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नियम

 शालिनी अपने बालों का जुड़ा बनाते हुए कमरे से बाहर निकली तो देखा कि आंगन में सास और शिला चाची धूप में बैठकर बातें कर रही थीं। उसे देखकर शिला चाची ने कहा,

"शालिनी बहू, तुम भी आओ हमारे साथ बैठो, धूप में बातें करते हैं।"
शालिनी ने कहा, "नहीं चाची जी, मैं नहीं आऊंगी, आप लोग ही बातें करिए। मैं नहाने जा रही हूं।"

शालिनी की बात सुनकर शिला जी ने कहा, "तुम अभी तक नहाई ही नहीं? 11 बजे गए हैं, इतना लेट क्यों नहाती हो? और किचन में बिना नहाए ही जाती हो?"
"वह क्या है चाची जी, मैं..." शालिनी अपनी बात पूरी करती, उससे पहले शिला जी ने शालिनी की सास से कहा,
"और जीजी, आप कुछ नहीं कहतीं! आप कैसे सब नियम भूल गईं? ऐसे कैसे बहू बना रही हैं, खाना बना लेती है, जबकि हमारे खानदान में वर्षों से परंपरा रही है कि बहू बिना नहाए किचन में न जाए।"
शिला की बात सुनकर शालिनी की सास ने मुंह बनाते हुए कहा,
"मैंने तो कहा था, लेकिन सुने तब ना! आजकल की बहुएं कहां सुनती हैं? एक हम लोग थे, जिन्हें सास की बात को इंकार करने की हिम्मत नहीं होती थी। अगर किसी बात को इंकार कर भी देते, तो पूरा घर सिर पर उठा लेते थे, बात मायके तक पहुंच जाती थी। आजकल की बहुएं हमारे जितना सहनशील थोड़े ना होती हैं। हमारे जैसी सास रहती तो ये सब ससुराल में टिक भी नहीं पातीं। ऐसे कैसे नहीं सुनेगी, कल को मेरी बहू आएगी तब तो मैं उसे बिल्कुल भी अपनी नहीं चलाने दूंगी। आपने शुरुआत में ही छूट दे दी, इसलिए आज यह हो रहा है।"

दोनों की बातें सुनकर शालिनी ने कहा,
"नहीं चाची जी, पहले मैं किचन में नहा कर ही जाती थी, लेकिन जब से बाबू हुआ है, तब से बिना नहाए जाती हूं।"
"अरे, लेकिन तुम्हारा बच्चा तो दो महीने का हो गया, अब नहाने में क्या दिक्कत है? अब तो ठंड भी ज्यादा नहीं है। अभी से करने लगोगे तो बच्चा को सब कुछ सहन हो जाएगा। यह मत भूलो कि तुम एक बहू भी हो, और इस घर के जो नियम कायदे हैं, उसका पालन करना तुम्हारा धर्म है।"

"नहीं चाची जी, मैं कुछ दिन नहाई थी सुबह को, तो बाबू को सर्दी लग गई थी। फिर मेरी मां ने कहा कि जब तक गर्मी ना आए तब तक सुबह मत नहाओ। फरवरी आ गई है, लेकिन ठंड अभी भी काफी है। बाबू को एक बार सर्दी लग जाएगी तो बार-बार होगी। फिर कपड़े भी ज्यादा धोने को रहते हैं, जो सुबह को नहीं धो पाती हूं। सुबह में सबके चाय-नाश्ते का भी समय रहता है, इसलिए सब काम खत्म करके ही नहाती हूं।"
तभी शिला जी ने कहा,
"हम लोग जो कहेंगे, वह नहीं सुनेगी, लेकिन इसकी मां जो कहती है, वह तुरंत सुन लेती है।"
शालिनी को बुरा तो लगा, पर अनसुना करके वह जाने लगी। तभी मोहल्ले की एक और महिला, सावित्री, जो शालिनी की रिश्तेदार लगती थी, आई और शालिनी से पूछा,
"शालिनी, आज मेरे घर में सत्यनारायण भगवान की कथा है, तो प्रसाद बनाने में मदद कर देगी?"
शालिनी ने कहा,
"हाँ चाची, कर दूंगी, लेकिन मैं नहा लेती हूं पहले।"
"अरे, तुम अब तक नहाई ही नहीं? तब तो बहुत लेट हो जाएगा, तू नहाएगी फिर खाएगी, तू रहने दे, मैं खुद ही बना लूंगी।"
"नहीं चाची जी, मैं नाश्ता कर चुकी हूं, बस नहा कर आती हूं। आपकी मदद करने के बाद लंच कर लूंगी।"

इतना सुनते ही शिला जी बोलीं,
"अरे, तू बिना नहाए खाना भी खा लेती है? खाना तो कम से कम नहा धोकर, भगवान को धूपबत्ती दिखाकर खाया करो।"
बोलते हुए शालिनी की सास की तरफ देखा। शालिनी की सास ने कहा,
"अरे शिला, मैं क्या करूं? मैंने तो कहा था, लेकिन कोई सुने तब ना। पहले तो रोज़ पूजा करना, नहा धोकर खाना बनाना, फिर खाना। पर अब तो जब से बच्चा हुआ है, सब नियम-धर्म भूल गई। भगवान ने बेटा दिया और भगवान को ही भूल गई। इस समय में मेरी सास को रहना चाहिए था, तब इसकी कहानी आती। तुम दोनों ने तो देखा है ना मेरी सास को, कैसा व्यवहार करती थी मेरे साथ, कितना सख्त थीं।"

दोनों की बात सुनकर शालिनी ने कहा,
"आप दोनों कैसी बातें कर रही हैं? बिना नहाए खा लिया तो क्या हो गया? अभी दो महीने का बच्चा है मेरा, दूध पिलाती हूं, जिसे भूख ज्यादा लगती है। मैं समय से खाना नहीं खाऊंगी तो दूध कैसे पिलाऊंगी? जहां तक बात है इस घर की बहू होने की, तो बहू होने के साथ मैं एक मां भी हूं, और मेरी पहली प्राथमिकता है अपनी और बच्चे की सेहत का ख्याल रखना। बात रही पूजा करने की, वो तो कभी भी कर सकते हैं। भगवान तो यह नहीं कहते कि खाने के बाद मेरा नाम मत लो।"

शालिनी की बात सुनकर उसकी सास ने कहा,
"देख रही हो तुम लोग, कैसे ज़बान चला रही है! ये बहू के लक्षण हैं?"
इतना सुनते ही सावित्री चाची ने कहा,
"अरे जीजी, शालिनी ठीक ही तो कह रही है। अभी बच्चा छोटा है, ठंडी का मौसम है, सुबह नहाएगी तो हो सकता है बच्चे को सर्दी लग जाए। और एक बार छोटे बच्चे को सर्दी लग गई तो फिर बार-बार होती रहती है और फिर बच्चे को निमोनिया का डर रहता है। अभी बच्चे को संभालना ज्यादा जरूरी है, वह समय से नहीं खाएगी तो बीमार भी हो जाएगी, और बच्चे को दूध कहां से पूरा होगा? पूजा-पाठ, नियम-धर्म करने के लिए तो पूरा जीवन पड़ा है। बात रही आपकी सास की, तो इतनी बुराई मत करिए, आपका तो बहुत अच्छे से ख्याल रखती थी, जब आपके दोनों बच्चे हुए, आपको तो तीन महीने तक कोई काम नहीं करने दिया।"

"हाँ, वह सब तो स्वभाव की थीं, तो क्या हुआ, जब तक उनका वर्चस्व रहा घर में, तब तक उनकी सभी बहुएं डरती थीं, उनकी बात मानती थीं। पर जैसे ही उनका वर्चस्व खत्म हुआ, तब तो कोई ढंग से बात भी नहीं करता था, बेचारी मरते दम तक अकेली रही। देखिए जीजी, परिवार में जरूरी नहीं हमेशा बड़े ही सही हों, कभी-कभी छोटे भी बड़े से ज्यादा सही होते हैं, और अभी आपकी बहू सही है। आप मेरी बातों का बुरा ना माने।"
स्वच्छता मैंने कह दिया।

इतना सुनते ही शालिनी की सास और शिला जी भी चुप हो गईं, और शालिनी नहाने चली गई।
प्रसाद बनाने के लिए सावित्री जी के घर शालिनी और उसकी सास भी गईं।
तब सावित्री जी ने कहा,
"जीजी, मुझे माफ करिए, मुझे लगता है बहू के सामने मैंने ज्यादा ही बोल दिया।"
शालिनी की सास ने कहा,
"नहीं सावित्री, तुमने कुछ ज्यादा नहीं बोला, बल्कि बिल्कुल सही बोला और मेरी आंखें खोल दी आज।"


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