुख मण्डल पर दिखने लगा था.मुरझायी पत्तियों में जैसे हरापन लौट आने को था.कृतना के पीछे अब पूरा परिवार खड़ा था.

शाम हुई तो पड़ोस की महिलाओं का आना शुरू हो गया था.देवकी के कमरे में मुंह दिखाई की रस्म अदायगी का इंतजाम देख सब दंग थे.

मुंह दिखाई जरूर छोटी बहू की थी पर सारा समाज  डरी सहमी और छुपी छुपी सी रहने वाली देवकी के लौटे आत्म विश्वास को देख रहा था और देवकी अपनी दृढ़ संकल्प देवरानी को निहारे जा रही थी.


Comments

Popular posts from this blog

दामाज बेटा बन जाता है पर बहू पराये घर की रहती है

  "अरे भाईसाहब (ननदोई) इतनी सुबह सुबह ?" "मम्मी पापा ने बुलाया था.कुछ जरूरी काम है." प्रमोद ने रश्मि को रूखा सा उत्तर दिया. "आ गये बेटे. बहू खड़े खड़े क्या बातें कर रही हो जाओ चाय बना लाओ." "जी मम्मी जी" रश्मि चाय बनाते हुए सोच रही थी ऐसी क्या बात हो सकती है जो भाईसाहब को सुबह बुलाया.कल रात उसे सास ससुर के कमरे से खुसुरफुसुर की आवाजें आ रही थी.मन में उठी किसी अनहोनी की आशंका को झटक कर वह चाय ले कर ड्रॉइंग रूम में गई. "बहू नाश्ता जल्दी बना देना.हमें काम से जाना है." "मम्मी जी कहाँ जाना है ?" "आकर बताते है तुम नाश्ते की तैयारी करो." रश्मि ने सास ससुर और प्रमोद को नाश्ता दिया.कुछ देर में तीनो तैयार हो कर चले गये और रश्मि घर के काम निपटाने लगी. ये थी रश्मि. शर्मा परिवार की इकलौती बहू.रश्मि की शादी रूपेश से हुए एक साल हो गया था.रूपेश की एक बड़ी शादीशुदा बहन कंचन और एक छोटी बहन काजल  जो कॉलेज में पढ़ती है.रूपेश दूसरे शहर में नौकरी करता था.उसकी इच्छा थी कि रश्मि  मम्मी पापा की देखभाल के लिए उनके साथ रहे.रश्मि ने भी रूपेश की इच्...

घर के लक्ष्मी का सम्मान

  "रवि... सुनिए ना... मुझे आपसे कुछ ज़रूरी बात करनी थी। वो मेरे पैरों में बहुत सूजन आ रही है और कमर में भी..." सुमन ने रात के सन्नाटे में, करवट बदलते हुए अपने पति रवि से कहने की कोशिश की। उसकी आवाज़ में एक दबी हुई कराह थी। रवि ने झल्लाहट में अपनी आँखों से बांह हटाई और मोबाइल की स्क्रीन पर समय देखा। रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे। "सुमन, प्लीज यार! अभी ऑफिस की टेंशन कम नहीं है जो तुम घर की रामायण शुरू कर देती हो? सुबह से शाम तक घर पर रहती हो, आराम ही तो करती हो। माँ बता रही थीं कि आजकल तुम दोपहर में दो-तीन घंटे सोती हो। फिर भी थकान? और ये पैरों में सूजन वूजन सब वहम है, थोड़ा वॉक किया करो। अब सोने दो, कल मेरी बहुत बड़ी प्रेजेंटेशन है।" रवि ने कंबल मुंह तक खींच लिया और दूसरी तरफ करवट ले ली। सुमन की आँखों में आए आंसू अँधेरे में ही जज़्ब हो गए। वह क्या बताती कि जिसे उसकी सास 'दोपहर की नींद' कहती हैं, वह असल में छत पर पापड़ और अचार सुखाने की चिलचिलाती धूप वाली मेहनत होती है। रवि को सच सुनना ही नहीं था, क्योंकि उसके लिए माँ का कहा पत्थर की लकीर था। सुमन ने चुपचाप एक दर्द न...

हकीकत

  सुमन के हाथों से शादी की मेहंदी भी नहीं उतरी थी कि उसके साथ सुधा जी ने उसे पूरी तरह से काम में झोंक दिया। सुबह से शाम हो जाती, लेकिन सुधा जी के काम तो मानो पूरे ही नहीं होते थे। जैसे ही सुमन आराम करने के लिए अपने कमरे में जाती, वैसे ही सुधा जी कहतीं, "बहू, जरा मेरे सिर में तेल की मालिश कर दो" या "कपड़े प्रेस कर दो"। कोई न कोई बहाना बनाकर पहले से ही तैयार रखतीं। सुमन कुछ भी नहीं बोल पाती और झट से काम पर लग जाती—आखिर नई-नई बहू जो ठहरी! सुमन के पति रोहित दूसरे शहर में नौकरी करते थे। शादी के लिए भी कम ही छुट्टियाँ मिली थीं, इसलिए शादी के आठ दिन बाद ही अपने काम पर लौट गए। तभी एक दिन… "अरे बहू, कब तक सोती रहेगी? कितना समय हो गया है, आज तुम्हारे ससुर जी ऑफिस के लिए भी निकल गए और तूने चाय तक नहीं बनाई। आगे से ध्यान रखना, समझ गई? ठीक चार बजे उठ जाना, क्योंकि तेरे ससुर जी सुबह छह बजे ही निकल जाते हैं। बहुएं तो काम के लिए ही तो लाई जाती हैं, एक लौटी बहू हो, नहीं बताएंगे तो कैसे सीखोगी? बड़े-बूढ़ों की कदर करना सीखो," सुधा जी नसीहत देतीं। "मुझसे गलती हो गई मांजी...