"बहू, खाना बन गया क्या?" कमरे से रीना जी चिल्लाईं।
"आज मेरा सिर दर्द हो रहा है मम्मी जी, होटल से दाल-रोटी मंगवा दी है। ये आती ही होंगे लेकर।"
सर पकड़कर सामने से आती हुई पारुल बोली।
"अरे, बाजार का मुंह मत चलाओ बहू, तुम तो रहने ही दो! जब देखो तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं रहती। मुझे तो घर का बना शुद्ध खाना ही चाहिए," रीना जी बोलीं।
"दवा खाई है मम्मी जी, अब ये खिचड़ी चढ़ा दूंगी आपके लिए," कहकर पारुल कमरे में लेटने चली गई।
पारुल को माइग्रेन की समस्या थी। हर महीने उसे ऐसे ही सिर दर्द होता था। ऊपर से इस घर की सब जगह की जिम्मेदारी के साथ उसे थकावट भी बहुत हो जाती थी, पर रीना जी ने कभी उसकी दशा पर अफसोस तक न जताया। जब कभी घर में रसोइया रखने की बात आती तो रीना जी जात-पात का नाटक लेकर बैठ जाती थीं कि "मैं सबके हाथ का बना नहीं खा सकती, खाना तो बहू ही बनाएगी।"
तभी थोड़ी देर में पारुल का पति मनोज आ गया।
"ए बेटा, तेरी बीवी ने आज फिर खाना नहीं बनाया! यह हर महीने का इसका नाटक है। मैं कहती हूँ पैसा फालतू का है जो ये होटल के खाने पर उड़ती है। अरे, घर में पकाने में इसको क्या हर्ज है?"
घर में घुसते ही बेटे के सामने आल-शुरू कर दिया रीना जी ने।
"मम्मी, बस भी करो। शादी, दाल और रोटी लाया हूँ, खा लो," मनोज ने कहकर बात टालनी चाही।
"अरे, तू उसकी गुलामी करता रह, बस! यह फ्री में तो आती नहीं है महारानी! नौकरी क्यों नहीं छोड़ देती इतनी दिक्कत है तो?"
अभी भी रीना जी का गुस्सा सातवें आसमान पर था।
अपनी मम्मी की बातों पर ध्यान न देकर मनोज, पारुल के हाल-चाल लेने अंदर कमरे में चला गया। कमरे तक रीना जी की बातें साफ सुनाई दे रही थीं और पारुल का सिर दर्द से फटा जा रहा था। पर आज पारुल की ऐसी दशा मनोज को नागवार गुजरी।
"क्या चाहती हो मम्मी? नौकरी छोड़ दे वो? पचास हजार की तनख्वाह है उसकी, आमदनी महीने में। एक दिन खाना नहीं बना सकती, तो आपको मजाक लगता है क्या? शायद आपको लगता है, फ्री में 50,000 कमाने वाली नौकरानी आपको मिल गई है! आप इसमें भी नुक्स निकालती हैं, घर पर तो लगी ही रहती है।
अगर उसे समस्या है, तो क्या महीने में एक दिन आप कम नहीं चला सकतीं? जब कभी वो मायके जाती है, तभी तो खुद के लिए खिचड़ी बना लेती हूँ। आप फिर उसका बीमार होना नौटंकी क्यों मानती हैं?
और सुनिए, पैसा कमाना आसान नहीं होता है। वह सहायता के लिए एक रसोइया रखना चाहती है, तो वह भी आपको मंजूर नहीं। ऐसे कैसे चलेगा?"
रीना जी स्तब्ध रह गईं कि आज कैसे बेटे का मुंह खुल गया। बौखलाई रीना जी ने पेट से अपनी बिटिया को चुगलखोरी के लिए फोन लगा दिया। फोन उठाते ही उधर से आवाज आई—
"हेलो मम्मी! आज बड़ा सिर दर्द हो रहा है। पिछले दो महीने से लगातार कभी आराम से होटल से मंगवा लिया है खाना। मेरी सास से तो कुछ नहीं होता, महीने में एक दिन भी नहीं बना सकती खाना। आप बताओ, कैसे फोन किया?"
उनकी बिटिया फोन उठाते ही एक सांस में बोल गई।
"गधों पर पानी पड़ गया" रीना जी पर, कुछ नहीं कहकर फोन रख दिया रीना जी ने। और उस दिन के बाद से जिस दिन घर में रोटी नहीं बन पाती थी, चुपचाप अपनी खिचड़ी बनाकर खा लिया करती थीं।
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