रोजगार के लिए मारे -२ फिरने के बाद जब कोई काम नहीं मिला तो सुजीत को एक राह सूझी ,उसने अपनी दोपहिया स्कूटी को चलती -फिरती दूकान में तब्दील कर दिया। वह मोटर्स पार्ट्स के शॉप में काम करता था। जब महामारी के चलते उसके पिता चल बसे,फिर उसकी नौकरी छूट गई तो वह कई दिन तक अवसाद में डूबा रहा अब घर में दादा दादी ,माँ और एक छोटी बहन की जिम्मेदारी उसके कंधे पर आ गई थी। एक दिन उसके दादाजी ने उसका मनोबल और हौसला बढ़ाते हुए समझाया -बेटा ,ईमानदारी और नेकनीयत से किया गया कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता। बस मन में संशय या आत्मग्लानि के लिए कोई मलाल ना रखो ,तो सभी कार्य अनुकरणीय हैं। लोगों का क्या हैं ? -' कुछ तो लोग कहेंगे !लोगों का काम है कहना। ,, छोड़ो बेकार की बातों में बीत न जाएं रैना। .. ये गाना मुस्कुराकर कर गुनगुनाते हुए दादाजी ने अपने पोते की पीठ थपथपाई और कहा कि --बेटा ,विकट से विकट परिस्थिति में आने वाली समस्याओं और संघर्षों का डटकर मुकाबला करते हुए ,अपनी सूझबूझ और बुद्धि से निरस्त करो। कुदरत हर इंसान की परीक्षा लेती है. तुम्हे अपनी मेहनत ,ईमानदारी और पूर्ण निष्ठा के साथ जुट जाना है फिर निसंदेह तुम जिंदगी में अव्वल दर्जे से उर्त्तीण होओगे। '
दादाजी की बात ने उसमें प्रेरणा की लो जगा दी। अब वह जुगाड़ की दूकान के सहारे अपनी और अपने घर की जीविका चला रहा हैं। रोजाना सत्तू ,भूजा चूड़ा और ग्लब्स सेनिटाइजर,मास्क ,पानी की बोतल , आदि जरूरत के सामानों को बेचकर उसकी 700 रुपया तक की कमाई हो जाती हैं। शहरी अंचल से लेकर ग्रामीण अंचल तक वह अपनी चलती फिरती दूकान को लेकर सुबह -२ निकल जाता है और शाम होने तक काम करता हैं इस प्रकार अपनी जुगाड़ू दुकान से अपने परिवार का पालन -पोषण कर रहा हैं। बरसात की वजह से उसे थोड़ी तकलीफ होती है पर जरूरतमंद लोगों तक पहुंचकर , उन्हें सही दाम में सामान बेचकर बहुत ख़ुशी मिलती है।
हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी भी यही कहते है कि-- आपदा में अवसर को तलाशना पड़ता है यानी रोजगार के विकल्प तलाशने पड़ते हैं हताशऔर मायूस होकर कुछ लोग अपनी जीवनलीला समाप्त कर बैठते हैं। ऐसा करने से पहले उन्हें एक बार जरूर सोचना चाहिए। सरकार को दोषारोपण देने से कोई फायदा नहीं हैं।
उन्हें सुजीत से प्रेरणा लेनी चाहिए ,जब उसका काम छूटा तो उसने अपने दादाजी के समझाने पर अपनी स्कूटी को रोजगार का सहारा बना लिया। जो सबके लिए एक मिसाल बन गया।
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