Skip to main content

बेघर

 "सुनो, यह फोटो बाबूजी की है। अम्मा के गुजर जाने के बाद उनका पुराने घर में मन नहीं लगता था, तो तुम उन्हें वृद्धा आश्रम में छोड़ आए थे? ये तो कोई और जगह लग रही है!" तृषा ने सोशल मीडिया पर देखी एक तस्वीर मयंक को दिखाते हुए कहा।

"अब हमें क्या करना है? कहीं भी हों। वैसे तुम्हारी जानकारी के लिए बता दूं, गांव वाला घर बेचकर उन्हें वृद्धा आश्रम में छोड़कर आने का आइडिया तुम्हारा ही था। तुम ही बोली थी, अम्मा के बाद अकेले उन्हें घर में कैसे रखेंगे? उनकी देखभाल कैसे हो पाएगी? सोचा, हमउम्र लोगों के बीच रहेंगे तो अच्छा समय व्यतीत होगा," मयंक ने अपना पल्ला झाड़ते हुए कहा।

तृषा के दिमाग में यह पता लगाने का फितूर हो चुका था कि आखिर बाबूजी कर क्या रहे हैं? एक सामान्य किसान ने ऐसा क्या किया कि उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर सेलिब्रिटी की तरह वायरल हो रही हैं? तृषा ने न्यूज़ संस्था के पेज को लाइक कर जानकारी एकत्रित कर ली।

महेश जी ने अपने बेटे के लिए बहुत सारे सपने देखे थे। खेती-बाड़ी कर उन्होंने बेटे को पढ़ने के लिए शहर भेजा, ताकि वो गांव के दूसरे बच्चों के लिए प्रेरणा बन सके और अपनी शिक्षा से गांव में तकनीकी विकास करे। लेकिन जैसा इंसान सोचता है, वैसा कहां होता है! मयंक ने नौकरी लगते ही वहीं अपनी एक एम्प्लाई तृषा से विवाह रचा लिया।

पुष्पा जी बेटे के इंतजार में एक लंबी बीमारी के चलते दुनिया से अलविदा कह गईं। "देखो, आकाश विदेश में पढ़ रहा है, बहुत पैसा जा रहा है। अब बाबूजी को यहां बुलाकर उस पुश्तैनी घर का सौदा कर लो। सारी जिंदगी दोनों मिलकर कमाते रहे, तब जाकर अपना घर-गाड़ी ले पाए। सारी सैलरी तो लोन की किस्तों में निकल गई। घर को बेच देंगे तो बेटे की पढ़ाई, शादी, सबका खर्च निकल आएगा।" तृषा की बातों में मयंक आ गया। उसे लगा, आज नहीं तो कल वह घर वैसे भी हमारा ही है।

गांव जाकर दोनों पति-पत्नी ने महेश जी को अपनी शहर में उंगली-बातों से कागजों पर हस्ताक्षर हेतु राजी कर लिया। पिता को गांव से शहर ले जाते वक्त उन्होंने गाड़ी को वृद्धा आश्रम के आगे रोक दिया।

"बाबूजी, शहर चलकर भी आप क्या करेंगे? हम पति-पत्नी नौकरी वाले हैं, पोता आपका विदेश में है। क्यों ना कुछ दिन आप यहां बिता लें? हमउम्र लोगों के बीच आपका समय अच्छा व्यतीत होगा," तृषा ने कार में पीछे बैठे बाबूजी से कहा।

महेश जी को बेटे-बहू के मन में आए लालच का अंदाजा लग गया था। वे चुपचाप अपना सूटकेस लेकर गाड़ी से नीचे उतर गए।

"मैंने जीवन में अपने पिता से बहुत कुछ सीखा, पर बेटा, जो पाठ तूने सिखाया, वह कभी नहीं भूलूंगा। अच्छा हुआ तेरी मां तेरा यह रूप देखने से पहले दुनिया से चली गई," महेश जी बोले। मयंक नज़रे उठाकर जाते पिता को देख तक नहीं पाया। तृषा ने गाड़ी स्टार्ट करने को कहा, दोनों वहां से चले गए।

महेश जी हिम्मत हारने वालों में से नहीं थे। वहां उन्हें अपने जैसे दर्द वाले कई और मिल गए। जब आपके अपने पराए हो जाएं, तो ऐसे समय कोई दर्द बांटने वाला मिल जाए, तो वह आपके अपनों से भी ज्यादा अपना और अज़ीज़ हो जाता है।

महेश जी ने अपने सामाजिक और व्यावहारिक स्वभाव से सबका मन मोह लिया। जल्दी ही वृद्धाश्रम में उन्होंने एक नया जोश भर दिया। "जिन बच्चों को हमने आत्मनिर्भर बनाया, क्यों हम उन पर निर्भर रहें? क्यों न हम अपनी योग्यताओं और प्रतिभाओं को फिर से निखारें, नए सिरे से जीवन की शुरुआत करें?" सब उनकी बातें सुनते थे, लेकिन वहां वृद्धजन सिर्फ शारीरिक रूप से नहीं, अपनों से छले हुए मन से भी बहुत आहत थे। उनको महेश जी की बातें असंभव सी लगती थीं।

महेश जी ने अपनी कृषि की जानकारी का फायदा उठाकर आश्रम की खाली पड़ी जमीन पर सब्जियां उगाना शुरू कर दिया। उसी क्षेत्र में कृषि विज्ञान के एचडी कर रहे छात्रों ने वहां की मिट्टी और जलवायु के बारे में रिसर्च के लिए महेश जी की मदद चाहिए थी। बदले में उन्होंने वहां के वृद्धजनों को ऑर्गेनिक सब्जियों के बारे में जानकारी दी। धीरे-धीरे वे लोग एक-दूसरे की जरूरत पूरी करने का जरिया बन गए।

महेश जी को जीने की एक नई राह मिल गई। वृद्धजन के उत्साह को देख कई भले लोगों ने आर्थिक मदद की। वह जमीन, जहां पहले कुछ फल-फूल लगे रहते थे, बुजुर्ग आपस में बातें करते, योग करते या फिर टहलते दिखाई देते थे, अब व्यावहारिक रूप से एक दैनिक सब्जी उगाने वाला खेत बन चुका था।

कल तक जो बुजुर्ग पूरी तरह से टूटे हुए, हारे हुए और निराश दिखाई देते थे, आज किसी के पास बात करने का समय तक नहीं था—सबके पास बहुत काम है। अब वे बच्चों के भेजे गए पैसों के भरोसे नहीं हैं। "आज से हमारी संस्था किसी वृद्धाश्रम के रूप में नहीं जानी जाएगी, दूसरी पारी, एक नए जोश के साथ इस नए नाम से जानी जाएगी।"

तृषा ने "दूसरी पारी" नाम की संस्था के बारे में सारी जानकारी ले ली। वह समझ गई कि बाबूजी लाखों कमा रहे हैं। एक दिन तृषा-मयंक महेश जी से मिलने पहुंचे। सामने दूर तक लहलहाते खेत, वहां काम करते बुजुर्गों में अलग ही जोश दिख रहा था। अपने बेटे-बहू को देख कोई खास खुशी तो उन्हें नहीं हुई, वे अपने कमरे में चले गए।

उन्हें जाता देख उनके एक दोस्त ने तंज कसते हुए तृषा-मयंक से कहा, "तुम लोग यहां महेश जी ने तुम्हें शहर भेजा, तो तुमने उन्हें बुढ़ापे में बेघर कर दिया। तुम्हारा बेटा तो सीधा विदेश गया, तो तुम लोग बुढ़ापे से पहले ही वृद्धाश्रम में अपना रजिस्ट्रेशन करवाने आ गए? सही कहते हैं, करनी भरनी यही है!"

"नहीं अंकल जी, हम तो बाबूजी का हालचाल पूछने आए हैं," तृषा ने झेंपते हुए कहा।

"हालचाल तो बेटी, तुम्हें इंटरनेट और टीवी की ब्रेकिंग न्यूज़ से पता चल गया होगा! यूं कहो, महेश जी की 'दूसरी पारी' की शोहरत तुम्हें यहां तक खींच लाई है। माफ कीजिएगा, यहां के रिटायर्ड हार्ट-प्लेयर की ज़िंदगी में अब किसी सब्स्टीट्यूट की जरूरत नहीं। तुम लोग जा सकते हो।"

तृषा और मयंक वहां चुपचाप चले गए, क्योंकि वे जानते थे—वे इसी अपमान के लायक हैं।

आशा करती हूं दोस्तों, आपको हमारी कहानी जरूर अच्छी लगी होगी। धन्यवाद।


Comments

Popular posts from this blog

दामाज बेटा बन जाता है पर बहू पराये घर की रहती है

  "अरे भाईसाहब (ननदोई) इतनी सुबह सुबह ?" "मम्मी पापा ने बुलाया था.कुछ जरूरी काम है." प्रमोद ने रश्मि को रूखा सा उत्तर दिया. "आ गये बेटे. बहू खड़े खड़े क्या बातें कर रही हो जाओ चाय बना लाओ." "जी मम्मी जी" रश्मि चाय बनाते हुए सोच रही थी ऐसी क्या बात हो सकती है जो भाईसाहब को सुबह बुलाया.कल रात उसे सास ससुर के कमरे से खुसुरफुसुर की आवाजें आ रही थी.मन में उठी किसी अनहोनी की आशंका को झटक कर वह चाय ले कर ड्रॉइंग रूम में गई. "बहू नाश्ता जल्दी बना देना.हमें काम से जाना है." "मम्मी जी कहाँ जाना है ?" "आकर बताते है तुम नाश्ते की तैयारी करो." रश्मि ने सास ससुर और प्रमोद को नाश्ता दिया.कुछ देर में तीनो तैयार हो कर चले गये और रश्मि घर के काम निपटाने लगी. ये थी रश्मि. शर्मा परिवार की इकलौती बहू.रश्मि की शादी रूपेश से हुए एक साल हो गया था.रूपेश की एक बड़ी शादीशुदा बहन कंचन और एक छोटी बहन काजल  जो कॉलेज में पढ़ती है.रूपेश दूसरे शहर में नौकरी करता था.उसकी इच्छा थी कि रश्मि  मम्मी पापा की देखभाल के लिए उनके साथ रहे.रश्मि ने भी रूपेश की इच्...

घर के लक्ष्मी का सम्मान

  "रवि... सुनिए ना... मुझे आपसे कुछ ज़रूरी बात करनी थी। वो मेरे पैरों में बहुत सूजन आ रही है और कमर में भी..." सुमन ने रात के सन्नाटे में, करवट बदलते हुए अपने पति रवि से कहने की कोशिश की। उसकी आवाज़ में एक दबी हुई कराह थी। रवि ने झल्लाहट में अपनी आँखों से बांह हटाई और मोबाइल की स्क्रीन पर समय देखा। रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे। "सुमन, प्लीज यार! अभी ऑफिस की टेंशन कम नहीं है जो तुम घर की रामायण शुरू कर देती हो? सुबह से शाम तक घर पर रहती हो, आराम ही तो करती हो। माँ बता रही थीं कि आजकल तुम दोपहर में दो-तीन घंटे सोती हो। फिर भी थकान? और ये पैरों में सूजन वूजन सब वहम है, थोड़ा वॉक किया करो। अब सोने दो, कल मेरी बहुत बड़ी प्रेजेंटेशन है।" रवि ने कंबल मुंह तक खींच लिया और दूसरी तरफ करवट ले ली। सुमन की आँखों में आए आंसू अँधेरे में ही जज़्ब हो गए। वह क्या बताती कि जिसे उसकी सास 'दोपहर की नींद' कहती हैं, वह असल में छत पर पापड़ और अचार सुखाने की चिलचिलाती धूप वाली मेहनत होती है। रवि को सच सुनना ही नहीं था, क्योंकि उसके लिए माँ का कहा पत्थर की लकीर था। सुमन ने चुपचाप एक दर्द न...

हकीकत

  सुमन के हाथों से शादी की मेहंदी भी नहीं उतरी थी कि उसके साथ सुधा जी ने उसे पूरी तरह से काम में झोंक दिया। सुबह से शाम हो जाती, लेकिन सुधा जी के काम तो मानो पूरे ही नहीं होते थे। जैसे ही सुमन आराम करने के लिए अपने कमरे में जाती, वैसे ही सुधा जी कहतीं, "बहू, जरा मेरे सिर में तेल की मालिश कर दो" या "कपड़े प्रेस कर दो"। कोई न कोई बहाना बनाकर पहले से ही तैयार रखतीं। सुमन कुछ भी नहीं बोल पाती और झट से काम पर लग जाती—आखिर नई-नई बहू जो ठहरी! सुमन के पति रोहित दूसरे शहर में नौकरी करते थे। शादी के लिए भी कम ही छुट्टियाँ मिली थीं, इसलिए शादी के आठ दिन बाद ही अपने काम पर लौट गए। तभी एक दिन… "अरे बहू, कब तक सोती रहेगी? कितना समय हो गया है, आज तुम्हारे ससुर जी ऑफिस के लिए भी निकल गए और तूने चाय तक नहीं बनाई। आगे से ध्यान रखना, समझ गई? ठीक चार बजे उठ जाना, क्योंकि तेरे ससुर जी सुबह छह बजे ही निकल जाते हैं। बहुएं तो काम के लिए ही तो लाई जाती हैं, एक लौटी बहू हो, नहीं बताएंगे तो कैसे सीखोगी? बड़े-बूढ़ों की कदर करना सीखो," सुधा जी नसीहत देतीं। "मुझसे गलती हो गई मांजी...