"मां, आप भैया को समझाओ न! मुझे अभी शादी नहीं करनी। मुझे तो अपने पैरों पर खड़ा होना है। काश कि पापा जिंदा होते तो आज मैं अपने भाई और भाभी पर बोझ नहीं बनती। कम से कम मुझे कुछ करने का एक मौका तो मिलता। प्लीज मां!"
अर्चना अपनी मां कमला जी से कहती है।
कमला जी बोलीं, "बेटा, अब मैं क्या ही कर सकती हूं? किस्मत के आगे किसी का जोर नहीं चलता। मैं भी तो तुम्हारे भाई पर ही निर्भर हूं, तो मैं क्या कहूं? और वैसे भी जवान ननद और बूढ़ी मां भाई-भाभी के कलेजे में कील की तरह चुभते हैं। उन्हें तो लगता होगा कि बस जल्दी से जल्दी इन दोनों से छुटकारा मिल जाए। अब मैं तो मर नहीं रही हूं, तो वह लोग तुम्हारी शादी करके तुमसे छुटकारा पाना चाहते हैं।"
अर्चना बोली, "क्या मेरी जिंदगी के दो साल भी मुझे नहीं मिल सकते, मां? भैया-भाभी कभी मेरी पढ़ाई के बारे में नहीं सोचते। बस ये दोनों गैरों से यही पूछते रहते हैं कि शादी के लिए कैसा भी लड़का ढूंढ़ दो। यह क्या बात हुई? मैं भी शादी नहीं करना चाहती।" इतना कहते-कहते अर्चना रोने लगी।
तभी उसकी भाभी बबीता वहां आई और बोली, "इस महारानी के सपने तो देखो, कितने बड़े-बड़े हैं! पहले नौकरी करेगी, फिर दो-तीन साल बाद शादी करेगी। अब बूढ़ी होकर शादी करनी है क्या? समाज वाले हमारा जीना हराम कर देंगे, पर इसे क्या? इसे तो हमारी परवाह ही नहीं है। बेटी की उम्र निकली जा रही है और उसे घर में बिठाने के सपने मां भी साथ में देख रही हैं। सुनो अर्चना, नौकरी कोई सड़क पर पड़ी नहीं मिलती और अगर तुम्हारी ज्यादा उम्र हो जाएगी तो लड़का भी नहीं मिलेगा। और आप मम्मी जी, आप अपनी बेटी को समझाने की बजाय उसका साथ दे रही हैं।"
अपनी सास कमला जी की बात सुने बिना ही बबीता अपने पति नरेश से बोली, "सुन लो जी, दो-तीन महीने में जल्दी से जल्दी कोई भी लड़का देखकर इसकी शादी निपटा दो, ताकि हमारे सर से बोझ उतरे। आगे भी हमारी जिंदगी में बहुत कुछ है। कब तक बहन को घर में बिठाकर रखोगे? वैसे भी आपकी मां भी किसी बोझ से कम है क्या?"
नरेश कुछ नहीं बोला, बस चुपचाप उसने हां में गर्दन हिला दी। अर्चना ने अपने भाई की तरफ उम्मीद भरी नजरों से देखा और बोली, "भैया, बड़ी मुश्किल से मैंने बीएड पूरी की है। यह डिग्री आसानी से नहीं मिली है भैया और अब मैं नौकरी करना चाहती हूं।"
नरेश बोला, "अर्चना, तुमने अपनी भाभी का फैसला सुन लिया न! और वैसे भी मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की थी। अब अच्छा लड़का मिलना इतना मुश्किल है, और अगर मिल भी जाए तो वे दहेज बहुत मांगते हैं। तो अब जो भी लड़का मिलेगा, उससे तुम्हारी शादी करके मैं भी अब इस बोझ से निपटना चाहता हूं।"
बस अर्चना ने आश्चर्य से भाई की ओर देखा और बोली, "भैया, आखिर आपको और भाभी को मैं और मां बोझ क्यों लगते हैं?"
समय बीता। नरेश के किसी मित्र ने उसकी बहन के लिए एक रिश्ता सुझाया। नरेश ने घर आकर अपनी पत्नी से चर्चा की और बोला, "मुझे यह परिवार कुछ ठीक नहीं लग रहा।"
बबीता बोली, "आप भी बेकार में चिंता कर रहे हैं। क्या हुआ अगर लड़का ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं है, कम से कम अपनी छोटी सी दुकान से घर का खर्चा तो चलाता है। और सबसे बड़ी बात, वह दहेज नहीं मांग रहा है। मैं तो कह रही हूं, आंख मूंदकर हां कर दो और जाकर अपनी मां और बहन को अपना फैसला सुना दो कि अब इसी लड़के से अर्चना की शादी करेंगे। अब आप सोच क्या रहे हैं? हमारे पास लाखों रुपए नहीं हैं, जो आपकी बहन को दहेज देकर विदा करें।"
पत्नी की बात मानकर नरेश अपनी मां के पास गया और बोला, "मां, एक खुशखबरी है। अर्चना के लिए एक लड़का मिल गया है। हां, ज्यादा पैसे वाला नहीं है, पर उसकी अपनी दुकान है। घर में उसकी मां और दो बहनें हैं। अर्चना खुश रहेगी वहां, आप शादी की तैयारी करो।"
कमला जी बोलीं, "नरेश, कैसा भाई है रे तू? तेरी एक ही बहन है, उसे भी कुएं में धक्का देगा क्या? कम से कम घर-परिवार तो अच्छे से देख लेता। तेरी बहन अच्छी पढ़ी-लिखी है और मैंने सुना है कि लड़का बस आठवीं पास है। क्या उसके साथ वह रह पाएगी? कैसा भाई है तू? पहले मां और अब अपनी छोटी बहन भी तुझे बोझ लगने लगी।"
नरेश बोला, "मां, सिर्फ अर्चना और आप ही नहीं बल्कि मेरी पत्नी और मेरे बच्चे भी मेरी जिम्मेदारी हैं। मुझे उनका भी भविष्य देखना है। अब जो भी पैसा है, अगर वह मैं अर्चना की शादी में लगा दूंगा, तो मेरे बच्चों का भविष्य क्या होगा? यह सोचा है? फिर मैं भी तो बहुत ज्यादा नहीं कमाता हूं और मुझे तो यह रिश्ता ठीक ही लग रहा है। लड़के वालों की कोई मांग भी नहीं है, इसलिए मैं तो हां करके आया हूं। तो आप अपनी बेटी के मोह में इतना स्वार्थी मत बनिए कि अपने बेटे-बहू के बारे में ध्यान ही न रहे।"
रसोई में काम कर रही अर्चना यह सब सुन लेती है और आकर कहती है, "भैया, आप मेरे जीवन का फैसला करने जा रहे हैं और मुझसे एक बार पूछा तक नहीं। मेरी इच्छा और मेरी मर्जी का क्या कोई मोल नहीं? क्या आपको भी मेरे नौकरी करने से दिक्कत है? मुझे समझ में नहीं आ रहा कि क्या मैं आप लोगों पर इतनी बोझ बन गई हूं कि मुझे मेरी जिंदगी के दो साल भी आप लोग नहीं दे पा रहे हैं। मेरे पास डिग्री है, और अगर मैं काम करूंगी तो आपका ही हाथ बंटाऊंगी।"
तभी बबीता आई और बोली, "सुन रहे हो इस लड़की की बातें, गज भर की जुबान हो गई है इसकी। अब तो बस इस पर लगाम कसने की देर है, वरना हमारी जग हंसाई होगी देखना।"
नरेश बोला, "बस, अब कुछ और नहीं कहोगी अर्चना तुम। मैं और तुम्हारी भाभी ने फैसला ले लिया है कि तुम्हारी शादी उसी लड़के से होगी और अब तुम्हें जो भी करना है, अपने ससुराल में जाकर करना, हमारे सर से अब यह बोझ उतरने दो।"
अर्चना बोली, "भैया, आप मुझे बार-बार बोझ कहकर क्यों संबोधित कर रहे हैं? कल को आपकी भी बेटी बड़ी होगी, तो क्या वह भी आपके लिए बोझ होगी? उसकी शादी भी जल्दी ही, बिना उसकी मर्जी के आप लोग कर देंगे? हां, कर भी सकते हैं, जो अपनी बहन और मां को बोझ समझे, उसके लिए अपनी बेटी किसी बोझ से कम थोड़ी ना होगी।"
अर्चना कहती रही, पर उसके भैया-भाभी बिना कोई जवाब दिए वहां से चले गए।
आखिरकार भैया-भाभी के दबाव में आकर अर्चना ने शादी के लिए हां कर दी, और अपने सपनों को टूटता देख वह उस दिन बहुत रोई।
आखिर उसकी शादी मुकेश से हो गई।
अर्चना विदा होकर मुकेश के घर आई तो देखा, यहां का माहौल एकदम अलग था। घर-परिवार में पढ़ाई-लिखाई से किसी को मतलब ही नहीं था। एक रोज़ जब अर्चना ने सवाल किया, तो सासू मां विमला जी बोलीं, "लड़की को ज्यादा पढ़ा-लिखाकर क्या करना है? आखिरकार उसे चूल्हा-चौका ही तो संभालना है, और तुम भी अपनी ज्ञान की बातें चूल्हे में डालो और घर-बार संभालो। वैसे भी हमें तो पढ़ी-लिखी बहू चाहिए ही नहीं थी, पर तुम तो हमारे मुकेश की पसंद हो, सो आ गई, इसलिए हमने भी हां कर दी, वरना लड़कियों की कोई कमी नहीं थी।"
विमला जी की बात सुनकर अर्चना के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसकी रही-सही उम्मीद भी जाती हुई नजर आई।
अब तक उसे लग रहा था कि कम दहेज लिया है, तो ये लोग खुले विचारों के होंगे और हो सकता है किसी कारण से मुकेश की पढ़ाई पूरी नहीं हो पाई होगी। पर यहां का नजारा तो कुछ और ही था। यह तो वही बात हो गई, आसमान से गिरे और खजूर पर अटके!
धीरे-धीरे घर की हालत अर्चना के सामने आने लगी। एकमात्र उसका पति ही कमाने वाला था। उस घर में दो ननद और सास थी। घर की हालत ज्यादा अच्छी नहीं थी। लेकिन अर्चना पढ़ी-लिखी थी, उसने पहले घर के हालात का पूरा जायजा लिया और अपने हिसाब से चलाने लगी।
सास विमला जी जुबान की तेज थीं, पर अगर कोई प्यार से बात करे तो वह बात समझती थीं। मुकेश भी कम ही बोलते थे।
धीरे-धीरे समय बीतने लगा। अर्चना अपनी दोनों नंदों की पढ़ाई में मदद करती और पूरे घर की बागडोर उसने संभाल ली थी। कभी पति से भी यह शिकायत नहीं करती कि शादी के बाद तुम मुझे कहीं घुमाने क्यों नहीं ले गए, जिसके कारण मुकेश अर्चना की बहुत इज्जत करने लगा था।
समय बीतने लगा।
शुरुआत में अर्चना ने सब कुछ समझा और फिर एक दिन उसने विमला जी से कहा,
"मम्मी जी, अभी तो रीमा-रिंकी छोटी हैं। कल दोनों स्कूल से कॉलेज जाएंगी, फिर उनकी शादी भी करनी होगी। तो जितने पैसे ये कमा रहे हैं, क्या उसमें सब कुछ हो जाएगा? जितनी कमाई है, उसमें तो बड़ी मुश्किल से घर चल पाता है, और भविष्य के लिए कोई सेविंग्स हो ही नहीं रही। जिंदगी की गाड़ी अगर एक पहिए पर ही चले तो सोचिए, उस एक पहिए पर कितना बोझ बढ़ेगा। वहीं अगर दो पहियों पर गाड़ी चले तो एक-दूसरे का बोझ कम हो जाएगा और भविष्य के लिए भी पैसे जमा हो जाएंगे।"
विमला जी थोड़ी देर चुप रहीं, फिर सोचने लगीं कि कहीं न कहीं अर्चना की बात सही है। आखिर मुकेश भी तो अपनी जिंदगी जी ही नहीं पा रहा है, कोई खुश नहीं है।
विमला जी ने कहा,
"बहू, तुम कह रही हो तो ठीक ही कह रही हो। अब देखो न, मुकेश के पिताजी जब से गए हैं, दोनों बहनों और मेरी जिम्मेदारी इस बेचारे के कंधों पर आ गई। अब कोई दूसरा बेटा भी तो नहीं है, जो हमारा सहारा बने।"
अर्चना बोली, "मम्मी जी, जरूरी थोड़ी है कि दूसरा बेटा हो तभी अपने भाई की मदद करें, और कहां लिखा है कि बेटा ही घर चलाता है? बेटी और बहू भी तो घर चला सकती हैं न! अब देखो, मैंने भी बीएड की डिग्री ली हुई है, आप जानती हैं, मुझे भी स्कूल में अच्छी से अच्छी नौकरी मिल सकती है और मेरी पगार भी बहुत अच्छी होगी। सुबह जाऊंगी और दोपहर तक वापस आ जाऊंगी, अच्छा वेतन आएगा तो घर को ही सहारा मिलेगा। मैं चाहती हूं कि मेरी दोनों ननदों का जीवन संवर जाए और ये भी अकेले कितना ही कर पाएंगे। मुझे उनकी हालत देखकर बहुत दुख होता है।"
अर्चना की बात सुनकर विमला जी के मन में धीरे-धीरे बात बैठने लगी। उस वक्त वह कुछ नहीं बोलीं, न गुस्सा हुईं।
अगले दिन जब विमला जी की दोनों बेटियां स्कूल जा रही थीं, तो विमला जी की नजर उनके बैग पर पड़ी, जो बुरी तरह से फट चुके थे।
विमला जी ने कहा,
"रमा-रिंकी, तुम लोगों ने बताया क्यों नहीं कि तुम्हारे बैग फट गए हैं? तुम्हारे भैया ला देते।"
रमा बोली, "मां, हमने भैया को बताया था, पर वे बोले, अभी इसी से काम चला लो, अगले महीने थोड़े पैसे आ जाएंगे तो दिलवा देंगे।"
रिंकी बोली, "मां, भैया हमेशा ऐसा ही करते हैं, हर जरूरत को अगले महीने पर डाल देते हैं। क्या उनके पास पैसे नहीं होते?"
इतना कहते-कहते दोनों बहनें उदास होकर स्कूल चली गईं।
दोनों बेटियों का उदास चेहरा देखकर विमला जी गंभीर हो गईं और अर्चना के प्रस्ताव पर सोचने लगीं।
शाम को जब घर में हर कोई मौजूद था, तो विमला जी सबके सामने अर्चना से बोलीं,
"बहू, क्या तुम सच में नौकरी करना चाहती हो? अगर तुम खुद नौकरी करना चाहती हो, तो अब हमें कोई ऐतराज नहीं है, पर क्या घर और बाहर दोनों संभाल पाओगी? वैसे घर संभालने में तो मैं तुम्हारी मदद कर दूंगी। जीवन की गाड़ी सही चलने लगेगी, तो कम से कम मुकेश का थोड़ा तो भार कम होगा।"
विमला जी की बात सुनकर अर्चना बहुत खुश हो गई। उन्होंने गले से लगाकर विमला जी का आशीर्वाद लिया और अगले ही दिन अपने दस्तावेज लेने के लिए मायके चली गई।
इतने दिनों बाद अर्चना मायके आई थी, पर उसकी भाभी के चेहरे पर ज़रा सी भी खुशी नहीं थी। वह ताना मारने लगी,
"अरे, क्या हुआ? ससुराल में मन नहीं लग रहा जो मायके आ गई? बड़ी मुश्किल से तो इस घर के बोझ को हटाया था। कहीं लड़-झगड़ के यहां रहने तो नहीं आई हो? अगर ऐसा किया है तो भूल जाओ!"
अर्चना ने अपनी भाभी की बातों की कोई परवाह नहीं की और अपनी मां कमला जी के पास जाकर उनका आशीर्वाद लेते हुए बोली,
"मां, मेरे ससुराल वाले बहुत अच्छे हैं। मेरी सास मेरी नौकरी के लिए राजी हो गई हैं, तो मैं अपने मार्कशीट, सर्टिफिकेट और डिग्रियां लेने आई हूं।"
कमला जी बोलीं,
"मुझे बहुत खुशी हुई बेटा कि तुम्हारे जीवन की गाड़ी सही रास्ते पर चल पड़ी है। वह तो कुछ लोगों की आंखों में तुम चुभ रही थी और वे कभी चाहते ही नहीं थे कि तुम नौकरी करो और अच्छी जिंदगी जियो। पर ईश्वर के घर में देर है, अंधेर नहीं।"
बबीता बोली,
"ऐसा कैसे हो सकता है? तुम्हारी सास को तो पढ़ी-लिखी बहू भी नहीं चाहिए थी। तो तुम्हारी नौकरी करने पर वह राजी कैसे हुई? जरूर तुमने लड़ाई-झगड़ा किया होगा।"
अर्चना बोली,
"जो समझना चाहता है, उसे ही बात समझ में आती है। यहां तो मैं कह-कह कर थक गई थी, पर किसी ने मेरी बात नहीं समझी। अब ससुराल मेरा घर है और वे मेरे अपने हैं, तो मैं अपने घर की बात अपने तक ही रखना चाहती हूं।"
इतना कहकर अर्चना शांतिपूर्वक अपना सामान लेकर अपने ससुराल के लिए जाने लगी।
जाने से पहले वह बबीता से बोली,
"भाभी, आपने तो बहुत कोशिश की थी मेरी जिंदगी नर्क बनाने की, पर मैंने भी ठान लिया था कि मैं अपनी जिंदगी संवारूंगी। इतनी मेहनत से, दिन-रात एक करके जो मैंने पढ़ाई की थी, उसे इस तरह बर्बाद नहीं होने दूंगी। मैं अपने पैरों पर एक दिन जरूर खड़ी होकर दिखाऊंगी और उस दिन आपका चेहरा देखने लायक होगा। भले ही मेरे भाई और आपने मुझे बोझ समझा, पर मेरा पति मुझे बोझ नहीं समझता।"
बबीता ने उत्सुकता से पूछा,
"वैसे तुम्हारी पगार कितनी होगी?"
अर्चना मुस्कुरा कर बोली,
"अब कितनी भी पगार मिले, वह आप लोगों के लिए नहीं होगी। अब मेरी सारी कमाई मेरे ससुराल वालों के लिए ही होगी।"
यह कहकर अर्चना वहां से चली गई।
कुछ दिनों की मेहनत और इंटरव्यू के बाद अर्चना को एक अच्छे स्कूल में टीचर की नौकरी मिल गई। अब अर्चना भी अच्छा खासा कमाने लगी, तो घर की स्थिति भी सुधरने लगी और घरवालों की ज़रूरतें भी।
मुकेश इतने अच्छे थे कि अर्चना खुद को उनके करीब जाने से रोक नहीं पाई।
फिर वक्त बीता, अर्चना का एक बेटा हुआ और धीरे-धीरे उसका प्रमोशन होता गया। अब वह सीनियर टीचर बन गई।
उनके सहयोग और कड़ी मेहनत से, देखते ही देखते अर्चना स्कूल की प्रिंसिपल बन गई और कुछ सालों बाद उसने अपनी दोनों ननदों का कॉलेज में दाखिला करवाया और धीरे-धीरे उनकी भी पढ़ाई पूरी होती गई।
इधर विमला जी को अपनी बेटियों की शादी की चिंता सताने लगी। वे जल्दी से जल्दी दोनों की शादी कर देना चाहती थीं।
कुछ समय बाद अर्चना के मायके से खबर आई कि उसकी मां कमला जी नहीं रहीं और उसके भाई नरेश का एक्सीडेंट में एक पैर कट जाने की वजह से उसे अपनी नौकरी से भी हाथ धोना पड़ा।
उस खबर ने अर्चना को अंदर तक हिला दिया। उसने बेटी होने का फर्ज निभाया और भाई के कंधे से कंधा मिलाकर अपनी मां की अंतिम क्रियाकर्म और भोज में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
जब अर्चना वहां से जा रही थी, तो अपने भाई और भाभी से बोली,
"भैया-भाभी, आप लोगों ने तो मुझे बोझ समझा, पर मैं आपके बच्चों को बोझ नहीं समझती। आपकी बेटी की पढ़ाई-लिखाई का सारा खर्चा अब मैं उठाऊंगी। उसे अच्छे से अच्छे कॉलेज में पढ़ाऊंगी, ताकि वह अपने पैरों पर खड़ी हो सके।"
यह सुनते ही बबीता शर्म से जमीन में गड़ गई। वह अर्चना के पैर पकड़कर बोली,
"अर्चना, मुझे माफ कर दो। मैंने तुम्हें हमेशा गलत समझा, शादी भी जबरदस्ती करवा दी और आज तुम मेरी बेटी के लिए इतना सोच रही हो।"
अर्चना बोली,
"भाभी, जो हुआ उसे भूल जाइए। अब तो मां भी नहीं रहीं, तो इस घर में मेरा आना-जाना उतना हो नहीं सकता, तो बस आप भी अपनी बेटी के भविष्य के बारे में सोचिए और मुझसे जितना हो पाएगा, मैं मदद करूंगी।"
इतना कहकर अर्चना वापस अपने ससुराल आ गई।
समय बीता। एक दिन विमला जी बोलीं,
"मुकेश, अब अपनी बहनों की शादी के लिए लड़का ढूंढना शुरू करो।"
अर्चना बोली,
"नहीं मम्मी जी, पहले दोनों अपने पैरों पर खड़ी हो जाएं, फिर जाकर उनकी शादी के बारे में सोचेंगे।"
विमला जी यह बात मान नहीं रही थीं, तो अर्चना बोली,
"मम्मी जी, मेरी ननदें मेरे लिए बोझ नहीं हैं, जो मैं उनकी शादी करके उनसे पल्ला झाड़ लूं। इन्हें मैंने अपनी छोटी बहन की तरह समझा है, इसलिए मेरी जिम्मेदारी है कि जब तक ये दोनों अपने पैरों पर खड़ी न हो जाएं, तब तक मैं इनकी जिम्मेदारी उठाऊंगी, ताकि आगे चलकर ये बेहतर जिंदगी जी पाएं।"
विमला जी बोलीं,
"वह तो अपने ससुराल जाकर भी ये लोग कर सकती हैं, जैसे तुमने किया।"
अर्चना बोली,
"नहीं मम्मी जी, यहां आप मुझे मां के रूप में मिलीं, आपने मेरी बात समझी, पर जरूरी तो नहीं है कि इन्हें भी ससुराल में आप जैसी सास मिले। तो हम क्यों दूसरों के सहारे अपने सपने पूरे करें? इन्हें इतना मजबूत करके उनके घर भेजेंगे, ताकि मुसीबत आए तो ये पूरी तरह तैयार रहें और उसका सामना कर सकें।"
इतना कहते-कहते अर्चना की आंखें भर आईं।
मुकेश ने अर्चना के कंधे पर हाथ रखकर बोला,
"अर्चना, मैं जानता हूं, तुम भाभी नहीं, बल्कि उनकी बड़ी बहन बनकर सोच रही हो। मुझे तुम पर गर्व है। अच्छा हुआ जो तुम मेरे जीवन में आईं। तुम न होतीं तो मेरे घर की स्थिति क्या से क्या हो जाती, और ऐसी जिंदगी की तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते थे। पर सपने देखना तुमने हमें सिखाया।"
विमला जी आगे बढ़कर बोलीं,
"बहू, मैं तो भूल ही गई थी कि तुमने भी अपने जीवन में कितना संघर्ष किया है। चलो ठीक है, अब जैसा तुम और मुकेश चाहो, वैसा ही होगा। अब जब तुमने अपनी ननदों को अपनी बहन मान ही लिया है, तो तुम इनका भला तो सोचोगी ही।"
समय बीता, अर्चना ने रीमा और रिंकी के साथ अपने भाई की बेटी की जिंदगी भी संवारी।
आज उसने एक अच्छी भाभी और बहू होने के साथ-साथ एक जिम्मेदार पत्नी होने का फर्ज भी निभाया और समाज को एक नया संदेश दिया कि मां और बहन किसी पर बोझ नहीं होती हैं।
आशा करती हूं दोस्तों, आपको हमारी कहानी जरूर अच्छी लगी होगी। धन्यवाद।
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