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पुरातन दादाजी

 हमारे गाँव में  मेरे दादाजी की तूती बोलती है साख भी है क्योंकि वह मुखिया भी रह चुके हैं। सदा नियमित जीवन को जीनेवाले सतासी साल के आदरणीय दादाजी को हम सब भाई बहन  बाबा कहते हैं। सब कुछ नियम से करते  पौ फटने के पूर्व ही सुबह में उठ कर नहा धो लेते हैं , जब तक बाबा शरीर से मजबूत रहे तब  तड़के सुबह साढ़े चार के आसपास गंगा नदी स्नान करने जाते , अब उनका देह  थक चुका था मतलब गरमी में पांच बजे व ठंड में सात बजे । नित कर्म के पश्चात पूजा पाठ दो घंटे तक करते ।खानपान भी शुद्ध घी से युक्त है देशी स्वाद के साथ चाहिए होता है उन्हें। दादाजी आयुर्वेदिक दवा का ही सेवन करते और सभी को आयुर्वेदिक दवा को  बढ़ावा  देना चाहिए,  कहते रहते।

सबसे खास बात यह थी कि भोजन जमीन पर ही आसनी बिछाकर करते , पापा कहते रह गए कि आप डाइनिंग टेबल पर बैठ कर खाना खाया करें तो दादाजी अतिशय जोशपूर्ण अंदाज के साथ कहते कि अरे बबुआ, हम अंग्रेज हैं क्या ! उनके माकिफ  चेयर टेबल पर साहब बनकर  ब्रेकफास्ट लंच डिनर करें । तुम सब गाँव के जड़  और सभ्यता को भूलते जा रहे हो । फिर पापा भी  कहते रहने से बाज नहीं  आते , कि  एक दिन अवश्य समझ आएगा आपको , जब आपके टांग व घुटने दर्द करेंगे और आप  जमीन पर नहीं बैठ पायेंगे तब यही कुर्सी मेज साथ देगा  लेकिन दादाजी ठहरे "लकीर का फकीर"। अपने  कायदे को ढोते रहे चाहे कुछ भी हो , अपने उसूलों के पक्के । लाठी के सहारे ही चलते  अपनी धरती माँ के पुजारी और मिट्टी से जुड़े हुए।

 बिहार में कड़ाके की ठंड भी पड़ती है भीषण गरमी  और भारी बरसात भी ,मतलब भारी बारिश से गंगाजल का स्तर भी बढ़ जाता ,कहीं- कहीं गाँव के इलाके भी बाढ़ के पानी में डूब जाते हैं । मेरा  गाँव गंगा नदी के तट पर बसा है आषाढ़ सावन भादो  में भारी बारिश की वजह से आधा गाँव डूब चूका है पर हमारे गाँव का घर ऊंची जगह पर स्थित है इसलिए हम सब सुरक्षित बचे रहे। हम सब नाव पर सवार हो किसी तरह बक्सर तक पहुंचे और फिर किराए की कार से पापा के पोस्टिंग वाले शहर इलाहाबाद गए। इतने दूर के थकाऊ यात्रा ने बाबा के बूढ़े शरीर को थकावट से झकझोर  दिया है ।

 अपनी आदत के अनुसार दूसरे दिन बाबा प्रातःकाल  नहाने घुसे हैं कि  नीचे बैठ स्नान करने के उपरांत उठना चाहे वो,  काफी जद्दोजहद करते रहे पर उठ ही नहीं पाए ,   पापा को आवाज दिए हैं पापा दौड़कर आए पीछे पीछे मैं भी आधी नींद में । प्रमोद हाँ बाऊजी  देखो ना ,

 नहीं उठा जा रहा  मेरा दाहिना पैर  जकड़ गया है , दर्द से  कष्ट में आ गए हैं दादाजी, पापा के साथ मैं और छोटा भाई किसी तरह उनके दोनों बांह को कस कर पकड़े और उनके कंधे को पकड़ खड़ा करने की कोशिश करते हैं , लेकिन बाबा के चेहरे पर असह्य दर्द दिखी, कराह पड़े हैं बाबा !

प्रमोद बेटा पैर नहीं उठ  रहा है  पापा भी बाबा के पीड़ा से घबरा गए  बोलने लगे, क्या दरकार है  भोर के पाँच बजे नहाने का , अपनी उमर तो देखते आप ।अपने को जवान समझते हैं पापा भी झुंझलाहट में बोल गए।  हम सब किसी तरह  उन्हे टांग कर ले आए हैं डाइनिंग टेबल तक । वहीं ब्रश करवाया  व  नाश्ता भी डाइनिंग  टेबल पर किए हैं बाबा।

डॉक्टर के आने पर दर्द निवारक सूई पड़ा है दादाजी को , आधा जितना आराम उनके वृद्ध काया को मिला है , फिर धीरे धीरे बेड तक हम सब ला कर लिटा देते हैं इंजेक्शन पड़ने की वजह से राहत मिला है उन्हें ।हम सब चैन की सांस लेते हैं क्योंकि बाबा के खर्राटे की आवाज सुनाई दे रही है  हम सभी को! मतलब अंग्रेजी दवा का असर है । बाबा के घुटने घिस चुके हैं इसलिए ।इस उमर में घुटना प्रत्यारोपण करना भी खतरा है  इसलिए हम सब तत्पर हो देखभाल कर रहे।

दो दिन तक सूई दवाई लेते रहे हैं  पुरातन विचारधारा वाले हमारे कर्मठ दादाजी ।जीवन पथ पर सदैव अडिग रहनेवाले दादाजी को इंग्लिश शैली ही काम आयी है।

अब अपने-आप को बदल चुके हैं सुबह नाश्ता के बाद स्नान करते हैं डाइनिंग टेबल पर ही बैठकर भोजन खाते हैं पलंग पर ही बैठ कर भगवान के माला का  जाप करते हैं टी वी  भी देखते  हैं । अंग्रेजी मेडिसिन से स्वास्थ्य लाभ हुआ है  उनके पुराने जकड़े उसूलों के समयानुसार बदलाव  को देखकर हम सब भी खुश हैं कि हमारे बाबा ने  "जैसा देश वैसा भेष " को अपनाकर स्वंय को परिस्थितिजन्य ढाला है।


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