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सच्चाई

 "मां, आप दुखी ना हों, मैं बहुत खुश हूं।"

तान्या की बात सुनकर, उसकी आवाज़ से मां को लगा कि बेटी खुश तो है लेकिन कहीं न कहीं परेशान भी है। उन्होंने अपनी बेटी तान्या से कहा,
"बेटा, तुम्हारी अभी-अभी शादी हुई है, तुम्हें खुश होना भी चाहिए, लेकिन तुम्हारी आवाज़ से लग रहा है कि तुम कुछ परेशान हो। बताओ, क्या वजह है तुम्हारी परेशानी की?"

"मां, आपसे कितना भी कुछ छुपाने की कोशिश करूं, पर आप जान ही लेती हैं।"
"अच्छा, बताओ, क्या वजह है?"

"मां, कोई खास बात नहीं है, लेकिन आपकी दी हुई सीख अगर मुझे ध्यान न रहती, तो आज छोटी सी बात का बहुत बड़ा बतंगड़ बन जाता और मेरे और सासू मां के रिश्तों में ऐसी खाई पैदा हो जाती जिसे पाटना मुश्किल होता।

कल शाम जेठानी जी ने मुझसे पूछा, 'तान्या, तुम्हारे वे गहने कहां हैं जो तुम्हें शादी में ससुराल से चढ़ाए गए थे?'
मैंने कहा, 'भाभी, वे तो माजी के पास हैं।'

तब जेठानी जी इधर-उधर देखते हुए बोलीं,
'तान्या, तुम भूल जाओ उन गहनों को, तुम्हें नहीं मिलने वाले।'

उनकी बात सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ। मैंने कहा,
'क्यों नहीं मिलेंगे? मेरे गहनों पर मेरा हक है।'

जेठानी जी ने उल्टा-सीधा कहकर मुझे इतना गुस्सा दिलाया कि मैंने कहा,
'शादी में ससुराल से चढ़ाए गए गहने स्त्री का स्त्री-धन होते हैं, क्यों नहीं देंगी सासू मां? मैं इस बारे में उनसे बात करूंगी।'

जेठानी जी की बातें सुनकर मुझे रात भर नींद नहीं आई। पहले सोचा, आपके दामाद जी से बात करूं, फिर सोचा, सुबह उठते ही सासू मां से बात करूंगी और अपने गहने मांग लूंगी।

लेकिन फिर मुझे आपकी कही एक बात याद आ गई —
"किसी की बातों में आकर कोई काम नहीं करना चाहिए और न ही किसी के बारे में गलत धारणा बनानी चाहिए।"

इसलिए मैंने जल्दबाजी न करते हुए सासू मां से बाद में आराम से बात करने का इरादा किया।

सुबह जब मैं किचन में गई, तो देखा कि जेठानी जी मेरे खिलाफ माजी को भड़का रही थीं। वे कह रही थीं,
"मां जी, तान्या कह रही थी कि सासू मां मेरे गहने दबाकर बैठी हैं। ये मुझे नहीं देंगी तो मैं कोर्ट के माध्यम से लूंगी। तान्या ने यह भी कहा कि वे गहने मेरे हैं और कानून की भाषा में वे मेरा स्त्री-धन हैं।"

जब मैं किचन में गई, तो जेठानी जी चाय बना रही थीं और माजी उन्हें अजीब-सी नज़रों से घूर रही थीं। फिर उन्होंने मुझे देख कर कहा,
"बहू, अभी तुम्हें इस घर में आए 5 दिन हुए हैं और तुम कोर्ट में जाने की धमकी दे रही हो, हमें कानून बता रही हो! हमें विश्वास नहीं होता।"

मैंने कहा,
"मां जी, लेकिन मैंने ऐसा कब और किससे कहा? भाभी, आप ही बताइए ना माजी को, मैंने ऐसा कुछ नहीं कहा। बल्कि आप ही मुझे कह रही थीं कि 'भूल जाओ अपने गहनों को, तुम्हें नहीं मिलेंगे'।"

सासू मां ने कहा,
"हाँ बहू, मैंने कल तुम दोनों की बातें सुन ली थीं। तुमने सही कहा था कि तुम्हारे गहने तुम्हारा स्त्री-धन हैं, जो मेरे पास तुम्हारी अमानत के तौर पर रखे हैं। तुम्हारे लिए लॉकर की व्यवस्था हो जाए तो मैं खुद तुम्हें दे दूंगी, चाहो तो अभी ले लो।

और जेठानी जी, जब तुम्हारे गहने मैंने अपने पास नहीं रखे, तो इसके क्यों रखूंगी?"

जेठानी जी, अपना फालतू उल्टा पड़ता देख, शर्म से पानी-पानी हो गईं। उनका ध्यान ही नहीं था कि गैस की आंच तेज है और चाय उबल कर बाहर आ रही है।

सासू मां ने जेठानी जी से कहा,
"चूल्हे की आंच कम कर दो। रिश्ते हों या चाय, धीमी आंच पर ही जिंदगी का मजा देते हैं। तुम बहुत तेज चल रही हो। अभी छोटी बहू को इस घर में आए 5 दिन नहीं हुए हैं और तुमने घर में राजनीति करनी शुरू कर दी।

सुबह जिस तरह तुम मुझे भड़का रही थीं, अगर कल तुम दोनों की बातें मैं नहीं सुनती और तुम्हारी बात पर विश्वास कर लेती, तो छोटी बहू को तुमने हम सबकी नज़रों में गिरा ही दिया होता। आपस में नजदीक आने और दिल का रिश्ता बनने से पहले ही तुम एक-दूसरे के दिलों में नफरत का ज़हर घोल देतीं।

आगे से ऐसा न हो, सब ध्यान रखें।"

यह कहकर सासू मां गुस्से में अपने कमरे में चली गईं।

"चलो, भगवान का लाख-लाख शुक्र है कि तुम्हारी सासू मां ने तुम्हारी बातें सुनीं, वरना सच में तुम्हारे और उनके रिश्ते के बीच बड़ी खाई बन जाती। और अच्छा हुआ कि तुमने सही वक्त का इंतजार करते हुए उनसे सीधे बात नहीं की।

हमेशा ध्यान रखना — घर में सुनी हुई हर बात पर तुरंत प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए, बल्कि दिमाग लगाकर ही कोई कदम उठाना चाहिए।"


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